इतिहास को खुद में समेटे है गुरुग्राम का फर्रूखनगर

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जर्जर होती ऐतिहासिक इमारतों के संरक्षण को लेकर जागा पुरातत्व विभाग

  • दिल्ली गेट से भारी वाहनों के प्रवेश पर लगेगी पाबंदी

सच कहूँ/संजय मेहरा
गुरुग्राम। फर्रूखनगर कस्बे की ऐतिहासिक इमारतों को कहीं भारी वाहनों तो कहीं शरारती तत्वों द्वारा इनको क्षतिग्रस्त किया जा चुका है। यहां के प्रमुख दिल्ली दरवाजा (दिल्ली गेट) और गौस अली शाह द्वारा बनवाई गई बावड़ी के पास ऐतिहासिक दरवाजा की हालत काफी खस्ता हो चुकी है। हालांकि ये इमारतें बहुत ही मजबूत हैं, इसलिए क्षतिग्रस्त होने के बाद भी मजबूती से खड़ी हैं। इन ऐतिहासिक इमारतों व अन्य निर्माणों के रखरखाव को लेकर पुरातत्व विभाग की अब नींद खुली है। बता दें कि फरूखनगर मुगलों की आलीशान कलात्मता, वास्तुकला को अपने में समेटे है।

बड़े वाहनों ने गेट को बुरी तरह से कर दिया क्षतिग्रस्त

इस कस्बे में इन ऐतिहासिक इमारतों के मालिक बदलते रहे, लेकिन किसी ने भी इन इमारतों के रखरखाव पर कोई ध्यान नहीं दिया। आजादी के करीब 20 साल बाद ये ऐतिहासिक इमारतें सरकारों के कब्जे में आई, लेकिन बाद में इन पर लोगों ने ही कब्जे करने शुरू कर दिए। अब हालत यह हो चुकी है कि समय-समय पर बरसात आदि के गौस अली शाह ने कराया था निर्माण फर्रूखनगर के पहले नवाब और मुगल सम्राट फारुख सियार के शासनकाल के दौरान फर्रूखनगर में गौस अली शाह द्वारा बावड़ी का निर्माण किया गया था। पत्थर, चूने के प्लास्टर और र्इंटों से बनी यह बावड़ी कुछ हद तक तुर्की हम्माम से मिलती जुलती है। इसके केंद्र में पानी की टंकी एक बरामदे से घिरी हुई है, जिसके चारों तरफ अच्छी तरह से मेहराबदार मेहराब हैं। ऊपरी मंजिलों पर विश्राम और मनोरंजन के लिए कक्ष भी हैं।

कभी नमक कारोबार के लिए प्रसिद्ध था फर्रुखनगर

फारुख सियार के गवर्नर फौजदार खान द्वारा 1732 में स्थापित फर्रूखनगर ने 19वीं शताब्दी के अंत तक अपने नमक व्यापार के कारण खूब तरक्की की। इसके बाद 20 वीं शताब्दी की शुरूआत में ब्रिटिश राज के दौरान इसे छोड़ दिया गया था। 1857 के गदर के समय फौजदार खान का वारिस अहमद अली फरूखनगर का नवाब था। उसके अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में हिस्सा लेने के कारण इस कस्बे को गुड़गांव में मिला दिया गया।

रानी के लिए बनवाया था यह शीश महल

फर्रूखनगर की स्थापना का श्रेय मुगल शासक फौजदार खान को जाता है। इस मुगलशासक ने अपने शासन के दौरान कई ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण कराया। फौजदार खान द्वारा बनवाई गई ऐतिहासिक धरोहरों में से एक व प्रमुख है फर्रूखनगर का शीश महल। इस शीश महल का निर्माण सन् 1711 में करवाया गया था। यह महल लाल बलुआ पत्थर, लाखौरी र्इंटों और झज्जर स्टोन से बना हुआ है। इस शीश महल को मुगल शासक फौजदार खान ने अपनी रानी के लिए बनवाया था। शीश महल तीन तरफ दो मंजिला इमारतों से घिरा है। जिनमें अनेक कमरे हैं। शीश महल के नीचे एक खुफिया सुरंग भी है। यह सुरंग किले के बाहर कुछ दूरी पर एक बावड़ी में निकलती है। वहां पर रानी रोज स्नान के लिए जाती थी।

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वक्त के साथ फीकी पड़ी चमक

फर्रूखनगर शहर के बीचों-बीच बना शीश महल खड़ा जरूर है, लेकिन इसकी चमक अब फीकी पड़ चुकी है। शीश महल की चाहरदीवारी में घुसने के लिए एक मेहराबदार दरवाजे से होकर गुजरना होता है। चाहरदीवारी में महल के बीचों-बीच से नहर बनी है, जिसमें पानी पास लगती बावली से आता था। महल के मेहराबों और खंभों पर नफीस पच्चीकारी थी, जो अब नजर नहीं आती। बावड़ी भी समय के साथ अपना अस्तित्व खो चुकी है। यहां की बारादरी में शीशों के काम की वजह से इसका नाम शीश महल पड़ा, लेकिन अब यहां वह बात नहीं। दो मंजिले शीश महल की कुछ साल पहले रखरखाव के चलते मरम्मत जरूरी की गई, लेकिन इसके पीछे की तरह और इसके साथ का हिस्सा काफी क्षतिग्रस्त हो चुका है। इतिहासकार बताते हैं कि यह शीश महल सन् 1857 तक आबाद रहा था। इसके परिसर में 1857 के गदर के शहीदों की याद में एक स्मारक भी बना हुआ है।

अब यहां भारी वाहनों के प्रवेश पर लगेगा प्रतिबंध

ऐतिहासिक दरवाजों के बीच से बड़े व ऊंचे वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाई जाएगी। जिला उपायुक्त ने स्थानीय पुलिस व संबंधित विभाग को आदेश दे दिये हैं। नायब तहसीलदार रणसिंह गोदारा के मुताबिक भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा जारी पत्र पर कार्यवाही करते हुए नगर पालिका, पुलिस विभाग व सम्बंधित विभाग को पत्र भेजकर इस गेट के अंदर से बड़े वाहनों के निकलने पर प्रतिबंध लगाने को कहा गया है। जल्द ही इस पर कार्यवाही होगी। शहर में बाईपास बना दिया गया है। वहां से भारी वाहन जा सकेंगे।

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