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Vegetable Farming: हांसी में सिमट रही सब्जी की खेती, बाहरी सब्जियों ने छीना बाजार
हांसी की पहचान रहे सब्जी उत्पादक गांवों में हर साल घट रहा रकबा
हांसी, (सच कहूँ/मुकेश)। एक समय पूरे क्षेत्र में सब्जी उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में पहचान रखने वाला हांसी अब धीरे-धीरे अपनी यह पहचान खोता जा रहा है। कभी यहां की मंडी में भिंडी, गोभी, मिर्च, बैंगन, टिंडा, तोरी और कद्दू जैसी स्थानीय सब्जियों की भरमार रहती थी। छोटे व्यापारी किसानों से ताजा सब्जियां खरीदकर सीधे दिल्ली समेत कई शहरों की मंडियों तक पहुंचाते थे। इससे किसानों को अच्छा भाव मिलता था और सब्जी की खेती लाभ का सौदा मानी जाती थी। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। Vegetable Farming
हांसी की मंडियों में दिल्ली और दूसरे राज्यों से आने वाली सस्ती तथा देखने में आकर्षक सब्जियों की आवक लगातार बढ़ गई है। अधिक मुनाफे के कारण व्यापारी भी स्थानीय किसानों की बजाय बाहरी माल खरीदने लगे हैं। इसका सीधा असर हांसी के सब्जी उत्पादकों पर पड़ रहा है और हर साल सब्जियों का रकबा सिमटता जा रहा है।
मंडी में इन दिनों टिंडा 15 से 20 रुपये, कद्दू 5 से 10 रुपये, तोरी 10 से 15 रुपये और भिंडी 15 से 20 रुपये प्रति किलो के थोक भाव में बिक रही है। किसानों का कहना है कि इन कीमतों में बीज, खाद, दवाइयों, सिंचाई, मजदूरी और ढुलाई का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया है। ऐसे में सब्जी की खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। हांसी के हाजमपुर, पुठ्ठी मंगल खां, रोहनात और आसपास के गांव कभी पूरे हरियाणा में सब्जी उत्पादन और नर्सरी तैयार करने के लिए प्रसिद्ध थे। यहां से तैयार पौधे लेने के लिए दूर-दूर से किसान पहुंचते थे। Vegetable Farming
स्थानीय सब्जियां अपनी ताजगी और स्वाद के लिए भी जानी जाती थीं, क्योंकि इन्हें खेत से तोड़कर कुछ ही घंटों में मंडी तक पहुंचा दिया जाता था। इसके विपरीत बाहर से आने वाली सब्जियां लंबी दूरी तय करके बाजार तक पहुंचती हैं। इसके बावजूद कम कीमत और अधिक मुनाफे के कारण व्यापारी बाहरी सब्जियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई उपभोक्ताओं का भी मानना है कि स्थानीय खेतों की ताजा सब्जियों का स्वाद और गुणवत्ता बेहतर होती है, लेकिन बाजार में अब बाहरी सब्जियों की उपलब्धता अधिक होने से उनके पास विकल्प सीमित रह गए हैं।
किसानों का कहना है कि सब्जी की खेती में मेहनत और जोखिम दोनों अधिक हैं। मौसम की मार के साथ-साथ लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि मंडी में उचित भाव नहीं मिल रहा। ऐसे में किसान धीरे-धीरे धान, कपास और अन्य पारंपरिक फसलों की ओर लौट रहे हैं। इसका असर केवल किसानों की आय पर ही नहीं, बल्कि खेतिहर मजदूरों, नर्सरी संचालकों और सब्जी व्यापार से जुड़े लोगों के रोजगार पर भी पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि यदि स्थिति यही रही तो आने वाले वर्षों में हांसी की सब्जी उत्पादक क्षेत्र के रूप में पहचान पूरी तरह समाप्त हो सकती है। Vegetable Farming
रिहायशी कॉलोनियों ने भी घटाया सब्जियों का रकबा
हांसी के आसपास जिन क्षेत्रों में कभी बड़े पैमाने पर भिंडी, गोभी, बैंगन और अन्य सब्जियों की खेती होती थी, वहां अब तेजी से रिहायशी कॉलोनियां विकसित हो रही हैं। खेती योग्य जमीन लगातार कम होने से सब्जी उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। किसानों का कहना है कि उपजाऊ कृषि भूमि के सिकुड़ने का असर सीधे सब्जी उत्पादन पर पड़ रहा है। Vegetable Farming
क्यों घट रही है सब्जी की खेती
- थोक मंडियों में लगातार गिर रहे भाव।
- बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी की बढ़ती लागत।
- दिल्ली व अन्य राज्यों से सस्ती सब्जियों की बढ़ती आवक।
- खेती योग्य जमीन पर तेजी से विकसित हो रही कॉलोनियां।
- मौसम की अनिश्चितता और फसल खराब होने का बढ़ता जोखिम।