मानसून की चुनौती: आपदा नहीं, अब तैयारी की परीक्षा
मानसून की चुनौती: आपदा नहीं, अब तैयारी की परीक्षा
पूनम आई कौशिश
रसात भारत के लिए नई घटना नहीं है। सदियों से मानसून खेती, जलस्रोतों और जीवन का आधार रहा है। फिर भी हर वर्ष वर्षा के आते ही देश के अनेक शहरों और कस्बों की स्थिति यह संकेत देती है कि हमारी तैयारियां मौसम के सामने टिक नहीं पातीं। कहीं सड़कें जलमग्न हो जाती हैं, कहीं पुल क्षतिग्रस्त हो जाते हैं, कहीं भूस्खलन लोगों की जान ले लेता है और कहीं घरों में गंदा पानी भर जाता है। कुछ ही घंटों की तेज वर्षा सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर देती है। सबसे चिंता की बात यह है कि यह दृश्य हर वर्ष दोहराया जाता है, फिर भी स्थायी समाधान दिखाई नहीं देता।
मानसून के दौरान होने वाली परेशानी को अक्सर प्राकृतिक आपदा मानकर छोड़ दिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अलग है। तेज वर्षा को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, पर उसके प्रभाव को योजनाबद्ध ढंग से काफी हद तक कम किया जा सकता है। यदि जल निकासी की व्यवस्था मजबूत हो, नालों की नियमित सफाई हो, वर्षा जल के प्राकृतिक मार्ग सुरक्षित रहें और निर्माण कार्य वैज्ञानिक मानकों के अनुसार किए जाएं, तो नुकसान बहुत कम हो सकता है। दुर्भाग्य से अनेक स्थानों पर इन मूलभूत बातों की अनदेखी वर्षों से होती रही है। हर वर्ष वर्षा से पहले नगर निकाय और संबंधित विभाग तैयारियों के बड़े दावे करते हैं। सफाई अभियान चलाने, पंपों की व्यवस्था करने और संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने की घोषणाएं होती हैं। मगर पहली तेज बारिश के साथ ही अधिकांश दावे खोखले साबित हो जाते हैं। जिन स्थानों पर हर वर्ष जलभराव होता है, वहीं सबसे पहले यातायात ठप पड़ जाता है। इससे स्पष्ट होता है कि योजनाएं कागजों तक सीमित रह जाती हैं और उनका प्रभाव धरातल पर नहीं दिखता।
शहरी विस्तार भी इस समस्या का बड़ा कारण बन चुका है। अनेक शहरों में तालाब, आर्द्रभूमियां और प्राकृतिक जलमार्ग अतिक्रमण की भेंट चढ़ गए हैं। उनके स्थान पर इमारतें और सड़कें बना दी गईं, जिससे वर्षा का पानी निकलने का स्वाभाविक रास्ता समाप्त हो गया। परिणाम यह हुआ कि थोड़ी देर की वर्षा भी बड़े क्षेत्रों को जलमग्न कर देती है। जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप अधिक अनिश्चित अवश्य हुआ है, पर अधिकांश समस्याएं अव्यवस्थित विकास और कमजोर शहरी नियोजन से जुड़ी हैं।
देश ने पिछले वर्षों में राजमार्गों, पुलों, हवाई अड्डों और अनेक आधुनिक परियोजनाओं के निर्माण में उल्लेखनीय प्रगति की है। इससे यह सिद्ध होता है कि संसाधनों, तकनीक और अभियंत्रिकी क्षमता की कमी नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि यही गंभीरता वर्षा प्रबंधन, जल निकासी तंत्र, भवन निर्माण नियमों और पर्यावरण संरक्षण में भी दिखाई दे। विकास का अर्थ भव्य निर्माण भर नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था तैयार करना भी है जो कठिन परिस्थितियों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सके। प्राकृतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण भी चिंता का विषय है। पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ रही हैं, जबकि महानगरों में जलभराव सामान्य समस्या बन चुका है। वर्ष 2022 में उत्तराखंड के जोशीमठ में भूमि धंसने की घटना और बेंगलुरु जैसे बड़े नगरों में बार-बार होने वाला जलभराव यह संकेत देता है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए बिना भविष्य की चुनौतियों का सामना करना कठिन होगा।
समस्या का एक महत्वपूर्ण पक्ष जवाबदेही का अभाव भी है। हर बड़ी घटना के बाद जांच समितियां बनती हैं, रिपोर्ट तैयार होती है और सुधार के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन अगले वर्ष स्थिति फिर वैसी ही दिखाई देती है। आपदा आने के बाद राहत कार्य आवश्यक हैं, पर उससे अधिक महत्वपूर्ण है ऐसी व्यवस्था विकसित करना जिससे नुकसान होने की संभावना पहले ही कम हो जाए। रोकथाम पर निवेश हमेशा राहत कार्यों की तुलना में अधिक प्रभावी और लाभकारी सिद्ध होता है।
आज आवश्यकता अल्पकालिक उपायों की नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सोच की है। नगर नियोजन, जल संरक्षण, प्राकृतिक जलमार्गों की सुरक्षा, नियमित रखरखाव, विभिन्न विभागों के बीच समन्वय और निर्माण नियमों का कठोर पालन भविष्य की प्राथमिकता बनना चाहिए। जब तक इन विषयों पर पूरे वर्ष गंभीरता से कार्य नहीं होगा, तब तक मानसून के साथ आने वाली परेशानियां भी हर वर्ष दोहराती रहेंगी।
भारत के लिए मानसून किसी संकट का प्रतीक नहीं है। यह जीवन, कृषि और अर्थव्यवस्था की आधारशिला है। चुनौती वर्षा नहीं, बल्कि हमारी तैयारी और व्यवस्था की है। यदि नीति निर्माण में दूरदृष्टि, प्रशासन में जवाबदेही और विकास में पर्यावरणीय संतुलन को समान महत्व दिया जाए, तो मानसून फिर से समृद्धि का संदेशवाहक बन सकता है। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति इस बात से मापी जाती है कि वह अनुमानित चुनौतियों का सामना पहले से कितनी तैयारी के साथ करता है। अब समय आ गया है कि मानसून को दोष देने के स्थान पर व्यवस्था को अधिक सक्षम और उत्तरदायी बनाया जाए।
यह लेखक के अपने विचार हैं