बचपन में बढ़ती हिंसा समाज के सामने गंभीर चुनौती

बचपन में बढ़ती हिंसा समाज के सामने गंभीर चुनौती

Published On

योगेश कुमार गोयल
बचपन को मासूमियत, प्रेम, संवेदना और खिलखिलाहट का प्रतीक माना जाता है। जिस उम्र में बच्चों के हाथों में किताबें और खिलौने होने चाहिए, उस उम्र में यदि वे हिंसा का रास्ता अपनाने लगें तो यह पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। हरियाणा के पंचकूला में 6 वर्ष की विशेष आवश्यकता वाली बच्ची पर तीसरी कक्षा के 8 वर्षीय छात्र द्वारा किया गया हमला इसी गंभीर समस्या की ओर संकेत करता है। विद्यालय में हुई इस घटना में बच्चे ने बच्ची को एक खाली कक्षा में ले जाकर उसके बाल खींचे, सिर पर प्रहार किए और ईंट-पत्थर से हमला किया। इसे सामान्य बाल सुलभ शरारत मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ऐसी घटनाएं परिवार, विद्यालय और सामाजिक वातावरण की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। बच्चों के व्यवहार पर परिवार का सबसे गहरा प्रभाव पड़ता है। वे अपने आसपास जो देखते और सुनते हैं, उसे धीरे-धीरे अपने व्यवहार में शामिल करने लगते हैं। घर में माता-पिता के बीच झगड़े, गाली-गलौज, मारपीट और छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा दिखाना बच्चों की मानसिकता को प्रभावित कर सकता है। आज अनेक अभिभावक बच्चों की भौतिक जरूरतें पूरी करने में तो ध्यान देते हैं, लेकिन उनके साथ बातचीत करने और उनकी भावनाओं को समझने के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। बच्चों को महंगे खिलौने और आधुनिक साधन देने से उनकी भावनात्मक जरूरतें पूरी नहीं होतीं। उन्हें समय, संवाद और सही मार्गदर्शन भी चाहिए। डिजिटल माध्यमों पर उपलब्ध हिंसक दृश्य और मारपीट वाले खेल भी बच्चों के व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषकर तब, जब वे बिना निगरानी के लंबे समय तक ऐसी सामग्री देखते हैं। बच्चों को यह समझाना आवश्यक है कि पर्दे पर दिखाई देने वाली हिंसा वास्तविक जीवन में किसी के लिए गंभीर पीड़ा का कारण बन सकती है। इसी तरह विद्यालयों में नैतिक शिक्षा, सहानुभूति, धैर्य और क्रोध पर नियंत्रण जैसे गुणों को व्यवहार के माध्यम से विकसित करना जरूरी है। शिक्षा का उद्देश्य अच्छे अंक दिलाना ही नहीं, जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक तैयार करना भी है। पंचकूला की घटना ने विद्यालयों की सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। निगरानी कैमरे लगा देना पर्याप्त नहीं है।

उनकी नियमित निगरानी, शिक्षकों की सतर्कता और समय पर हस्तक्षेप की व्यवस्था भी होनी चाहिए। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रशिक्षित सहयोगी कर्मचारियों की उपलब्धता सुनिश्चित करना भी आवश्यक है। अभिभावकों को भी बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों पर ध्यान देना चाहिए। लगातार आक्रामकता, दूसरों को चोट पहुंचाने की प्रवृत्ति और क्रोध पर नियंत्रण न रहना ऐसे संकेत हैं, जिन्हें गंभीरता से लेना चाहिए। जरूरत पड़ने पर बाल मनोवैज्ञानिक की सहायता लेनी चाहिए। बच्चों को कठोर दंड देने के स्थान पर उनकी भावनाएं समझकर प्रेम और अनुशासन के साथ सही दिशा दिखानी चाहिए। बच्चों का सुरक्षित भविष्य अच्छे विद्यालयों, आधुनिक सुविधाओं और बेहतर शिक्षा से ही सुनिश्चित नहीं होगा। इसके लिए परिवार में अच्छे संस्कार, विद्यालय में सुरक्षित वातावरण और समाज में मानवीय संवेदनाओं का विकास भी जरूरी है। जिस उम्र में बच्चों को दोस्ती, सहयोग और करुणा सीखनी चाहिए, उस उम्र में उनके मन में हिंसा घर करने लगे तो यह पूरे समाज की विफलता है। हमें तय करना होगा कि अगली पीढ़ी को केवल सफल बनाना है या संवेदनशील इंसान भी बनाना है। (यह लेखक के अपने विचार हैं)

About The Author

Comments

Post Comment