Hariyali Teej 2020: महिलाएं बोली, न ही तो वो समय रहा और न ही वो झूले…
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परिचर्चा: हमारे समय में होती थी हरियाली तीज, गीत गाकर खूब लेते थे झूलों का आनंद (Hariyali Teej 2020)
सच कहूँ/राजू ओढां। भारत को त्यौहारों का देश माना जाता है। लोग त्यौहारों को बड़ी ही खुशी और हर्षाेल्लास के साथ अपने-अपने ढंग से मनाते हैं। हरियाणा में त्यौहारों का एक अलग ही महत्व देखा जाता है। समय व आपसी प्रेम-भाईचारे की कमी तथा बदलते परिवेश के कारण त्यौहारों में वो बात नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। एक वो भी दौर था जब किसी पर्व के अवसर पर पूरा गांव चौपाल में एकत्र हो जाता था। लेकिन आज के समय में शायद ही कहीं ऐसा कुछ देखने को मिले। हरियाली तीज को महिलाओं का त्यौहार माना जाता है। इसी पर जब नुहियांवाली की कुछ बूजुर्ग व अन्य महिलाओं से बातचीत की गई तो उन्होंने कहा कि हरियाली तीज में अब वो बात कहां जो पहले हुआ करती थी। आज किसी के पास न ही तो वक्त है और न ही लोगों में पहले जैसा प्रेम-भाईचारा।
हमारे और आज के समय में जमीन-आसमान का फर्क आ गया है। उस समय सावन मास में लड़कियां एक माह तक मायके में रहती थी। करीब एक महीने तक हरियाली तीज के गीतों का दौर चलता था। आधी-आधी रात तक लड़कियां चबूतरों पर बैठकर गीत गाया करती थी। जब झूले पड़ते थे तो इतना चाव था कि खाना तक भूल जाते थे। सुबह से लेकर सांय तक झूले क ा आनंद लेते थे। लेकिन आज न तो वक्त अच्छा है और न ही लड़कियां इतने-इतने समय तक मायके में रहने आती। आज लोगों में वो आपसी-प्रेम भाईचारा नहीं रहा जो हमारे समय में होता था। अब तो हरियाली तीज का वो महत्व ही नहीं रहा जो उस समय हुआ करता था। -नात्थी देवी, 86 वर्षीय
अब वो बात कहां है जो हमारे समय में हुआ करती थी। उस समय लड़कियां 2-2 माह तक मायके में रहने के लिए आती थी। मेरे विवाह को तकरीबन 60 वर्ष का समय हो गया। मुझे अच्छी तरह से याद है मैं सावन मास में 2 माह तक मायके में रहने गई थी। उस समय मैंने अपनी सहेलियों के साथ झूलों का खूब आनंद लिया था। हम सभी सहेलियां एकत्र होकर संध्या के समय गलियों में चबूतरियों पर बैठकर हरियाली तीज के गीत गाकर खूब नाचा करती थी। धीरे-धीरे सब कुछ बदल गया है। न अब वो सहेलियां रही और न ही वो समय। – विद्या देवी (77 वर्षीय)
हमारे समय में हरियाली तीज का नाम सुनते ही लड़कियां खुशी से भर जाती थी। लेकिन आज लड़कियों को इसके महत्व का ही पता नहीं। मैं अपनी सहेलियों के साथ एक माह तक हरियाली तीज पर गीत गाया करती थी। न तो समय का पता चलता था और न ही घर वाले रोकते थे। उस समय नव-विवाहिताओं को सावन का इंतजार होता था। जब वो एक माह तक अपने मायके में रहने आती थी। अब एक तो घरों में कार्य ही इतने हो गए और दूसरा लड़कियों को भी अब कहां मायके में रहने के लिए भेजा जाता है। – संतरो देवी (59 वर्षीय)
अब त्यौहारों में वो बात कहां जो हमारे समय में हुआ करती थी। देर रात तक चबूतरियोें पर बैठकर भाई-बहनों का नाम लेकर गीत गाना अब नहीं रहा। अब युवतियों को तीज के महत्व का ही पता नहीं। उस समय आपसी प्रेम व समय अच्छा था। लेकिन अब पता नहीं क्या हो गया कि सब-कुछ ही बदल गया। काश वो समय दोबारा आ जाए। बिमला देवी (65 वर्षीय)।
मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब बाल्यवस्था में हम हरियाली तीज पर सुबह से लेकर शाम तक झूले का आनंद लेते थे। हमेंं न ही तो कोई टोकता था और न ही कोई रोक ता था। वास्तव में हरियाली तीज ही वो थी। अब एक तो लोगों में आपसी स्नेह का अभाव आ गया है और दूसरा किसी के पास समय ही नहीं। सावन के महीने में हम सभी सहेलियां इकट्ठी होकर एक-दूसरे के साथ सुख-दुख की बातें किया करती थीं। लेकिन अब न तो वो सहेलियां रहीं और न ही वो आना-जाना। अब तो फोन पर बात हो जाती है। – हरजीत कौर।
अब हरियाली तीज के वो मायने ही नहीं रहे। बाल्यवस्था में जब झूला मिल जाता था तो हम खाना-पीना भी भूल जाते थे। ये कोई ज्यादा लंबे समय की बात नहीं जब लड़कियां गलियों में बैठकर भाई-बहनों के गीत गाती थी। अब तो सारा सिस्टम ही चेंज हो गया है। न तो युवतियों को अब वो गीत आते और न ही गलियों में बैठकर गीत गाने का समय रहा। कार्य की अधिकता व जिम्मेवारियां भी इतनी हो गर्इं है कि घर के कार्य से भी फुर्सत नहीं मिलती। -सुनीता सुथार