सतगुरू जी ने जीव को सिखाया ईमानदारी पर चलना

Mastana-Ji-Maharaj

शाह मस्ताना जी धाम सरसा में मासिक सत्संग पर भारी संख्या में साध-संगत पहुंची हुई थी। पूर्व की तरफ कच्चे रास्ते पर पुराना मुख्य द्वार था। सरसा के भक्त माना राम छाबड़ा व कुछ अन्य फल बेचने वाले भी डेरे के बाहर अपनी अस्थाई दुकानें लगाकर अपना सामान बेचने आए हुए थे। सत्संग शुरू होने पर कविराजों द्वारा कई भजन बोले गए-‘मेरे सतगुरू जी अपने चरणों में बुलाना…’ तथा ‘झूठा है संसार तू कर ले सतगुरू नाल प्यार…’ जैसे मीठे-मीठे शब्द बोले जा रहे थे। तभी पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज स्टेज पर पधारे। सारी साध-संगत में खुशी की लहर दौड़ गई और बहुत सारे भक्त नाचने लगे। साध-संगत का नारा कबूल करने के बाद आप जी ने फरमाया, ‘‘इस जिंदगी का कोई भरोसा नहीं। जल्दी से जल्दी परम संतों से पूूछकर अपने छुटकारे का काम पूरा करें। देर करने का वक्त ही नहीं है। ये रहने की जगह नहीं। ये एक मुसाफिर खाना है। राम साहूकार सबके अंदर है। परम संतों की मेहर से वह मिलता है। फिर यह काम उसके बिना और किसी ताकत के वश में नहीं है। वो बहुत बलवान है और सब काम करने में समर्थ है।’’ तीन घंटों तक सत्संग चला।

सत्संग के अंत में दातार जी ने कम्बल व कपड़े लगभग तीन दर्जन सेवादारों को दात में दिए। छ:-सात सेवादारों को सोने की अंगूठियां दात में दी। सेवादार दात प्राप्त करके प्रसन्नता से झूमने लगे। आश्रम के मुख्य गेट के बिल्कुल पास एक आम बेचने वाले ने अपनी रेहड़ी पर फजली नस्ल के बडे-बड़े आकार के लगभग तीन मण आम बेचने के लिए रखे हुए थे। जिनकी कीमत लगभग 200 रूपये थी। बाकी फल बेचने वालों की दुकानें मेन गेट से कुछ आगे हटकर लगी हुई थीं। पूजनीय बेपरवाह शाह मस्ताना जी महाराज सत्संग के बाद सीधे मुख्य गेट के पास आम वाली रेहड़ी के पास आ गए। साध-संगत भी पीछे-पीछे आ गई। बेपरवाह जी ने आम बेचने वाले को कहा कि अपना तोलने वाला व अन्य सामान संभाल कर रख लो क्योंकि इस रेहड़ी के सारे आम मोल लेकर साध-संगत को खाने के लिए देने हैं। आम बेचने वाला मन ही मन बहुत ही खुश हो रहा था क्योंकि उसके सारे आम इक्ट्ठे बिक रहे थे। वह आप जी की दयालुता को जानता था कि आप जी सामान की कुल मांगी कीमत से ज्यादा रूपये देते हैं। उसके मन में लालच आ गया। शहनशाह जी ने साध-संगत को रेहड़ी पर रखे आमों को उठा लेने को कहा। साध-संगत द्वारा सारे आम उठा लिए गए।

बेपरवाह जी ने आम बेचने वाले से आमों की कीमत पूछी। लोभ में आकर उसने बताया कि मेरी रेहड़ी पर रखे आमों का मुल्य 400 रूपये है। बेपरवाह जी ने सारी साध-संगत को फरमाया, ‘‘सभी आम वापिस रेहड़ी पर रख दो।’’ हुक्मानुसार खाने के लिए उठाए गए सारे आम तुरंत ही वापिस रेहड़ी पर रख दिए गए। वह हक्का-बक्का रह गया। बेपरवाह जी ने उसे समझाया कि ज्यादा लालच नहीं करना चाहिए। यह बहुत बुरा होता है। उसके बाद बेपरवाह जी अन्य फल विक्रेताओं द्वारा लगाई गई दुकानों पर पहुंचे। इसके बाद शहनशाह जी गेट के बाहर लगी चाय की दुकान पर गए। सरसा का सत्संगी हरबंस लाल चाय बनाकर बेच रहा था। चाय बनाने के लिए दूध जो पास ही बाल्टी में रखा था वह बहुत पतला लग रहा था। शहनशाह जी ने अपना पावन हाथ दूध वाली बाल्टी में डाला व बाहर निकालकर उस चाय बेचने वाले को समझाया कि दूध में पानी मिलाना बुरा है। मिलावट करके सामान बेचना गंदी आदत है, लोभ से बचो। चाय बनाते समय आप चाहे दूध कम डाल दिया करो परंतु दूध में पानी नहीं मिलाना चाहिए। एक सेवादार को शहनशाह जी ने फरमाया कि इस पानी मिले दूध को धरती में गड्ढ़ा खुदवाकर दबा दो।

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