नेपाल में बालेन सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव, चीफ जस्टिस की नियुक्ति को लेकर तनातनी

राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया

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Nepal Chief Justice Appointment Tensions: काठमांडू। नेपाल में कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य तनाव खुलकर सामने आने लगा है। सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश पद पर वरिष्ठता क्रम की परंपरा से हटकर नियुक्ति की सिफारिश किए जाने के बाद राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री बालेन शाह (PM Balen Shah)  की अध्यक्षता वाली संवैधानिक परिषद ने 7 मई को न्यायमूर्ति मनोज शर्मा को नेपाल के प्रधान न्यायाधीश पद के लिए राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल  के समक्ष अनुशंसित किया। विशेष बात यह रही कि न्यायमूर्ति शर्मा सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठता सूची में चौथे स्थान पर हैं। Nepal News

नेपाल में परंपरागत रूप से सर्वोच्च न्यायालय (Nepal Supreme Court) के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को ही प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया जाता रहा है। ऐसे में इस निर्णय ने दशकों पुरानी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। राष्ट्रीय सभा के अध्यक्ष नारायण दहल तथा प्रतिनिधि सभा में विपक्ष के नेता भीष्म राज अंगदेम्बे ने परिषद के निर्णय पर असहमति प्रकट करते हुए लिखित आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए स्थापित परंपराओं का सम्मान किया जाना आवश्यक है। कार्यवाहक प्रधान न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ला ने भी परिषद के निर्णय पर कड़ा प्रतिरोध व्यक्त किया।

74वें राष्ट्रीय विधि दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम के पश्चात उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को कार्यपालिका के प्रभाव में लाने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि न्याय व्यवस्था को ऐसी संस्था में परिवर्तित करने का प्रयास हो रहा है, जो शासन के समक्ष आत्मसमर्पण कर दे। मल्ला ने कहा कि वरिष्ठता की स्थापित परंपरा को तोड़ना न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए गंभीर संकेत है। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि न्यायमूर्ति मनोज शर्मा ने अन्य वरिष्ठ न्यायाधीशों की तुलना में अधिक दक्षता और कार्यक्षमता प्रदर्शित की है। Nepal News

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सपना प्रधान मल्ला ने कहा कि केवल मामलों की संख्या के आधार पर किसी न्यायाधीश की योग्यता का आकलन नहीं किया जा सकता। न्यायिक निर्णयों की गुणवत्ता और उनके दीर्घकालिक प्रभाव को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। विधि दिवस समारोह के दौरान मल्ला ने न्यायाधीशों से निर्भीक होकर न्याय करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि किसी भी प्रकार के राजनीतिक दबाव, बहुमत की शक्ति अथवा महाभियोग की आशंका से न्याय की गरिमा प्रभावित नहीं होनी चाहिए। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और सम्मान बनाए रखने के लिए निष्पक्ष एवं साहसपूर्ण निर्णय आवश्यक हैं।

पूर्व प्रधान न्यायाधीश Sushila Karki ने भी परिषद के निर्णय की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि अत्यंत योग्य महिला न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ला को शीर्ष पद से वंचित करना निराशाजनक है। कार्की ने इसे देश की महिलाओं के सम्मान से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि न्यायपालिका में योग्यता और अनुभव को सर्वोच्च महत्व मिलना चाहिए। संवैधानिक विशेषज्ञ बिपिन अधिकारी ने भी इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि संविधान परिषद को कनिष्ठ न्यायाधीश की सिफारिश करने से नहीं रोकता, किंतु वरिष्ठता की परंपरा टूटने से भविष्य में सरकारों को अपनी पसंद के उम्मीदवारों को शीर्ष पदों तक पहुंचाने का अवसर मिल सकता है। Nepal News

इससे न्यायपालिका की स्वायत्तता प्रभावित होने की आशंका बढ़ेगी। उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश के प्रदर्शन का मूल्यांकन केवल निर्णयों की संख्या से नहीं किया जा सकता। न्यायिक दृष्टांत स्थापित करने की क्षमता तथा फैसलों की गुणवत्ता अधिक महत्वपूर्ण होती है। नेपाल के संविधान के अनुच्छेद 129 के अनुसार, जो न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय में कम से कम तीन वर्ष तक सेवा दे चुका हो, वह प्रधान न्यायाधीश पद के लिए पात्र माना जाता है। हालांकि, अब तक सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को यह दायित्व सौंपने की परंपरा कायम रही थी।

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