आपराधिक प्रकृति के राजनेताओं पर लगे अंकुश

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देश के दागी सांसद व विधायकों के खिलाफ लंबित अपराधिक मामलों को सालभर में निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त रुख अपना लिया है। अब शीर्ष न्यायालय ने कहा है कि विशेष त्वरित न्यायालयों के गठन की वह स्वयं निगरानी करेगी। इस नाते न्यायालय ने 18 राज्यों के मुख्य सचिवों सहित उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरलों को निर्देश देते हुए कहा है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित अपराधिक मामलों की जानकारी दें और इस बारे में शपथ-पत्र भी प्रस्तुत करें। इन अदालतों के गठन पर केंद्र सरकार के जबाव से न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की तीन सदस्यीय पीठ असंतुष्ट है।

इस पीठ में नवीन सिन्हा और केएम जोसेफ भी सदस्य हैं। अदालत की इस सख्ती से अपराधी सांसद और विधायकों की राजनीति से विदाई की उम्मीद बढ़ गई है। हालांकि केंद्र सरकार ने 12 विशेष अदालतों के गठन का निर्णय लेते हुए 7.8 करोड़ रुपए का आवंटन मंजूर किया हुआ है, लेकिन ये अदालतें सुचारु रूप से अपना काम शुरू नहीं कर पाई हैं। बीते तीन-चार दशकों के भीतर राजनीतिक अपराधियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। महिलाओं से बलात्कार, हत्या और उनसे छेड़छाड़ करने वाले अपराधी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं।

लूट, डकैती और भ्रष्ट कदाचरण से जुड़े नेता भी विधानमंडलों की शोभा बढ़ा रहे हैं। 2014 के आम चुनाव और वर्तमान विधानसभाओं में ही 1581 सांसद और विधायक ऐसे हैं, जो अपराधी होते हुए भी संवैधानिक प्रकिया में सर्वोच्च हिस्सेदार हैं। यह कोई कल्पित अवधारणा नहीं, बल्कि इन जनप्रतिनिधियों ने स्वयं ही अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का खुलासा प्रत्याशी के रूप में निर्वाचन आयोग को प्रस्तुत किए शपथ-पत्रों में किया है। साफ है, राजनीति से जुड़े समुदाय की छवि और शाख संदिग्ध है। इन्हें देश के भविष्य के लिए हर हाल में उज्ज्वल होना ही चाहिए। हमारी कानूनी व्यवस्था में विरोधाभासी कानूनी प्रावधानों के चलते सजायाफ्ता मुजरिमों को आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध की मांग उठती रही है।

लेकिन सार्थक परिणाम अब तक नहीं निकल पाए हैं। यही वजह है कि हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था पर अपराधी प्रवृत्ति के राजनीतिक लोग प्रभावी होते चले जा रहे हैं। वैसे भी देश का जितना बड़ा भूगोल और संसद, विधानसभाओं और पंचायतों के निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं, उस अनुपात में प्रत्येक जिले में विशेष अदालत खोलना आसान नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें इनका ढांचा खड़ा करने के लिए अर्थ की कमी का बहाना भी करेंगी। दूसरे, हमारे यहां पुलिस हो या सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेंसी, इनकी भूमिकाएं निर्लिप्त नहीं होती हैं। साफ है, आपराधिक प्रकृति के राजनेताओं पर अंकुश लगे, तब कहीं साफ-सुथरी छवि के लोगों को राजनीति में आने के अवसर की संभावनाएं बढ़ेंगी?

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