आलीशान कोठियों के लिए पक्की ईंटों  तैयार करने वाले मजदूरों के खुद के अरमान कच्चे

पीढ़ी दर पीढ़ी हो गई भट्ठों पर मजदूरी करते लेकिन नहीं बदली परिस्थितियां

Sarvesh Kumar Picture
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फिरोजपुर (सच कहूँ/जगदीप सिंह)। Firozpur News: आज के दौर में हर इन्सान आलीशान जिंदगी, महंगी कारों और ऊंची कोठियों के सपने देखता है। लेकिन इन आलीशान इमारतों की नींव में लगने वाली पक्की ईंटें तैयार करने वाले मजदूरों की हालत बेहद दयनीय है। दूसरों के लिए पक्के घरों का इंतजाम करने वाले ये मजदूर खुद कच्चे अरमानों और टूटी छतों के नीचे जिंदगी बसर करने के लिए मजबूर हैं। कई परिवार तो पीढ़ी दर पीढ़ी भट्ठों पर मिट्टी से मिट्टी हो रहे हैं, लेकिन उनकी आर्थिक हालत आज भी ज्यों की त्यों ही बनी हुई है। विभिन्न भट्ठों पर र्इंटें बनाने वाले मजदूरों से मिलने पर उनकी घरों की हालत देखी गई, जो उनके अपने भी नहीं थे।

वे बेहद कठिन हालात में अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ भीषण गर्मी, सर्दी और मानसून की बारिश में रहते हैं। भट्ठों पर पंजाब के मजदूरों के अलावा, बहुत संख्या में प्रवासी मजदूर भी हैं, जो अपने बच्चों के साथ यहाँ रह रहे हैं और उनके भी अपने दु:ख हैं। बिहार के मजदूर अर्जुन ने बातचीत करते हुए बताया कि उसके चार बच्चे हैं और खुद पति-पत्नी मिलाकर कुल परिवार में छह लोग हैं। यदि छोटे बच्चे भी साथ लगते हैं, तो पूरे दिन में वे करीब 2000 कच्ची ईंटें निकालते हैं, जिनकी मजदूरी उन्हें सिर्फ 550 रुपये प्रति हजार र्इंट मिलती है। इतनी महंगाई में घर चलाना बहुत मुश्किल हो जाता है। इन मजदूरों के बच्चों की हालत देखकर यह साफ दिखता है कि कई बच्चों के पैरों में न तो चप्पल हैं और कई बिना कपड़ों के भीषण गर्मी में तप रहे हैं।

वहीं, पंजाबी मजदूर गुरबख्श सिंह निवासी लक्खोके बहिराम ने बताया कि वह बचपन से ही र्इंटें निकाल रहे हैं। पहले वह घुबाया गाँव में रहते थे, फिर लक्खोके बहिराम के पास स्थित भट्ठे पर वह अपने परिवार के साथ रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि भट्ठों पर मजदूरी करना बहुत मुश्किल है, गर्मी और सर्दी की परवाह किए बिना मिट्टी से मिट्टी होना पड़ता है। घर दूर होने के कारण रोजाना आना-जाना मुश्किल होता है, और अपने असल घरों से दूर रहकर ही भट्ठे पर बने कच्चे-पक्के क्वार्टर्स में रहकर परिवार का पालन पोषण करना पड़ता है।

स्वास्थ्य और शिक्षा के साथ-साथ मजदूरी पर अधिक ध्यान

स्वास्थ्य और शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण, कुछ समय पहले तक दोनों अधिकारों से वंचित रहने वाले भट्ठा मजदूर अब पहले जैसे नहीं रहे। हालांकि, शिक्षा हासिल करने के लिए भट्ठा मजदूरों को अपने बच्चों के स्कूल समय-समय पर बदलने पड़ते हैं, लेकिन अब वे कोशिश करते हैं कि उनके प्रत्येक बच्चे की स्कूल हाजिÞरी सुनिश्चित हो, फिर भी घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए, छुट्टी वाले दिनों में ये बच्चे अपने माता-पिता के साथ र्इंटें निकालकर परिवार की मजदूरी बढ़ाने में मदद करते हैं। डिप्टी डीईओ डॉ. सतिन्द्र सिंह ने बताया कि इस प्रकार के माईग्रेट लेबर (प्रवासी मजदूरों) के बच्चों को स्कूलों में जोड़ने के लिए विशेष प्रयास किए जाते हैं, ताकि कोई शिक्षा से वंचित न रहे।

विकसित मशीनरी ने भट्ठा मजदूरों का काम तो आसान किया,  लेकिन उनका काम भी छीन लिया

भले ही खून-पसीना बहाकर भट्ठा मजदूर एक-एक र्इंट निकालने के लिए दिन भर मिट्टी से मिट्टी होते हैं, लेकिन मशीनरी के युग में नई-नई मशीनें उनके काम पर असर डाल रही हैं। मजदूरों को र्इंटें तैयार करने के लिए पहले गारा तैयार करने में काफी मेहनत करनी पड़ती थी, लेकिन अब मशीनों से गारा तैयार किया जाता है, जिससे मजदूरों का काम थोड़ा आसान हो गया है। लेकिन अब र्इंटें तैयार करने वाली मशीनों की संख्या भी बढ़ रही है, जिससे मजदूरों का काम कम हो रहा है।

भट्ठा मजदूरों के स्वास्थ्य संबंधित, स्वास्थ्य विभाग से मल्टीपर्पज हेल्थ वर्कर दर्शन लाल ने बताया कि कई बार ऐसा भी होता है कि ये मजदूर अपने स्वास्थ्य के जरूरी चैकअप करवाने के बजाय भट्ठे की मजदूरी छोड़ना उचित नहीं समझते। इसीलिए स्वास्थ्य विभाग की टीमों को खुद भट्ठों पर पहुंचकर इनके स्वास्थ्य की जांच करनी पड़ती है।

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