संसदीय जवाबदेही को मजबूत बनाने का समय, लोकतंत्र को मिलेगी नई ताकत

जवाबदेह संसद, मजबूत लोकतंत्र की पहचान

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लेखक: देवेन्द्रराज सुथार। भारतीय लोकतंत्र की सफलता का सबसे मजबूत आधार उसकी संसद है। संसद का दायित्व कानून बनाना भर नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों, निर्णयों और सार्वजनिक धन के उपयोग पर निरंतर निगरानी रखना भी है। संविधान के अनुच्छेद 75(3) के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है। इसका अर्थ है कि सरकार को अपने प्रत्येक निर्णय का औचित्य संसद के समक्ष स्पष्ट करना होता है। इसी उद्देश्य से प्रश्नकाल, शून्यकाल, स्थायी समितियों और विधेयकों पर विस्तृत चर्चा जैसी संसदीय व्यवस्थाएं विकसित की गईं, ताकि शासन पारदर्शी और जवाबदेह बना रहे। हाल के वर्षों में संसद की कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं। लगातार होने वाले व्यवधानों के कारण प्रश्नकाल और महत्वपूर्ण चचार्ओं का समय प्रभावित हुआ है।

संसदीय अध्ययन संस्था पीआरएस विधायी अनुसंधान के अनुसार हाल के कई सत्रों में प्रश्नकाल का बड़ा हिस्सा बाधित रहा, जिससे सांसदों को सरकार से सीधे उत्तर मांगने के अवसर सीमित मिले। किसी भी संसद की प्रभावशीलता इस बात से नहीं आंकी जाती कि उसने कितने कानून पारित किए, बल्कि इस आधार पर भी तय होती है कि उन कानूनों पर कितना गंभीर विचार-विमर्श हुआ और सरकार ने जनता से जुड़े प्रश्नों का कितना संतोषजनक उत्तर दिया। संसदीय समितियों की भूमिका भी पहले की तुलना में कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। लोकतांत्रिक जवाबदेही संसद तक सीमित नहीं है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सार्वजनिक धन के उपयोग की जांच करता है, जिसकी रिपोर्टों की समीक्षा लोक लेखा समिति करती है। निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है, जबकि न्यायपालिका संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा करती है। इन सभी संस्थाओं का उद्देश्य शासन व्यवस्था में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बनाए रखना है, परंतु संसद इन सभी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का केंद्रीय स्तंभ बनी रहती है। इस चुनौती का समाधान सरकार और विपक्ष, दोनों की साझा जिम्मेदारी से ही संभव है।

सरकार को अधिक से अधिक विधेयकों को समितियों के पास भेजना चाहिए, पर्याप्त चर्चा का अवसर देना चाहिए और प्रत्येक प्रश्न का तथ्यपूर्ण उत्तर प्रस्तुत करना चाहिए। दूसरी ओर विपक्ष को भी विरोध और व्यवधान के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। संसद का समय जनता की धरोहर है और उसका सार्थक उपयोग लोकतंत्र को मजबूत बनाता है। लोकतंत्र की मजबूती कानूनों की संख्या से नहीं, बल्कि उन्हें बनाने की प्रक्रिया की गुणवत्ता से तय होती है। सक्रिय प्रश्नकाल, प्रभावी समितियां और गंभीर संसदीय चर्चा लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक पहचान हैं। यदि इन परंपराओं को फिर से सुदृढ़ किया गया, तो संसद के प्रति जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा। 
यह लेखक के अपने विचार हैं

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