लोकतंत्र को कमजोर करती है हिंसा

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पश्चिम बंगाल के कूचबिहार में विधानसभा चुनाव की वोटिंग के दौरान हुई फायरिंग की घटना में 4 लोगों की मौत हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस घटना को काफी दुखद बताया है और चुनाव आयोग से कड़ी कार्रवाई का अनुरोध किया है, वहीं टीएमसी नेता ममता बनर्जी ने सीआरपीएफ पर लोगों को मारने के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि सीआरपीएफ मेरी दुश्मन नहीं है, लेकिन गृह मंत्री के निर्देश के तहत एक साजिश चल रही है और आज की घटना एक सबूत है, सीआरपीएफ ने कतार में खड़े वोटरों को मारा है। ऐसा माना जा रहा है कि टीएमसी और बीजेपी के कार्यकतार्ओं में झड़प हुई जिसके बाद सीएपीएफ के जवानों ने ओपन फायरिंग की। इस घटना में मारे गए सभी लोग टीएमसी के कार्यकर्ता हैं। पश्चिम बंगाल में यह असहिष्णुता पंचायत, निकाय, विधानसभा और लोकसभा चुनावों में एक स्थाई चरित्र के रूप में मौजूद रहती है।

इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब हिंसा और अराजकता के लिए बदनाम राज्य बिहार और उप्र इस हिंसा से मुक्त हो रहे हैं, तब बंगाल और केरल में यह हिंसा बेलगाम होकर सांप्रदायिक रूप में दिखाई दे रही है। चूंकि नए साल की शुरूआत में बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं, इस नजरिए से मुख्य राजनीतिक दलों में जनता के बीच समर्थन जुटाने की होड़ लग गई है। जेपी नड्डा के काफिले पर हुआ हमला इसी होड़ का परिचायक है। यह हिंसा तब हुई, जब जेपी नड्डा को जेड स्तर की सुरक्षा मिली हुई है। फिर भी इसे भेदने की निंदनीय कोशिशें हुईं तो यह चिंतनीय पहलू है। बंगाल की राजनीति में विरोधी दलों के नेताओं और कार्यकतार्ओं की हत्याएं होती रही हैं। वामदलों के साढ़े तीन दशक चले शासन में राजनीतिक हिंसा की खूनी इबारतें निरंतर लिखी जाती रही थीं। दरअसल वामपंथी विचारधारा विरोधी विचार को तरजीह देने की बजाय उसे जड़ मूल खत्म करने में विश्वास रखती है।

हिंसा की इस राजनीतिक संस्कृति की पड़ताल करें तो पता चलता है कि 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का पहला सैनिक विद्रोह इसी बंगाल के कलकत्ता एवं बैरकपुर में हुआ था, जो मंगल पाण्डे की शहादात के बाद 1947 में भारत की आजादी का कारण बना। बंगाल में जब मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी, तब सामाजिक व आर्थिक विषमताओं के विद्रोह स्वरूप नक्सलवाड़ी आंदोलन उपजा। लंबे समय तक चले इस आंदोलन को क्रूरता के साथ कुचला गया। हजारों दोषियों के दमन के साथ कुछ निर्दोष भी मारे गए। इसके बाद कांग्रेस से सत्ता हथियाने के लिए भारतीय मार्क्सवादी कम्युनिष्ट पार्टी के नेतृत्व में वाममोर्चा आगे आया। इस लड़ाई में भी विकट खूनी संघर्ष सामने आया और आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव में वामदलों ने कांग्रेस के हाथ से सत्ता छीन ली।

लगातार 34 साल तक बंगाल में मार्क्सवादियों का शासन रहा। इस दौरान सियासी हिंसा का दौर नियमित चलता रहा। तृणमूल सरकार द्वारा जारी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1977 से 2007 के कालखंड में 28 हजार राजनेताओं की हत्याएं हुर्इं। 2011 के विधानसभा चुनाव में जब बंगाल में हिंसा नंगा नाच, नाच रही थी, तब ममता ने अपने कार्यकताओं को विवेक न खोने की सलाह देते हुए नारा दिया था, ‘बदला नहीं-बदलाव चाहिए।’ लेकिन बदलाव के ऐसे ही कथन अब ममता को असामाजिक व अराजक लग रहे हैं। यदि राजनीतिक वातावरण में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर होगी तो संविधान के मूल्यों को आघात लगेगा।

 

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