चीन ताइवान की भिड़ंत हो सकती है खतरनाक

China-Taiwan

रूस-यूक्रेन युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ था कि ताइवान मामले में चीन व अमेरिका एक दूसरे के खिलाफ रणनीतियां बनाने में जुटे हुए हैं। मामला सारा चीनी नीतियों का है। चीन पिछले लंबे समय से ताइवान पर अपना अधिकार जताने का दावा करता आ रहा है और अमेरिका को ताइवान से दूर रखने के लिए यत्नशील है। पिछले दिनों अमेरकी संसद की स्पीकर नैन्सी पैलोसी के ताइवान दौरे से चीन आग बबूला हो गया। चीन ने ताइवान के खिलाफ युद्ध की तैयारी शुरू कर दी है और अपने लड़ाकू जहाज उड़ाने के साथ-साथ ताइवान पर मिसाइलें भी दागी। ऐसा करके चीन ने अमेरिका के सामन उसके सहयोगी के देशों के प्रति अपने इरादे जाहिर कर दिये हैं।

दूसरी ओर अमेरिका भी अपने हितों को लेकर टस से मस होने को तैयार नहीं है। स्थिति इस कारण भी गंभीर बनी हुई है कि अमेरिकी नेता का ताइवान दौरा भी तब हो रहा था जब रूस व यूक्रेन में युद्ध जारी है। ऐसी परिस्थितियों में दुनिया के देशों में आपसी गुटबाजी बढ़ने से महंगाई सहित नई समस्याएं मुसीबत बनेंगी। शक्तिशाली देशों की जिद और टकराव ने कई अन्य देशों के लिए आर्थिक मुसीबतें खड़ी कर दी हैं। तेल, अनाज और अन्य जरूरी वस्तुओं की सप्लाई रूकने से महंगाई में लगातार बढ़ौतरी हो रही है। युद्ध की परिस्थितियों में अर्थव्यवस्था को सही रास्ते पर लाना काफी चुनौती भरा काम है। रूस यूरोप की प्राकृतिक गैस की 40 प्रतिशत मांग की पूर्ति करता है।

यूरोप की गैस सप्लाई रूकने से वहां बिजली संकट पैदा हो सकता है। गेहूं की कीमतों में भी उछाल आ रहा है। किसी भी देश में महंगाई का कारण आंतरिक नहीं होता बल्कि अंतर्राष्टÑीय कारण भी महंगाई से जुड़े होते हैं। अंतर्राष्टÑीय कारणों से निपटने के लिए किसी देश की सरकार व अर्थ शास्त्रियों को कड़ी मेहनत पड़ती है। श्रीलंका जिस आर्थिक संकट से जूझ रहा है उसके लिए आने वाले दिनों में चुनौतियां और भी गंभीर होंगी। गरीब देशों के कल्याण के लिए सांझे अंतर्राष्टÑीय प्रयासों में कमी आएगी। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि युद्ध मानवता के लिए बर्बादी से बढ़कर कुछ नहीं। आवश्यकता इस बात की है कि अंतर्राष्टÑीय संगठनों को मजबूत बनाया जाए एवं मानवता को बचाया जाए।

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