Arhar Cultivation: कम बारिश में भी होगी अच्छी कमाई! खरीफ सीजन में बोएं ये फसलें

अरहर और सोयाबीन बन सकते हैं किसानों के लिए फायदे का सौदा

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डॉ. संदीप सिंहमार।

इस साल मौसम विभाग ने खरीफ के दौरान सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताई है। चावल जैसी जल-निर्भर फसलों के लिए यह खबर चिंताजनक है, लेकिन कम बारिश का मतलब हर बार नुकसान नहीं। सही रणनीति अपनाई जाए तो किसान इस चुनौती को अवसर में बदल कर अच्छे लाभ कमा सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक डॉ. अनुराधा रंजन ने भी यही सुझाव दिया है। लंबी अवधि वाली पारंपरिक धान की किस्मों के स्थान पर कम समय में तैयार होने वाली किस्में चुनें और जहाँ संभव हो, धान के विकल्प के रूप में दलहन- खासकर अरहर (पीजों/तूअर) व सोयाबीन जैसी फसलों पर विचार करें। Arhar Cultivation

कम पानी में भी टिकती है अरहर की फसल

अरहर की जड़ें सूखा सहने की क्षमता रखती हैं, इसलिए सीमित वर्षा में भी उपज देती है। उच्च तापमान में भी अरहर विकास करती है, जो बदलते मौसम में एक बड़ा फायदा है। अरहर की मांग घरेलू बाजार और दाल मिल दोनों में स्थिर रहती है, जिससे उसे अच्छी कीमत मिल सकती है। अरहर बायोलॉजिकल नाइट्रोजन फिक्सेशन करती है; इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और आने वाली फसलों के लिए लाभकारी रहता है।

अरहर की बुवाई

मौसम और मिट्टी की जांच करें। अगर क्षेत्र में मानसून कमजोर शुरू हुआ या अनिश्चित है, तो देर न करें-बीज का अंकुरण और शुरूआती सिंचाई की वजह से बुवाई का समय महत्वपूर्ण होता है। मिट्टी हल्की-से-दोमट हो तो अरहर अच्छी तरह विकसित होती है। कम अवधि की किस्में अपनाएँ: जो किस्में 90 से 110 दिनों में तैयार हो जाती हैं उनसे जोखिम कम होगा। स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय/केंद्र की सुझाई हुई प्रमाणित किस्में ही प्रयोग करें। Arhar Cultivation

बीज उपचार व रोपण

फसल रोगों से बचाने के लिए बीज को फंगिसाइड या बायो-फर्टिलाइजर से उपचारित करें। रौपण या सीधी बुवाई दोनों में स्थानीय मौसम और संसाधन (जैसे ट्रैक्टर, बीज मेकैनिकिजेशन) के अनुसार निर्णय लें। अनुशंसित पंक्ति दूरी और पौधों के बीच की दूरी में बुआई करें ताकि पौधे पर्याप्त हवा व पोषक तत्व प्राप्त कर सकें और सूखा प्रभाव कम हो।  बुवाई के बाद मिट्टी की ऊपरी परत पर नमी बनी रहे इसके लिए मल्चिंग करें, जल-संरक्षण तकनीकें अपनाएँ (जैसे बूँद सिंचाई यदि संभव हो)।

उर्वरक और कीट प्रबंधन

अरहर जैसी दालों के लिए अत्यधिक नाइट्रोजन हानिकारक हो सकता है। जैविक खाद व नीत्रजन-फिक्सिंग बैक्टीरिया (राइजोबियम) के उपयोग से लागत घटेगी और उत्पादन टिकाऊ होगा।  वृद्धि के लिए आवश्यक हैं- मिट्टी परीक्षण के बाद ही आवश्कता के अनुसार मात्रा दें। कॉकरोच, सफेद मक्खी या बैक्टीरियल रोगों पर नजर रखें। समय पर नियंत्रक छिड़काव और रोग-प्रतिरोधी किस्मों का उपयोग करें। जैविक कीट नियंत्रण (नीम, ट्रैपिंग) से लागत नियंत्रित रहेगी। Arhar Cultivation

धान के अन्य विकल्प

सोयाबीन: कम पानी में बेहतर; प्रोटीन व आॅइल के लिए बाजार में मांग; अरहर के साथ फसल रोटेशन में मददगार।  

मूँग/मसूर: छोटे क्षेत्र में उपज और कम निवेश वाली विकल्प।  

तिलहन: कुछ सूखा सहने वाली तिलहन किस्में सीमित वर्षा में अच्छा रिटर्न दे सकती हैं। परन्तु बीज कीमत और बाजार की स्थिति का ध्यान रखें।

बाजार और जोखिम प्रबंधन

बाजार की जानकारी रखें। फसल बोने से पहले स्थानीय मंडी भाव और क्रय-योग्य प्रोसेसिंग यूनिटों से संपर्क करें। दालों के लिए मंडी में मांग समय-समय पर बदल सकती है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और अन्य स्थानीय उपायों की जानकारी लें और समय पर पॉलिसी लें ताकि सूखे का आर्थिक प्रभाव कम हो। किसान उत्पादक संगठन या सहकारी समितियों के माध्यम से खरीद और विपणन में शामिल होकर लागत घटाएं और बेहतर मूल्य पाएं। Arhar Cultivation

व्यावहारिक सुझाव 

लंबी अवधि वाले धान की जगह जल्दी पकने वाली धान किस्में या धान विकल्प चुनें। अरहर और सोयाबीन जैसी सूखा-सहने वाली दलहन अपनाएँ। बीज उपचार, राइजोबियम जैसे जैविक इनोवेशन और मिट्टी परीक्षण पर ध्यान दें। मल्चिंग, जल-संरक्षण और घटिया सिंचाई तकनीकें अपनाएँ। बाजार संपर्क और फसल बीमा से जोखिम कम करें। कम वर्षा चुनौती जरूर है, पर सही फसल चयन और बेहतर कृषि प्रबंधन से किसान अपनी आय को सुरक्षित कर सकते हैं। अरहर खरीफ में एक व्यवहारिक और आर्थिक विकल्प है। यह कम पानी में भी उपज देता है, मिट्टी सुधारता है और बाजार में अच्छा रिटर्न दे सकता है। स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र की मार्गदर्शिका और प्रमाणित बीज तथा समय पर अपनाई गई तकनीकें आपकी फसल को लाभकारी बना सकती हैं। Arhar Cultivation

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