राहुल-प्रियंका का हाईकमान बचा पाएगा पंजाब कांग्रेस

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पंजाब में कांग्रेस की राजनीति अभी बदहाली से जूझ रही है। पिछले कुछ दिनों में जो हुआ है, उससे यही लगता है कि कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी ही तरफ गोल कर लिया है। छह माह पहले तक पर्यवेक्षकों की यही समझ थी कि आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ही जीत होगी, लेकिन आज कोई भी कांग्रेसी विधायक निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि चुनाव में क्या होगा? हालांकि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अभी तो विधायकों का दल-बदल का दौर भी बाकी है। कैप्टन को मुख्यमंत्री पद से हटाने के बाद कई निराश विधायक यह नहीं तय कर पा रहे कि वे किस पार्टी में जाएं। इस प्रकरण की शुरूआत इस बिंदु से हुई थी कि पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के प्रभाव को कम करने की जरूरत है, क्योंकि वे पार्टी से ऊपर जा रहे थे और ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस आलाकमान का उन पर नियंत्रण नहीं रहा।

कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें हटाने का फैसला कर यह साबित करना चाहा है कि यदि भाजपा में मोदी एक चेहरा होकर भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री बदल सकते हैं तब कांग्रेस में भी गांधी परिवार ऐसे निर्णय लेने की क्षमता रखता है। खैर, पंजाब के मामले में आलाकमान के संकेत पर ही विधायक दल की तात्कालिक बैठक बुलाई गई थी, जिसमें सभी विधायक पहुंचे। ऐसे में कैप्टन को भी समझ में आ गया कि उन्हें इस्तीफा देना होगा। पंजाब में नेतृत्व परिवर्तन की इस घटना से राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भी पार्टी नेतृत्व की ओर से कड़ा संदेश गया है। पंजाब की इस अस्थिरता में कांग्रेस आलाकमान ने अलग-अलग लोगों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। यहां हम एकबात और कह सकते हैं केवल चेहरे बदल लेने से कांग्रेस में अभी कलह खत्म नहीं हुई है।

हाल ही में कांग्रेस हाइकमान के आदेश पर कैबिनेट मंत्रियों की नियुक्ति हुई और कैप्टन खेमे के छह मंत्रियों को हटाया गया। हटाए गए मंत्रियों में स्वास्थ्य मंत्री बलवीर सिंह सिंह व राजस्व मंत्री गुरप्रीत सिंह कांगड़ शामिल हैं, जिन्होंने खुलकर अपनी नाराजगी जताई है। फिर यह कैसे संभव है कैप्टन लोकप्रिय नहीं रहे और कांग्रेस की लोकप्रियता बनी हुई है? विधायकों में कैप्टन के खिलाफ नाराजगी जरूर थी, पर ऐसा भी नहीं था कि वे कैप्टन के विरोध पर उतारू थे। हाल के कुछ प्रकरणों के साथ पंजाब के मामले ने यह भी स्पष्ट किया है कि पार्टी नेतृत्व के रूप में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी अपना पूरा वर्चस्व बनाने की कोशिश में जुटे हैं, जिसमें कैप्टन की छुट्टी कर एक शुरूआत की गई है।

 

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