अंधेरी जिंदगी में भरे उजाला

पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज की पावन स्मृति में डेरा सच्चा सौदा, सरसा में पिछले तीस सालों से गरीब लोगों की आँखों की ज्योति लौटाने के लिए विशाल नि:शुल्क नेत्र ज्योति शिविर आयोजित किये जा रहे हैं। ये पुण्य का कार्य है जिसकी जितनी सराहना की जाए वह कम है। आंखें स्वस्थ न हों तो संसार की सारी खूबसूरती बेमानी लगती है। फिर भी हम अपनी आंखों का पर्याप्त खयाल नहीं रख पाते। कई बार देखा गया है आँख में धूल अथवा अन्य किसी कारण से एलर्जी हो जाती है तो हम कितने बेचैन हो जाते हैं। इसलिए सच ही कहा गया है कि आँख है तो जहान है। नेत्रों की महत्ता का पता हमें तब चलता है जब हम किसी नेत्रहीन व्यक्ति की क्रियाओं को देखते हैं । मार्ग पर चलना तो दूर , घर पर चलने-फिरने में भी असुविधा होती है। नेत्रहीन व्यक्ति को हर समय किसी न किसी के सहारे की आवश्यकता होती है, उसका दैनिक जीवन भी मुश्किलों से भर जाता है। नेत्रों से बढ़कर कोई रत्न नहीं। इससे बढ़कर कोई दान नहीं। नेत्र दान मरकर भी जिन्दा रहने का अनमोल वरदान है। नेत्रदान से पुण्य कोई कार्य नहीं होता।

दान जहां मनुष्य की उदारता का परिचायक है, वहीं यह दूसरों की आजीविका चलाने या किसी सामूहिक कार्य में संकल्पबद्ध होकर अपना योगदान देने की मानवीय प्रवृति को दर्शाता है। राजा हरिश्चन्द्र को उनकी दानवीरता के लिए ही जाना जाता है। महर्षि दधीचि जैसे ऋषि ने तो अपनी अस्थियाँ ही मानव के कल्याण हेतु दान कर दीं। महर्षि दधीचि ने मानवता को जो रास्ता दिखाया आज उस पर चलकर तमाम लोग समाज एवं मानव की सेवा में जुटे हुए हैं। नेत्रदान के महत्व के बारे में व्यापक पैमाने पर जन जागरूकता पैदा करना है तथा लोगों को मृत्यु के बाद अपनी आँखें दान करने की शपथ लेने के लिए प्रेरित करना है।

मृत्यु के बाद नेत्रदान

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, कॉर्निया की बीमारियाँ, मोतियाबिंद और ग्लूकोमा के बाद होने वाली दृष्टि हानि अंधापन के प्रमुख कारणों में से हैं। ज्यादातर मामलों में दृष्टि की हानि को नेत्रदान के माध्यम से उपचारित किया जा सकता है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके बिभिन्न अंगों को दान किया जा सकता हैं तथा उन अंगों को उन रोगियों में प्रत्यारोपित किया जा सकता है, जिन्हें उन अंगों की आवश्यकता है। ऐसा ही एक अंग आंख है। मृत्यु के बाद नेत्रदान से कॉर्निया रहित अँधा व्यक्ति शल्य प्रक्रिया के माध्यम से कॉर्निया प्रत्यारोपण द्वारा फिर से देख सकता है, जिसमें क्षतिग्रस्त कॉर्निया की जगह पर नेत्रदाता के स्वस्थ कॉर्निया को प्रतिस्थापित किया जाता है।

आंखों की देखभाल

आंखों की देखभाल बाल्यकाल से ही की जानी चाहिए। किसी भी बच्चे की आंखों की पहली बार जांच पांच साल के होने तक हो जानी चाहिए। इस उम्र में अगर बच्चे की आंखों में किसी प्रकार की कोई परेशानी रहती है तो वह इसी अवस्था में ठीक हो जाती हैं। आज का युवा आंखों की समस्या से ज्यादा परेशान हैं क्योंकि वह अपना ज्यादतर समय कंप्यूटर, मोबाइल फोन, रंगीन टीवी, वीडियो गेम और टैबलेट पर बिताते है। उनकी यह लापरवाही उन्हें असमय आँखों का दुश्मन बना देती है और यह दंश उन्हें ताउम्र झेलना पड़ता है। हमारे सभी धर्मों में दया, परोपकार, जैसी मानवीय भावनाएँ सिखाई जाती हैं।

 

यदि हम अपने नेत्रदान करके मरणोपरांत किसी की निष्काम सहायता कर सकें तो हम अपने धर्म का पालन करेंगे क्योंकि इसमें कोई भी स्वार्थ नहीं है इसलिये यह महादान माना जाता है। नेत्रदान करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के 6 से 8 घंटे के अंदर ही नेत्रदान कर देना चाहिए। जिस व्यक्ति को नेत्रदान के कॉर्निया का उपयोग करना है, उसे 24 घंटे के भीतर ही कॉर्निया प्रत्यारोपित कराना जरूरी होता है। नेत्रदान का मतलब शरीर से पूरी आंख निकालना नहीं होता। इसमें मृत व्यक्ति की आखों के कॉर्निया का उपयोग किया जाता है।

आँखों के स्वास्थ्य को बनाए रखना

आँखों के स्वास्थ्य को बनाए रखना केवल एक व्यक्ति का कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। नेत्रदान द्वारा बड़ी संख्या में लोगों को लाभान्वित किया जा सकता हैं। मृत्यु के बाद किसी जरूरतमंद को अपनी आंखें देने की प्रक्रिया नेत्रदान कहलाती है। नेत्रदान महादान है, मनुष्य के जीवन में हर अंग का महत्व है, लेकिन दृष्टि के बिना जीवन का पूरा सुख नहीं मिलता। आंखें खुशी और दुख दोनों का भाव व्यक्त करती हैं। मृत्यु के बाद देहदान की तरह कुछ अंगों का दान किया जा सकता है।

समाज में जागरूकता लाकर नेत्रदान के अभियान को गति दी जासकती है। दान की गई आंखें कॉर्निया संबंधी दृष्टिहीनता से प्रभावित लोगों के लिए ही उपयोगी होती है। इसमें किसी दृष्टिहीन व्यक्ति की आंख में दान किए गए कॉर्निया को आॅपरेशन द्वारा प्रत्यारोपित कर दिया जाता है। कोई भी व्यक्ति चाहे, वह किसी भी उम्र, लिंग, रक्त समूह और धर्म का हो, वह नेत्रदाता हो सकता है। कम दृष्टि या दूर की दृष्टि के लिए लेंस या चश्मे का उपयोग करने वाले व्यक्ति या जिन व्यक्तियों की आँखों की सर्जरी हुई हों, वे सभी नेत्रदान कर सकते हैं। कमजोर दृष्टि नेत्रदान के रास्ते में बाधा नहीं है।

डेरा सच्चा सौदा पिछले 30 वर्षों से मानव सेवा से जुटा

Yaad-E-Murshid Eye Camp

डेरा सच्चा सौदा पिछले तीस वर्षों से मानव सेवा के परोपकारी कार्यों में तन मन और धन से जुटा है जिसकी सराहना समाज के सभी वर्गों के लोगों ने की है। डेरा सच्चा सौदा के प्रबंधन ने शिविर में लोगों के खाने-पीने और रहने की मुफ्त व्यवस्था की है। प्रख्यात नेत्र विशेषज्ञ डॉ. प्रदीप शर्मा ने डेरा प्रबंधन के पीड़ित मानवता के सेवा कार्यों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह शिविर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन प्रेरणा से लगाया गया ह, जिसमें हरियाणा सहित विभिन्न राज्यों के लोग अपनी नेत्र ज्योति के लिए भाग ले रहे हैं।

 

-बाल मुकुन्द ओझा, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार

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