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    अब सोनिया के लिए चुनौती बने चहेते हुड्डा

    Conflict continues in Congress over assembly elections

    सियासत। विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस में घमासान जारी

    • कभी भजन लाल को साइड कर लाई थीं आगे

    अनिल कक्कड़/सच कहूँ

    चंडीगढ़। 2005 के हरियाणा विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत कर परचम लहराया और उस वक्त मुख्यमंत्री पद के दावेदारों में सबसे अगले पायदान पर भजन लाल रहे। लेकिन संप्रग अध्यक्षा सोनिया गांधी ने सियासी पैतरा चलते हुए भजन लाल को किनारे करके जाट नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा को प्रदेश की कमान सौंप दी थी। इस कदम के चलते भजन लाल नाराज हो गए और हरियाणा जनहित के गठन के रूप में इसकी परिणति हुई।

    हालांकि भजन लाल की मौत के बाद उनके बेटे कुलदीप और चंद्रमोहन उनकी विरासत को आगे नहीं ले जा पाए और भूपेंद्र हुड्डा ने सूझबुझ दिखाते हुए मुख्यमंत्री के रूप में लगातार 10 साल प्रदेश की बागडोर संभाली। आज स्थिति कमोबेश 2005 जैसी तो बिल्कुल भी नजर नहीं आ रही। पार्टी किला दर किला शिकस्त सहती हुई आज अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर में पहुंच चुकी है। भजन लाल को दरकिनार कर लाए गए भूपेन्द्र हुड्डा ही सोनिया के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन गए हैं।  रोहतक में हुई महापरिवर्तन रैली में हुड्डा ने दो टूक शब्दों में कह दिया कि कांग्रेस अब पुरानी वाली कांग्रेस नहीं रही।

    वहीं उन्होंने अपने साथी विधायकों और पुराने मंत्रियों को साथ लेकर रैली की स्टेज से हाईकमान को साफ संदेश दे दिया कि मुख्यमंत्री के दावेदार वहीं होंगे और पार्टी की कमान उन्हें जल्द से जल्द सौंपी जाए। ऐसे में सोनिया और पार्टी हाईकमान असमंजस की स्थिति में फंस गए हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव में पार्टी की करारी हार से जहां साफ संकेत गया कि हुड्डा अब अपना स्वयं का गढ़ ही गंवा चुके हैं, ऐसे में कांग्रेस हाईकमान उन पर दाव लगाने से बच रही थी। लेकिन प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने बड़ी ही चालाकी से हाईकमान के फैसले से पहले ही रैली करके अपना पैंतरा चल दिया।

    • गुटबाजी से हुआ बड़ा नुकसान

    हरियाणा में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र हुड्डा के बीच तनातनी के चलते पार्टी को काफी नुकसान झेलना पड़ा है। पहले 2014 के विधानसभा चुनाव और अब 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की जो दुर्गत हुई, वो किसी से छिपी नहीं है। अब तंवर ने भी हुड्डा के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और हाईकमान को पूरे मामले से अवगत कराने की बात कही है। उनका कहना है कि कांग्रेस नहीं बदली है, कुछ नेताओं की सोच बदल गई है।

    • सोनिया निकालेंगी बीच का रास्ता!

    ऐसे हालात में फिलहाल सभी की निगाह कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष  के ऊपर टिक गई हैं। इस मुश्किल हालात में एक ओर पार्टी के दिग्गज नेता को साथ बनाए रखने की चुनौती है तो दूसरी ओर प्रदेशाध्यक्ष अशोक तंवर, किरण चौधरी, रणदीप सुरजेवाला और कुलदीप बिश्नोई खेमों में बंटी पार्टी को एकजुट करने की दुश्वारी है। अब देखना होगा इस सबसे सोनिया गाँधी कैसे पार पाती हैं।

    • हुड्डा से कैप्टन अमरेन्द्र जैसे करिश्मे की उम्मीद धुंधली

    भूपेन्द्र हुड्डा ने भले ही खुद को मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में पेश कर दिया हो, लेकिन वर्तमान स्थिति में पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र सिंह जैसे करिश्में की उम्मीद कम ही नजर आ रही हैं। बता दें कि पंजाब में कैप्टन को सत्ता विरोधी लहर का काफी फायदा मिला था, लेकिन हरियाणा में फिलहाल ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है। लोकसभा में सोनीपत और रोहतक की हार से भी हुड्डा परिवार की लोकप्रियता पर सवालिया निशान लग गया है। अब ये देखना भी दिलचस्प होगा कि विपरित परिस्थितियों के बावजूद भूपेन्द्र हुड्डा और सोनिया किस तरह भाजपा के विजयी रथ को रोकेंगे या फिर वहीं ढाक के तीन पात वाली कहावत साबित होगी।