Para-athlete Shashwati: बिना एक पैर के हौसलों से सपनों की उड़ान भर रही शाश्वती
पैरा एथलीट शाश्वती विनायक का ओलंपिक पदक जीतने का सपना
Para-athlete Shashwati: भिवानी, (सच कहूँ/इन्द्रवेश)। जिसके इरादे बुलंद हों, उसके लिए कोई कमी बाधा नहीं बनती। मूल रूप से नागपुर की शाश्वती विनायक इसी जज्बे की जीती-जागती मिसाल हैं। 21 साल की शाश्वती जन्म से ही जन्मजात विकृति होने की वजह से एक पैर से दिव्यांग हैं। बचपन में आॅपरेशन हुआ, लेकिन शाश्वती ने हार नहीं मानी। माता-पिता के हौसले और प्रेरणा से उन्होंने जीवन को नई दिशा दी। Bhiwani News
पिछले 11 साल से शाश्वती स्विमिंग और साइक्लिंग कर रही हैं। पैरा खेलों में उन्होंने कई मेडल जीते हैं। वर्ल्ड कप में कांस्य पदक जीतकर उन्होंने साबित कर दिया कि हौसले के आगे शरीर की कोई सीमा नहीं होती। आज शाश्वती भारत का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। आने वाली 8 जुलाई से पहले वो वर्ल्ड चैंपियनशिप के क्वालीफायर के लिए पहले जर्मनी और फिर हंगरी जाएंगी। उनका सपना है, ओलंपिक में तिरंगे को गर्व से लहराना और देश के लिए पदक जीतना।
शाश्वती का कृत्रिम पैर लोहे की छड़ से बना है, जिसे लगवाने के लिए उन्हें अमेरिका जाना पड़ा। इसकी कीमत 20 लाख रुपये थी। उनके जूते भी काफी महंगे हैं। लेकिन शाश्वती कहती हैं कि ये सब उनके सपने से छोटा है। भिवानी स्टेडियम में रोज सुबह 5 बजे शाश्वती कोच प्रशांत कर्माकर के साथ प्रैक्टिस करती हैं। Bhiwani News
वो स्वस्थ खिलाड़ियों के साथ बराबरी से दौड़ती हैं। कोई भेदभाव नहीं, कोई रियायत नहीं। कोच कहते हैं, शाश्वती पढ़ाई में भी तेज हैं और आईएएस बनना चाहती हैं। शाश्वती उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा हैं, जो दिव्यांगता को अभिशाप मानकर टूट जाते हैं। एक पैर से वो कर दिखाती हैं, जो कई स्वस्थ खिलाड़ी भी नहीं कर पाते।
शाश्वती कहती है कि मैं ओलंपिक में मेडल जीतना चाहती हूं। इसके लिए दिन-रात मेहनत कर रही हूं। खेल के साथ-साथ पढ़ाई भी जारी है, ताकि आर्ईएएस बनकर देश की सेवा कर सकूं। शाश्वती पिछले 11 साल से लगातार मेहनत कर रही है। एक पैर न होने के बावजूद वो स्वस्थ बच्चों से मुकाबला करती है। मुझे पूरा भरोसा है कि वो ओलंपिक में मेडल लेकर आएगी। Bhiwani News
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