कहानी : बाग का माली

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Story: Gardener of the Garden

लेखक: आंनद बिल्थरे

वैभव ने, बी.एस.सी. की परीक्षा अच्छे नंबरों से पास कर ली थी। वह आगे पढ़ना चाहता था, किंतु वीनू से घर की स्थिति और केशव का टूटता स्वास्थ्य छिपा नहीं था। वीनू, चाहती थी कि वैभव, अब कहीं भी छोटी-मोटी नौकरी कर केशव का हाथ बंटाए। वीनू की जिद्द के आगे केशव झुक गया। दफ्तरों समाचार पत्रों नेट आदि में नौकरी की तलाश शुरू हो गई। पिछले छ: माह से, दरख्वास्त लिखते और इंटरव्यू देते-देते, वैभव की हालत खराब हो गई। आज इंटरव्यू से लौटकर वैभव बहुत खुश था। पहली बार, किसी अधिकारी ने, उससे अच्छे से बात की थी। प्रमाण-पत्र पलटते-पलटते उन्होंने पूछा था- – केशवप्रसाद सिन्हा आपके पिता हैं?

– यस सर।
– क्या करते हैं वे?
– सर वे, मिडिल स्कूल में प्रधान अध्यापक हैं।
– ठीक है। कल आप उन्हें हमारे पास, भिजवा दीजिये।
दूसरे दिन केशव, अधिकारी से मिलने गया। चपरासी ने बताया कि साहब बहुत व्यस्त हैं। आप, अपने नाम की चिट दे दें। चिट देखते ही घण्टी बजी। चपरासी लपककर, भीतर गया और उल्टे पांव लौटकर केशव से बोला- चलिये, साहब ने आपको बुलवाया है।

परदा हटाकर केशव भीतर गया। रिवालिंग चेयर पर फाइलों के बीच, साहब बैठे थे। दोनों एक-दूसरे को, अपलक देखने लगे। वक्त का अंतराल, जैसे सिमट गया। अचानक, साहब ने केशव को, बांहों में भर लिया।

– केशव, मुझे अब भी यकीन नहीं हो रहा है। मैं तो इस जन्म में तुमसे मिलने की, आस ही छोड़ बैठा था।
– लेकिन मैं निराश नहीं हुआ था पारस। मुझे विश्वास था कि, एक न दिन, किसी मोड़ पर तुमसे, भेंट अवश्य होगी।
दोनों पीछे बनें, रिटयारिंग रूम में जाकर बैठ गये। पारस ने चपरासी को बुलाकर चाय-नाश्ते का हुक्म दिया और कहा कि अब, किसी को भी, भीतर आने की इजाजत न दी जाये। दोनों खामोश, एक-दूसरे के सामने बैठे थे। दोनों की आंखों से गंगा-जमुना प्रवाहित हो रही थी। समय कुछ देर के लिये थम गया सा, लगता था। केशव मुझे तो अब भी यकीन नहीं हो रहा है कि तुम, मेरे सामने बैठे ंहो।

– बीस साल का फासला, कुछ कम नहीं होता पारस। बच्चे जवान हो गये और जवान बूढ़े। जिन्दगी कैसी चल रही है केशव।
– न अंच्छी, न बुरी। कर्तव्य के आगे सिर झुकाकर बरसों से मास्टरी की गाड़ी खींच रहा हूं। ब्याह हो गया? एक बच्चा है- वैभव। कल तुम्हारे दफ्तर में, इंटरव्यू देने आया था। तुम बहुत बूढ़े और बीमार से लग रहे हो? हां, इन बिन बुलाये, मेहमानों की मुझे कमी नहीं रही है। कहां गये वे दिन। वे, सुनहरे दिन, कहां गये केशव? पारस की आखें, फिर छलक पड़ी।

– वक्त मुट्ठी की रेत की तरह है पारस जितनी जोर से बांधों उतनी जोर से, फिसलती जाती है। हालात से मैं भी कुछ कम नहीं लड़ा हूं केशव। ‘सट्टा और शेयर मार्केट में, घाटा खाने के बाद, पिताजी, आर्थिक दृष्टि से बिल्कुल टूट गये थे। घर की एक-एक चीज बंधक पड़ी थी। मुनीम से उनकी बीमारी की सूचना पाकर, एकाएक मुझे घर जाना पड़ा। पिताजी बीमार तो नहीं थे, लेकिन स्वस्थ भी नहीं थे। उन्होंने आंखें नीची कर सारी स्थिति मेरे सामने खोलकर रख दी। फिर एक लंबी सांस, लेते हुए बोले कि इस स्थिति से उबरने का एक ही रास्ता है और वह है सेठ राधाप्रसाद की बेटी सुनन्दा से मेरा ब्याह।

वीनू के रहते, सुनन्दा का ख्याल भी मेरे लिये, पाप था, किन्तु मां के दूध की सौगंध और तिल-तिलकर आत्म ग्लानि में मृत्यु की ओर बढ़ते पिता ने मेरे पांव में जंजीर डाल दी। मैं जानता था, यह अपने जमीर से धोखा है, लेकिन मैं मजबूर था। सुनंदा से, ब्याह के बाद, सेठ राधाप्रसाद ने दूर शहर में, मेरी पढ़ाई और कोचिंग का प्रबंध करवा दिया। उन्होंने प्रयास और रसूख से, मैं भारतीय वन सेवा में आ गया। जीवन में स्थापित होने के बाद मैंने वीनू की, तुम्हारी बहुत खोज की, किन्तु कुछ पता नहीं चला। खैर वैभव की नौकरी का क्या हुआ?

– केशव, मैंने अपने में और तुम में, कभी फर्क नहीं समझा है। नौकरी, मिल जायेगी, किन्तु तुम उसे आगे क्यों नहीं पढ़ाते। अभी उसकी उम्र ही क्या है? उसकी मां की जिद है कि वह नौकरी करे।
– अच्छा पारस चलता हूं। कभी वक्त मिले तो घर आना। ज्योति सिनेमा के पीछे, र्क्वाटर नंबर 17/21 में रहता हूँ। पारस कुछ नहीं बोला। दूसरे दिन शाम को, जैसे ही गाड़ी का हार्न बजा, केशव बाहर निकल आया और पारस का हाथ थामकर उसे भीतर बैठक में बिठा दिया। प्रणाम अंकल। वैभव ने चरण छूते हुए कहा-जीते रहो। वैभव जरा देखो तो भीतर क्या बन रहा है।

डबलरोटी की भुजिया, खाते हुए, पारस की आखें भर आर्इं।
– केशव, तुम्हें याद है कालेज से निकलकर हम तीनों, घण्टा वाले चौक पर महादेव चाट वाले से इसी तरह की भुजिया खाया करते थे? हां पारस बीते हुए कल का एक-एक पल, मुझे याद है। उसी पल के इंतजार में तो मैं जी रहा हूं। केशव एक बात बता यार। तुझे मेरी सौगंध। क्या तुम्हें कभी वीनू मिली थी? अब क्या लाभ है वीनू की याद से। क्या तुम्हें यह भी याद नहीं रहा कि वीनू अब तुम्हारी पत्नी है और उसकी रक्षा तुम्हारा धर्म है।

– केशव तुम्हें पता है न कि मुझे किन, दुरूह परिस्थतियों से दो चार होना पड़ा था। लेकिन वे परिस्थितियां, वीनू को समाज में स्थान और बच्चे को अपना नाम नहीं दिला सकती थीं। वीनू को ठुकराने की ही सजा तो मैं आज तक भुगत रहा हूं केशव। ब्याह के कुछ दिन बाद सुनन्दा के पांव भारी हुए। प्रसव के बाद बच्चा पेट में मर गया और सुनन्दा ने आपरेशन टेबिल पर प्राण त्याग दिये। ईश्वर साक्षी है कि सुनन्दा से मैंने कभी प्यार नहीं किया। वीनू का प्यार, अधूरे में, सपने की तरह टूट गया और शायद इसीलिये मैं आज भी अंधेरे में, भटक रहा हूं। पारस, ईश्वर का न्याय भी बड़ा विचित्र है। वह सभी को, सभी सुख, एक साथ नहीं देता। अच्छा, मैं चलंू केशव।

– अभी कहां पारस। वैभव के मां के हाथ की रसोई का, रूखा-सूखा खाए बगैर तुम कैसे जा सकते हो। घर का खाना खाये तो बरसों बीत गये मेरे भाई। मुझे तो अब उसका स्वाद भी याद नहीं है। जो, जैसा कुछ, नौकर बना देते हैं। पेट में डाल लेता हूं। कई बड़ी-बड़ी बीमारियां भी पाल रखी हैं। बस, जिन्दगी चलती का नाम गाड़ी है। थाली में अपनी पसंद की, सारी चीजें देखकर, पारस की आंखों में पानी भर आया। पुरानी स्मृतियां, ताजी हो गईं। खाने के बाद, तौलिये से हाथ पौंछता हुआ बोला: अब चलूं केशव।

– क्या वैभव की मां से, मिले बगैर ही चले जाओगे? वैभव, जरा, अपनी मां को भेजना बेटा। एक कृशकाय नारी मूर्ति आकर सामने खड़ी हो गई। सहसा, जैसे, बांध फूट पड़ा हो, उसके कंठ से, हिचकियां निकलने लगीं। अगर पारस उसे नहीं संभालता तो वह वहीं गिर पड़ती।
– वीनू तुम? पारस को, एकाएक अपनी आखों पर विश्वास नहीं हुआ। केशव कहीं यह सपना तो नहीं है? यह स्वप्न नहीं, सत्य है पारस।

दोनों ने मिलकर वीनू को सोफे पर बिठा दिया। वैभव दौड़कर एक ग्लास पानी ले आया। जिस दिन तुम अपने पिता की बीमारी की सूचना पाकर अचानक चले गये, उसी दिन वीनू ने बताया कि वह तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली है। हमने तुम्हें बहुत पत्र लिखे। तार दिया। प्रतीक्षा की और जब पानी सिर पर से होकर गुजरने लगा, मैं वीनू को लेकर अपने गांव चला आया। मेरी मां ने यह नहीं पूछा कि लड़की कौन है, कहां की है, मेरा उससे, क्या रिश्ता है और चुपचाप स्वीकार कर लिया।

वीनू को बचाने का, उसके अजन्मे बच्चे को, समाज में नाम और इज्जत दिलाने का उस वक्त एक यही तरीका, मेरी समझ में आया कि मैं उसे, पिता के रूप में अपना नाम दूं। पारस, वैभव तुम्हारा बेटा है और वीनू तुम्हारी पत्नी। मैंने सिर्फ माली बनकर तुम्हारे बाग की रक्षा की है। मुझे विश्वास था, एक न एक दिन, तुमसे अवश्य भेंट होगी।
– केशव। हां, मेरे यार, तेरा प्यार रूसवा हो जाता, तो क्या मैं जीवित रह सकता था। वीनू उठो, संभालों अपने पारस को। वैभव, ये पारस है- तुम्हारे पिता। इनके गले लगो। इन्होंने भी जीवन में बहुत दु:ख उठाये हैं।

– बाबा, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं रह सकता बाबा। तुम्हारी हालत क्या अब अकेले रहने की है? अरे पगले, मैं अपनी जिन्दगी जी चुका। मेरे जीने का उद्देश्य भी आज पूरा हो गया। अब मैं रिटायर होकर गांव में रहूंगा। भैया: वीनू बोली- आज तक बांधी राखियों का वास्ता देकर कहती हूं, इन्कार मत करना। तुमने मेरी और वैभव की, जिस तरह सुरक्षा की है कोई सगा भाई भी नहीं कर सकता। तुम, हमारे साथ ही चलो भईया।

– अरे, चलेगा कैसे नहीं। तूं, जानता है केशव, मैं कितना जिद्दी हूं। कुछ तो कर्ज उतारने का मौका दो, मेरे भाई। दहेज में, भाई को भी साथ ले जाना चाहता है-पारस। केशव ने, वातावरण को, हल्का करने की कोशिश की। चारों चेहरे भीगी आंखों से, एक दूसरे की, बांहों में गुथ गये।

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