जनसमस्याओं पर काम हो, चेहरे बदलने से क्या होगा

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पंजाब में कांग्रेस हाईकमान ने कैप्टन अमरेन्द्र सिंह से मुख्यमंत्री पद का इस्तीफा ले लिया है। पंजाब विधान सभा चुनावों में केवल चार माह का समय शेष बचा है। इस मोड़ पर आकर मुख्यमंत्री का इस्तीफा किसी नए प्रयोग का संकेत है। हालांकि पंजाब में कांग्रेस मजबूत स्थिति में थी परन्तु पता नहीं क्यों भाजपा के गुजरात अनुभव को देखकर कांग्रेस ने भी अब यह दांव खेल दिया है। कांग्रेस का यह प्रयोग कितना सफल होगा यह केवल इस बात पर निर्भर करेगा कि निर्णय के बाद पार्टी की हालत क्या है। पंजाब में जब नवजोत सिंह सिद्धू को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष पद सौंपा गया, तत्पश्चात अमरिंदर सिंह के रुख में आई नरमी से यह लग रहा था कि अब कलह का दौर शायद खत्म होगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। हालांकि पार्टी की ओर से यह घोषणा की गई है कि पंजाब में भावी विधानसभा चुनाव कांग्रेस अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में ही लड़ेगी। सिद्धू और उनके खेमे में इस पर सहमति बनेगी तब शायद कांग्रेस को थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन अब कैप्टन के इस्तीफे के बाद यह तय है कि पूरी पार्टी को इसका नुक्सान होगा।

भाजपा ने उत्तराखंड के बाद गुजरात में केवल मुख्यमंत्री ही नहीं बदला बल्कि सभी 22 के 22 मंत्री भी बदल दिए हैं वहां हटाए गए पूर्व मुख्यमंत्री और मंत्रियों से बगावत की चूं तक नहीं आ रही, दूसरी ओर पंजाब कांग्रेस में अमरेन्द्र सिंह जैसे दो बार मुख्यमंत्री रहने वाले कद्दावर नेता हैं जिन्होंने प्रताप सिंह बाजवा, शमशेर सिंह दूलों, राजिन्दर कौर भट्ठल जैसे नेताओं द्वारा की गई बगावत को न तो बर्दाश्त किया और न ही सफल होने दिया। अब यह देखना होगा कि क्या पार्टी हाईकमान बिना किसी नुक्सान के अपने फैसले को सफल बना पाता है? क्या हाईकमान अमरेन्द्र सिंह को मुख्य मंत्री की कुर्सी से उतारकर पार्टी में कायम रख पाएगा? पार्टी में बगावत को रोकने के बाद ही, कांग्रेस अपने प्रयोग का असर देख पाएगी। वर्णननीय है कि मतभेदों के चलते कांग्रेस मध्यप्रदेश में अपनी सत्ता गंवा चुकी है।

राजस्थान में पार्टी के आंतरिक झगड़े जगजाहिर हैं। पार्टी के भीतर नई पुरानी पीढ़ी में महत्त्वाकांक्षाओं के टकराव की वजह से आज दशा यह है कि कांग्रेस राष्ट्रीय फलक पर खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में पेश नहीं कर पा रही है। भले ही यह चर्चा है कि अमरेन्द्र सिंह कांग्रेस के जनता से किए वायदे पूरे न कर सके, विधायकों को समय नहीं देने के कारण पार्टी हाईकमान के गुस्से का शिकार हुए, लेकिन लंबे समय के बाद कार्रवाई होना पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़े करता है। कैप्टन विरोधी भी अंतिम साल में सक्रिय हुए , उक्त व्यवहार भी अमरेन्द्र सिंह के विरोधियों की लोक हितों के प्रति उनकी वचनबद्धता पर सवाल उठाता है। जन समस्याओं का समाधान जरूरी है, लेकिन यह सब कुछ पहले साल या पहले दिन से ही लागू होना चाहिए।

 

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