चुनावी मोर्चे पर कांग्रेस

Congress

कांग्रेस ने अपना चुनावी बिगुल फूंक दिया है। अहमदाबाद में अपनी कार्यसमिति की बैठक में पार्टी ने अपनी चुनावी रणनीति (congress) के संकेत दिए और प्रियंका गांधी ने यहीं से बाकायदा अपने चुनावी अभियान और पॉलिटिकल करियर की शुरूआत की। अहमदाबाद में कार्यसमिति की बैठक आयोजित कर कांग्रेस ने यह संदेश भी देना चाहा है कि महात्मा गांधी की विरासत उसी के पास है और यही उसकी मूल पूंजी है। वह गांधीवादी मूल्यों की राजनीति करती है और गांधीवाद को ही बीजेपी के राष्ट्रवाद का जवाब मानती है। कांग्रेस ने बताना चाहा है कि बीजेपी का राष्ट्रवाद घृणा और उन्माद पर टिका है, जबकि गांधी की देशभक्ति की बुनियाद में सबको गले लगाने और सबको साथ लेकर चलने का भाव है। वायुसेना के एयर स्ट्राइक के बाद बीजेपी ने तमाम मुद्दों को दरकिनार कर राष्ट्रवाद को ही अपना अजेंडा बना रखा है और इसके नाम पर एक मजबूत सरकार के लिए वोट मांग रही है।

अपनी इस रणनीति के जरिए उसने कुछ हद तक विपक्ष को बैकफुट पर धकेल दिया है। लेकिन इसकी काट के रूप में कांग्रेस सहिष्णु राष्ट्रवाद को आक्रामक राष्ट्रवाद के विकल्प की तरह प्रस्तुत करना चाहती है। प्रियंका गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि यह देश प्रेम, सद्भावना और आपसी लगाव के आधार पर बना है। मैं दिल से कहना चाहती हूं कि इससे बड़ी कोई देशभक्ति नहीं है कि आप जागरूक बनें। आपकी जागरूकता एक हथियार है। यह ऐसा हथियार है, जिससे किसी को दुख नहीं देना, किसी को चोट नहीं पहुंचानी। पर यह आपको मजबूत बनाएगा। बहरहाल, कांग्रेस ने राष्ट्रवाद पर बीजेपी को जवाब जरूर दिया है पर इसे मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने से वह बचना चाहती है।

उसे लगता है कि जनता के दुख-दर्द को सामने लाकर ही वह न सिर्फ अपनी अलग छवि बना सकती है, बल्कि इन्हीं मुद्दों पर बीजेपी को घेर भी सकती है। इसलिए प्रियंका ने कार्यकतार्ओं को सचेत किया कि असल मुद्दों से ध्यान भटकाने की लगातार कोशिश की जाएगी, लेकिन वे रोजगार, किसानों और महिला सुरक्षा के मुद्दों को लेकर सवाल पूछते रहे। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने साफ किया कि बीजेपी के अजेंडे में फंसने के बजाय बेरोजगारी, किसान, राफेल में भ्रष्टाचार और सरकार के वायदे पूरा न करने के मसले को लेकर ही जनता के पास जाया जाए। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जनता का ध्यान राष्ट्रवाद से हटाकर वह रोजमर्रा के मुद्दों पर कैसे लाए। उसने संगठन मजबूत करने पर ध्यान देना शुरू किया है और हार्दिक पटेल जैसे जमीनी नेताओं को अपना हिस्सा बनाया है। लेकिन पूरे विपक्ष को साथ लेकर चलने में वह अभी ज्यादा कामयाब होती नहीं दिख रही। कई राज्यों में गठबंधन का मामला लटका हुआ है या अस्पष्ट है। देखना है, सत्तापक्ष के सामने वह कितनी चुनौती पेश कर पाती है।

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