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    Story: जब बापू ने मेरी बीएड के लिए अपनी ट्रॉली बेच दी

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    Story जब बापू ने मेरी बीएड के लिए अपनी ट्रॉली बेच दी

    Story: मनुष्य इस संसार में आता है और एक दिन चला भी जाता है। यहां कोई भी सदा के लिए ठहरने नहीं आया। जो जन्म लेता है, उसका अंत निश्चित है; परंतु जीवन की धारा स्मृतियों के सहारे ही आगे बढ़ती रहती है। जैसे माँ का जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान होता है, वैसे ही पिता की भूमिका भी उतनी ही गहन और व्यापक होती है। माता और पिता दोनों ही संतान के लिए अलग-अलग किंतु समान रूप से अनमोल स्थान रखते हैं। बच्चे का परिवेश- उसका पड़ोस, उसका वातावरण, उसका विद्यालय और उसका शहर- उसके व्यक्तित्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ते हैं। अपने प्रियजनों के बिछुड़ जाने के बाद मन उदासी से भर जाता है और तब जीवन का अगला चरण उन्हीं की स्मृतियों के सहारे आगे बढ़ने लगता है। कहा जाता है कि ठहरा हुआ पानी भी खराब होने लगता है, जबकि बहता पानी अपनी अलग ही सुगंध और ताजगी लिए होता है। यही जीवन का सिद्धांत है- समय के साथ चलते रहना, बदलते रहना।

    कोरोना काल के कठिन समय में मेरा बापू मुझे हमेशा के लिए अकेला छोड़ गया। जब तक वह जीवित थे, मुझे जीवन की किसी भी बात की तनिक भी चिंता नहीं थी। मैं अपनी मस्ती भरी दुनिया में मग्न था। लेकिन उनके जाने के बाद जिम्मेदारियों का जो एहसास हुआ, वह मेरे जीवन का एक नया अध्याय बन गया। आज सोचता हूँ, न जाने कैसे वह कर्ज के बोझ तले दबे होने के बावजूद हम तीनों भाई-बहनों को पढ़ाते रहे और घर-गृहस्थी की गाड़ी भी खींचते रहे। यह बात 1998 की है, जब मेरा बी.एड. में प्रवेश हुआ। घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी। छमाही फसल बिकने के बाद ही कहीं जाकर आढ़ती से कुछ पैसे मिलते और उन्हीं से हमारे कपड़े-वगैरह और अन्य आवश्यकताओं का प्रबंध होता। परीक्षा पास करने के तुरंत बाद बी.एड. में दाखिले की खुशी इतनी अधिक थी कि मैं उसे संभाल भी नहीं पा रहा था। मुझे क्या पता था कि इतनी भारी फीस भरना हमारे लिए संभव ही नहीं था। मैं चुपचाप सो गया। Story

    मेरी माँ ने पिता से इस बारे में बात की कि बेटे का दाखिला हो गया है, वह आगे चलकर मास्टर बनेगा, पर फीस बहुत अधिक है- कोई उपाय करना होगा। अगले ही दिन मेरे पिता, बिना अपने साधनों की परवाह किए, अपनी ट्रॉली बेच आए और मेरी फीस के लिए पैसे जुटा दिए। मुझे इस बात का पता बाद में चला, जब मैंने उन्हें दूसरों से ट्रॉली मांगकर काम करते देखा। पिता के जीवन में कितना महत्वपूर्ण स्थान होता है, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। पिता तो अपने बच्चों के लिए अपना संपूर्ण जीवन तक न्यौछावर कर देता है। आज भले ही मेरे बापू हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी स्मृतियां ही मेरे जीवन को आगे बढ़ाने का संबल बनी हुई हैं।
    जब मैं आज अपने विद्यार्थियों को यह प्रसंग सुनाता हूँ, तो उनकी आँखें नम हो जाती हैं और उनके मन में अपने माता-पिता के प्रति प्रेम और सम्मान और भी गहरा हो जाता है। माता-पिता घर की वह नींव होते हैं, जिनके रहते किसी प्रकार की चिंता नहीं होती। जिन बच्चों के माता-पिता बचपन में ही उन्हें छोड़ जाते हैं, उनसे पूछकर देखिए कि बिना माता-पिता के जीवन कैसा होता है।

    यदि जीवन में यादें न हों, तो उसका कोई अर्थ ही नहीं रह जाता। अच्छी और बुरी, दोनों प्रकार की यादों के सहारे ही जीवन आगे बढ़ता है। माता-पिता हमें छोड़कर जाने के बाद भी हमारे सपनों में आकर हमें सही और गलत का मार्ग दिखाते रहते हैं। वास्तव में, जीवन की यादें एक विशाल चलचित्र है, जिसे हमारा मन अपने भीतर संजोए रखता है। अच्छी यादें हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। हमें चाहिए कि हम अपने बड़ों का सम्मान करें और जीवन की मधुर यादों को दूसरों के साथ भी साझा करें।
    अमनदीप शर्मा, गुरने कलां, मानसा, मो. 98760-74055

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