अमेरिका ने सऊदी से बनाई दूरी? हूतियों के खिलाफ मदद से इनकार के बाद मिस्र की ओर बढ़े MBS, जानें पूरी कहानी

अमेरिका ने सऊदी से बनाई दूरी? हूतियों के खिलाफ मदद से इनकार के बाद मिस्र की ओर बढ़े MBS, जानें पूरी कहानी

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रियाद/काहिरा: सितंबर 2026 में मध्य-पूर्व की राजनीति में एक नया मोड़ देखने को मिल रहा है। यमन के हूती विद्रोहियों के बढ़ते प्रभाव और लाल सागर में बदलते हालात के बीच सऊदी अरब को अमेरिकी सुरक्षा सहयोग को लेकर नए सवालों का सामना करना पड़ रहा है। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य हमले की मांग की, लेकिन वॉशिंगटन ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। हालांकि अमेरिका ने रियाद को खुफिया जानकारी और टारगेटिंग के स्तर पर सहायता जारी रखने की बात कही है।

इसी बीच सऊदी अरब ने मिस्र के साथ अपने सुरक्षा और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। 15 सितंबर को मोहम्मद बिन सलमान ने काहिरा में मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी से मुलाकात की। दोनों देशों ने सऊदी और खाड़ी देशों की सुरक्षा को मिस्र की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा बताया और लाल सागर, बाब-अल-मंदेब तथा होर्मुज में समुद्री आवाजाही की सुरक्षा पर सहयोग की बात दोहराई।

एक ही दिन ट्रंप को दो फोन, लेकिन नहीं मिली सीधी सैन्य मदद

रिपोर्टों के मुताबिक, 10 सितंबर को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने राष्ट्रपति ट्रंप से दो बार फोन पर बातचीत की। बातचीत का मुख्य मुद्दा यमन में हूतियों की बढ़ती सैन्य गतिविधियां और लाल सागर के रणनीतिक इलाकों पर उनका बढ़ता प्रभाव था।

सऊदी की मांग थी कि अमेरिका हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य कदम उठाए। हालांकि ट्रंप प्रशासन ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। इसके बजाय वॉशिंगटन ने रियाद को खुफिया जानकारी और टारगेटिंग संबंधी सहायता देने की बात कही।

हूतियों ने हाल के दिनों में यमन के लाल सागर तट पर महत्वपूर्ण इलाकों पर कब्जा किया है। इससे बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को लेकर चिंता बढ़ी है, जो वैश्विक समुद्री व्यापार और सऊदी तेल निर्यात के लिए बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है।

फिर हूतियों से अमेरिका की गुप्त बातचीत क्यों हुई?

सऊदी के लिए स्थिति तब और जटिल हुई जब अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच ओमान में गोपनीय बातचीत की खबर सामने आई। रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने ओमान की राजधानी मस्कट स्थित अमेरिकी दूतावास में हूती प्रतिनिधियों से मुलाकात की। बातचीत में हूतियों ने 2025 में अमेरिका के साथ हुए युद्धविराम का पालन करने और अमेरिकी जहाजों को निशाना न बनाने की बात कही। बैठक में ओमान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी।

रिपोर्टों के अनुसार, हूतियों ने अमेरिकी अधिकारियों को यह भी आश्वासन दिया कि वे अमेरिकी जहाजों को निशाना नहीं बनाएंगे। हालांकि, इस बातचीत को सीधे तौर पर अमेरिका की ओर से सऊदी के खिलाफ हूतियों को “खुली छूट” देने के आधिकारिक समझौते के रूप में पेश करना अभी सही नहीं होगा। अमेरिकी अधिकारियों ने बैठक की औपचारिक पुष्टि नहीं की है।

अमेरिका का मकसद क्या है?

वॉशिंगटन की मौजूदा रणनीति से संकेत मिलता है कि अमेरिका एक तरफ लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा चाहता है, लेकिन दूसरी तरफ सऊदी अरब और हूतियों के बीच सीधे सैन्य संघर्ष में गहराई से उतरने से बचना चाहता है। यही वजह है कि अमेरिका हूतियों के साथ संवाद भी कर रहा है और सऊदी को खुफिया सहायता भी दे रहा है, लेकिन सीधे हवाई हमले करने से फिलहाल पीछे हट रहा है। विश्लेषकों के मुताबिक, इससे अमेरिका की मध्य-पूर्व नीति में प्राथमिकताओं और जोखिमों को लेकर बहस तेज हुई है।

‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ ने भी बढ़ाई थी सऊदी-अमेरिका की दूरी

इससे पहले मई 2026 में होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका और सऊदी अरब के बीच मतभेद सामने आए थे। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ के तहत व्यावसायिक जहाजों की आवाजाही को सुरक्षित बनाने के लिए अभियान शुरू किया था। इसमें अमेरिकी नौसैनिक जहाज, 100 से ज्यादा विमान, ड्रोन और करीब 15,000 सैन्यकर्मियों की भागीदारी की योजना बताई गई थी। रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब ने अमेरिकी सेना को अपने ठिकानों और हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी। इसके बाद अभियान को कुछ ही समय में रोक दिया गया। इस घटनाक्रम ने रियाद और वॉशिंगटन के बीच सुरक्षा सहयोग को लेकर नई चर्चा को जन्म दिया।

अब मिस्र की ओर क्यों देख रहा है सऊदी?

अमेरिका से सीधे सैन्य हस्तक्षेप की उम्मीद पूरी नहीं होने के बीच सऊदी अरब ने अपने पुराने क्षेत्रीय साझेदार मिस्र के साथ संपर्क बढ़ाया है। 15 सितंबर को मोहम्मद बिन सलमान काहिरा पहुंचे और राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी से मुलाकात की। दोनों देशों ने कहा कि सऊदी अरब और खाड़ी देशों की सुरक्षा मिस्र की राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई है। साथ ही दोनों पक्षों ने समुद्री आवाजाही की स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सहयोग जारी रखने पर सहमति जताई। इसमें लाल सागर, बाब-अल-मंदेब और होर्मुज जलडमरूमध्य खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं।

क्या मिस्र अमेरिका की जगह ले सकता है?

यहां तस्वीर थोड़ी अलग है। मिस्र के पास बड़ी सेना और अरब दुनिया में महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रभाव जरूर है, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों में ऐसा कोई संकेत नहीं है कि काहिरा सऊदी की ओर से हूतियों के खिलाफ सीधे युद्ध में उतरने की तैयारी कर रहा है।

एसोसिएटेड प्रेस के मुताबिक, सऊदी के लिए मिस्र की भूमिका मुख्य रूप से राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन जुटाने की हो सकती है। काहिरा के सामने खुद आर्थिक और सुरक्षा संबंधी कई चुनौतियां हैं, इसलिए उसके लिए यमन में बड़े पैमाने पर सैन्य हस्तक्षेप करना जोखिम भरा होगा।

यानी सऊदी के लिए मिस्र एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय साझेदार और कूटनीतिक सहारा बन सकता है, लेकिन अमेरिका की सैन्य क्षमता की सीधी जगह लेना अलग बात है।

सऊदी के सामने अब बड़ी चुनौती

मौजूदा घटनाक्रम से सऊदी अरब के सामने एक कठिन रणनीतिक स्थिति बनती दिखाई दे रही है। एक तरफ ईरान और उससे जुड़े हूती समूह का क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ रहा है, दूसरी तरफ अमेरिका सीधे सैन्य कार्रवाई से फिलहाल बच रहा है। वहीं, मिस्र ने सऊदी के समर्थन और क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग की बात तो कही है, लेकिन सीधे सैन्य हस्तक्षेप को लेकर तस्वीर स्पष्ट नहीं है। इसलिए आने वाले दिनों में रियाद की रणनीति केवल अमेरिका पर निर्भर रहने के बजाय मिस्र, तुर्किये, पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के साथ सुरक्षा और कूटनीतिक संबंध मजबूत करने पर केंद्रित हो सकती है। हालांकि इनमें से कोई भी देश फिलहाल अमेरिका की सैन्य भूमिका का पूर्ण विकल्प नहीं है। मध्य-पूर्व में बदलते समीकरणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि सऊदी अरब अपनी सुरक्षा के लिए किस हद तक क्षेत्रीय साझेदारों पर निर्भर करेगा और अमेरिका इस संकट में कितनी दूर तक उसके साथ खड़ा रहेगा।

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