परिसीमन की आहट: क्या बदल जाएगा उत्तर-दक्षिण का राजनीतिक संतुलन?
परिसीमन की नई बहस: जनसंख्या के साथ घटेगा दक्षिण भारत का राजनीतिक वजन?
Delimitation 2026: भारत में परिसीमन एक बार फिर सियासत के केंद्र में है। सवाल सिर्फ लोकसभा की सीटें बढ़ने या घटने का नहीं, बल्कि आने वाले दशकों में संसद में उत्तर और दक्षिण भारत के राजनीतिक वजन का है। भारत में जब भी परिसीमन की चर्चा होती है, उसके पीछे एक सीधा सवाल खड़ा होता है—देश की बदलती आबादी के हिसाब से संसद में राज्यों को कितना प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए?
एक तरफ ज्यादा आबादी वाले राज्य हैं, जहां पिछले दशकों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी। दूसरी तरफ दक्षिणी राज्य हैं, जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन जैसे क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करते हुए जनसंख्या वृद्धि को काफी हद तक नियंत्रित किया।
अब चिंता यह है कि अगर भविष्य में लोकसभा सीटों का पुनर्विन्यास मुख्य रूप से आबादी के आधार पर हुआ, तो क्या जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे राज्यों को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा?
यही वजह है कि परिसीमन अब केवल निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने की प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गया है। यह संघीय ढांचे, उत्तर-दक्षिण संबंधों, जनसंख्या नीति और संसद में राज्यों की राजनीतिक ताकत से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन गया है।
1. आखिर परिसीमन क्या है?
परिसीमन यानी Delimitation वह प्रक्रिया है जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय या दोबारा निर्धारित की जाती हैं।
इसका मूल उद्देश्य यह है कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों की आबादी और उन्हें मिलने वाले राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच बहुत ज्यादा असमानता न रहे।
परिसीमन के दौरान यह भी तय किया जाता है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए कितनी सीटें आरक्षित होंगी।
भारत में परिसीमन का काम परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) करता है। यह संसद द्वारा बनाए गए कानून के तहत गठित एक उच्चाधिकार प्राप्त निकाय होता है। इसके आदेशों को कानून का दर्जा प्राप्त होता है और उन्हें अदालत में चुनौती देने की गुंजाइश भी बेहद सीमित होती है।
यानी परिसीमन सिर्फ नक्शे पर निर्वाचन क्षेत्रों की लकीरें खींचने का काम नहीं है। इसका सीधा असर इस बात पर पड़ता है कि किस क्षेत्र के कितने लोग एक सांसद या विधायक के जरिए संसद और विधानसभा में प्रतिनिधित्व पाएंगे।
2. दक्षिणी राज्यों को परिसीमन से डर क्यों है?
इस बहस की सबसे बड़ी वजह है—जनसंख्या और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का रिश्ता।
तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे दक्षिणी राज्यों में पिछले कई दशकों के दौरान प्रजनन दर और जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार में उल्लेखनीय कमी आई है।
शिक्षा का प्रसार, स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, महिलाओं की शिक्षा और परिवार नियोजन जैसे कारणों ने इन राज्यों में जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दूसरी ओर, उत्तर भारत के कई राज्यों में इसी अवधि में आबादी अपेक्षाकृत तेज गति से बढ़ी।
यहीं से दक्षिणी राज्यों की चिंता शुरू होती है।
अगर भविष्य में लोकसभा की सीटों का आवंटन मौजूदा आबादी के अनुपात में ज्यादा किया गया, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों को संसद में अधिक सीटें मिल सकती हैं।
दक्षिणी राज्यों का सवाल है—
“क्या जिस राज्य ने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित किया, उसे उसी सफलता की राजनीतिक कीमत चुकानी चाहिए?”
यह चिंता केवल सीटों के घटने-बढ़ने की नहीं है। असली चिंता है कि लोकसभा में कुल सीटों में किसी राज्य की हिस्सेदारी और उसका राष्ट्रीय राजनीतिक प्रभाव कितना रहेगा।
हालांकि, केंद्र सरकार का आकलन इससे अलग है।
अप्रैल 2026 में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि प्रस्तावित मॉडल में लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 816 किए जाने पर दक्षिणी राज्यों की सीटें मौजूदा 129 से बढ़कर 195 हो सकती हैं और सदन में उनका हिस्सा करीब 24 फीसदी के आसपास बना रह सकता है।
यानी सरकार का तर्क है कि सीटों की संख्या बढ़ाने से दक्षिणी राज्यों को सिर्फ नुकसान ही नहीं, बल्कि सीटों में वास्तविक बढ़ोतरी भी मिल सकती है।
3. आबादी बढ़ने से लोकसभा की सीटों पर क्या असर पड़ेगा?
भारत की आबादी सभी राज्यों में एक जैसी गति से नहीं बढ़ी है।
उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में पिछले दशकों के दौरान जनसंख्या वृद्धि दक्षिण भारत के कई राज्यों की तुलना में अधिक रही है।
इसके उलट केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जनसंख्या वृद्धि की रफ्तार काफी धीमी हुई है।
यही अंतर परिसीमन की पूरी बहस का सबसे संवेदनशील हिस्सा है।
मान लीजिए कि भविष्य में लोकसभा की सीटों का बंटवारा मुख्य रूप से आबादी के अनुपात में किया जाता है। ऐसी स्थिति में ज्यादा आबादी वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है।
वहीं, कम जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों की सीटें अपेक्षाकृत कम बढ़ सकती हैं।
इसका परिणाम यह हो सकता है कि दक्षिणी राज्यों की कुल लोकसभा सीटों में हिस्सेदारी घट जाए, भले ही उनकी सीटों की वास्तविक संख्या बढ़ जाए।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है।
अभी यह तय नहीं है कि भविष्य का परिसीमन किस फॉर्मूले के आधार पर होगा।
यह भी तय होना बाकी है कि लोकसभा की कुल सीटों की संख्या कितनी होगी और राज्यों के बीच सीटों का वितरण किस तरीके से किया जाएगा।
इसलिए अभी किसी राज्य के बारे में निश्चित रूप से यह कहना कि उसे इतनी सीटें मिलेंगी या इतनी सीटें कम होंगी, जल्दबाजी होगी।
4. अगला परिसीमन कब होगा?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में लंबे समय से राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के आवंटन को पुरानी जनगणना के आधार पर स्थिर रखा गया है।
84वें और 87वें संविधान संशोधनों के बाद राज्यों के बीच लोकसभा सीटों का कुल आवंटन और विधानसभा सीटों की संख्या 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े प्रकाशित होने तक स्थिर रखी गई थी।
इसका मतलब है कि आने वाली जनगणना के आंकड़े भविष्य के परिसीमन में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
यहीं से 2026 की राजनीतिक बहस भी जुड़ती है।
केंद्र सरकार ने परिसीमन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से Delimitation Bill, 2026 लोकसभा में पेश किया था। प्रस्ताव का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के पुनर्विन्यास और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन के लिए परिसीमन आयोग का प्रावधान करना था।
लेकिन इससे जुड़ा संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में आवश्यक विशेष बहुमत हासिल नहीं कर सका।
इसके बाद सरकार ने Delimitation Bill भी वापस ले लिया।
इसका सीधा अर्थ है कि अप्रैल 2026 में प्रस्तावित व्यवस्था फिलहाल कानून नहीं बन सकी है।
इसलिए भविष्य का परिसीमन किस रूप में होगा, यह अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।
5. दक्षिणी राज्य क्या कर रहे हैं?
परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों में राजनीतिक प्रतिक्रिया लगातार तेज हुई है।
तमिलनाडु में यह मुद्दा खास तौर पर संवेदनशील है। अगस्त 2026 में मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय ने परिसीमन पर चर्चा के लिए राज्य के सांसदों की बैठक बुलाई।
बैठक में शामिल सांसदों ने केंद्र के प्रस्तावित परिसीमन कानून का विरोध किया। हालांकि, DMK और AIADMK समेत कुछ प्रमुख दलों ने बैठक में हिस्सा नहीं लिया।
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू भी पहले परिसीमन और जनसंख्या प्रबंधन के बीच संबंध को लेकर चिंता जता चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि परिसीमन और जनसंख्या प्रबंधन को अलग-अलग मुद्दों के तौर पर देखा जाना चाहिए।
तमिलनाडु में भी घटती जन्मदर और भविष्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संबंध को लेकर बहस तेज हुई है।
दक्षिणी राज्यों की चिंता का मूल सवाल यही है कि अगर किसी राज्य ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, तो क्या उसे भविष्य में संसद में कम राजनीतिक वजन के रूप में इसकी कीमत चुकानी चाहिए?
असली विवाद क्या है?
पूरी बहस को अगर एक सवाल में समेटें तो दक्षिणी राज्यों की चिंता यह है—
“अगर जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों की संसद में कुल सीट हिस्सेदारी घटती है, तो क्या यह उन्हें जनसंख्या नियंत्रण की सफलता की सजा देने जैसा नहीं होगा?”
दूसरी तरफ ज्यादा आबादी वाले राज्यों का तर्क भी अपनी जगह है।
लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का एक बुनियादी सिद्धांत यह है कि ज्यादा लोगों की आवाज को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां “एक व्यक्ति, एक वोट” और “राज्यों के बीच संतुलित राजनीतिक प्रतिनिधित्व” के बीच बहस शुरू होती है।
अगर आबादी के हिसाब से सीटें नहीं बढ़ाई जातीं, तो ज्यादा आबादी वाले राज्यों के एक सांसद के पीछे अपेक्षाकृत ज्यादा मतदाता हो सकते हैं।
लेकिन अगर सीटें पूरी तरह आबादी के अनुपात में बढ़ाई जाती हैं, तो दक्षिणी राज्यों को डर है कि संसद में उनका सापेक्ष राजनीतिक प्रभाव कम हो सकता है।
यानी परिसीमन के सामने एक कठिन संतुलन है—
जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व बनाम राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन।
आगे क्या होगा?
भविष्य का परिसीमन कई महत्वपूर्ण सवालों के जवाब तय करेगा।
लोकसभा की कुल सीटें कितनी होंगी?
राज्यों के बीच सीटों का बंटवारा किस फॉर्मूले से होगा?
किस जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया जाएगा?
क्या जनसंख्या के साथ-साथ जनसंख्या नियंत्रण जैसे प्रदर्शन को भी ध्यान में रखा जाएगा?
दक्षिणी राज्यों की कुल सीट हिस्सेदारी कितनी बदलेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या नया परिसीमन उत्तर और दक्षिण भारत के बीच राजनीतिक संतुलन को बदल देगा?
इन सवालों के जवाब अभी सामने नहीं हैं।
लेकिन एक बात साफ है—परिसीमन अब सिर्फ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं बदलने की कवायद नहीं है।
यह तय कर सकता है कि आने वाले दशकों में भारतीय संसद में अलग-अलग राज्यों की राजनीतिक आवाज कितनी मजबूत होगी।
केंद्र सरकार का तर्क है कि अगर लोकसभा की कुल सीटों में पर्याप्त वृद्धि की जाती है, तो दक्षिणी राज्यों की सीटें भी बढ़ेंगी और उनकी कुल हिस्सेदारी में बहुत बड़ा बदलाव नहीं होगा।
वहीं दक्षिणी राज्यों की चिंता है कि सीटों की संख्या बढ़ने के बावजूद अगर कुल सदन में उनका अनुपात घटता है, तो लंबे समय में उनकी राजनीतिक सौदेबाजी और राष्ट्रीय नीतियों पर प्रभाव कम हो सकता है।
इसलिए परिसीमन की असली लड़ाई सीटों की संख्या की नहीं, बल्कि राजनीतिक हिस्सेदारी की है।
और आने वाली जनगणना के आंकड़े इस बहस को और निर्णायक बना सकते हैं।
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में परिसीमन पहले भी कई बार हुआ है। लेकिन इस बार इसके साथ एक और बड़ा सवाल जुड़ा है—
क्या जनसंख्या नियंत्रण में सफलता किसी राज्य के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कीमत बन सकती है?
यही सवाल आने वाले वर्षों में भारत की संघीय राजनीति की दिशा तय करने वाली सबसे बड़ी बहसों में से एक हो सकता है।