दंगों पर न हो राजनीति

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आखिर 34 वर्ष के बाद 1984 के दंगा पीड़ितों को न्याय मिल गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने दंगों के लिए दोषी सज्जन कुमार को उम्र कैद की सजा सुनाई है। दंगा इंसानियत के नाम पर कलंक है। पुलिस प्रबंधों की खामियां, सांप्रदायिकता व कई अन्य कारणों के चलते पीड़ितों को देरी से न्याय मिला, फिर भी इस फैसले से पीड़ितों के घावों पर मरहम लगेगी। दूसरी तरफ इस फैसले का जितनी तेजी से राजनीतिकरण हुआ है वह हमारे नेताओं की सत्ता स्वार्थ की तरफ संकेत करता है।

अकाली-भाजपा इस मामले में कांग्रेस पर हमलावर है। हालांकि पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्दर सिंह ने अदालत के फैसले का स्वागत किया है। दंगों को लेकर फैसले से कोई राजनैतिक लाभ लेने की बजाय इसे इंसानियत के खिलाफ बड़े गुनाह के रूप में देखने की आवश्यकता है। अदालत ने फैसले में यह बात कही है कि सज्जन कुमार राजनैतिक संरक्षण होने के कारण बचता आया है। सजा दिलवाने के लिए मौजूदा प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि दोषियों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई का माहौल बनाया जाए। इस जिम्मेदारी को सांप्रदायिक रंग देने वालों से बचाने की आवश्यकता है।

दंगा करने वालों का कोई धर्म या पार्टी नहीं होनी चाहिए लेकिन जब कोई पार्टी दंगों के मुद्दे पर अपनी, राजनैतिक रोटियां सेंकने लग जाती है तब यह अपने आप में एक ओर गुनाह बन जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि धर्म आधारित दंगों के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन छेड़ा जाए, जिसका उद्देश्य सामाजिक व सांस्कृतिक ही हो। यह जिम्मेदारी पार्टियों की बनती है कि ऐसे नेताओं को पार्टी से निकाला जाए, जो समाज के लिए खतरा बनते हैं जहां तक देश में आए दिन हो रहे दंगों की बात है अभी तक शासन-प्रशासन व पुलिस अदालत के कटघरे में खड़ा है। दंगे होते हैं व दंगा पीड़ितों के साथ हमदर्दी कम और दंगों से राजनैतिक लाभ लेने के प्रयास ज्यादा किए जाते हैं।

विदेशों की तर्ज पर न्याय व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए ताकि अपराधी भले ही कितना ही रूसूख वाला क्यों न हो कानून के सामने उसके खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित हो सके। सज्जन कुमार वाले फैसले से यह नसीहत लेने की आवश्यकता है। अत्याचार के हजारों मामलों के दोषियों को भी बिना किसी देरी के सख्त सजा मिले लेकिन यह बात नेताओं को अभी हजम नहीं हो रही, वह तो केवल वही बात करेंगे जिससे उन्हें चुनावों में लाभ हो, यही बात संवेदनहीन हो रही व्यवस्था का कुरूप चेहरा है।

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