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    लालच का नतीजा

    Result-of-Greed
    हे भगवान, इस वन में अकाल पड़े, सूखा पड़े और बाढ़ आए ताकि वन के जानवर तबाह और बरबाद हो जाएं,’ सुंदर वन का महाराज खैरातीलाल सियार रोज भगवान की मूर्ति के आगे हाथ जोड़कर यही प्रार्थना करता था। एक दिन जब वह यही प्रार्थना कर रहा था तो उसकी पत्नी बोली, तुम क्यों जानवरों की तबाही और बरबादी के लिए रोज इस तरह प्रार्थना करते हो। कहीं ऐसा न हो कि तुम किसी रोज लालच के कारण तबाह और बरबाद हो जाओ।’
    मेरी पत्नी हो कर तुम मेरा बुरा सोचती हो,’ सियार ने गुस्से से कहा, झ्कैसी पत्नी हो तुम। आखिर मैं किसके लिए पैसे कमाता हूं।’ जानवरों का खून चूसचूस कर जमा करने के लिए’, सियार की पत्नी ने दो टूक उत्तर दिया, गरीब, लाचार, और बेबस जानवरों को सूद पर कर्ज दे दे कर तुम सेठ तो बन गए हो लेकिन पैसे का लालच अभी भी तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ रहा है।’
    खैरातीलाल सियार सूद ब्याज पर पैसे देने का काम करता था। वह एक नंबर का लालची और जालिम था। एक बार जो उसके चंगुल में फंस जाता था, वह जीवनभर उसके कर्ज से मुक्त नहीं हो पाता था। गरीब और लाचार जानवरों का खून चूस चूस कर उसने खूब पैसा जमा कर लिया था। उसके पास जितना पैसा आता जा रहा था, उसकी पैसे की भूख उतनी ही बढ़ती जा रही थी।
    सियार अपने पैसे बैंक में जमा नहीं करता था। वह सोचता था कि बैंक में पैसे जमा करने से एक दिन लुटेरे उसका भी पैसा लूट कर ले जाएंगे। आए दिन बैंक लूट की खबर अखबार में पढ़कर वह ऐसा सोचता था। वह अपना पैसा बहुत हिफाजत के साथ घड़े में डालकर जमीन में गाड़ कर रखता था। पैसे रखने की जानकारी वह अपनी पत्नी को भी नहीं होने देता था। वह सोचता था कि पत्नी पैसे देख लेगी तो खाने-पीने में खर्च कर देगी।
    इतना पैसा होने के बावजूद वह रूखा-सूखा खा कर गुजारा करता था। एक दिन सियार घड़े में पैसे रखकर अपने घर में ही जमीन में गाड़ रहा था कि तभी उसकी पत्नी ने उसे देख लिया। वह उसे धिक्कारती हुई बोली, झ्तुम तो हमेशा कहते हो कि पैसे मेरे लिए कमाते हो लेकिन मुझे कभी अच्छा खाना नहीं देते। स्वयं भी रूखा सूखा खाते हो और मुझे भी खिलाते हो, रूखासूखा खा-खा कर मैं तो सूख कर कांटा हो गई हूं।’
    झ्अरी भाग्यवान,’ सियार ने पत्नी को प्यार से पुचकारते हुए कहा, झ्एक बार भगवान मेरी प्रार्थना सुन ले तो मैं तुम्हें सिर्फ अच्छा खाना ही नहीं दूंगा बल्कि अच्छे कपड़े और गहनों से भी लाद दूंगा।’ रात का समय था। पैसे का घड़ा जमीन में गाड़कर वह सोने चला गया मगर आज उसे नींद नहीं आ रही थी। वह सोच रहा था कि अगर वह सो गया तो उसकी पत्नी कहीं पैसे का घड़ा निकाल न ले।
    उसकी पत्नी जब गहरी नींद में सो गई तो वह उठा और कुछ सोचकर पैसे का घड़ा जमीन से निकाला और उसे लेकर नदी के किनारे चल दिया। नदी के किनारे उसकी जमीन थी।ं सुनसान रात में नदी किनारे पहुंच कर उसने अपनी जमीन में एक गड्डा खोदा और उसमें घड़ा गाड़ दिया। झ्किसी को पता नहीं चलेगा कि यहां घड़ा गाड़ा हुआ है’, यह सोचकर वह निश्चिंत हो कर अपने घर में जा कर सो गया।
    संयोग से उसी रात खूब मूसलाधार बारिश हुई। इतनी बारिश हुई कि नदी में बाढ़ आ गई। सियार ने जहां अपना घड़ा गाड़ा था, वह स्थान पानी की तेज धार से कटकर नदी में विलीन हो गया। सियार को जब पता चला तो वह दौड़ा-दौड़ा वहां गया, वहां का दृश्य देखकर वह दहाड़ें मार-मार कर रोने लगा। उसकी दशा पागलों जैसी हो गई।
    उसकी पत्नी ने जब उससे इस तरह रोने का कारण पूछा तो उसने रोते हुए सारी बात बताई, झ्हाय, मैं तो लुट गया, बरबाद हो गया। कंगाल हो गया मैं तो’। वह दोनों हाथों से अपना सिर धुनने लगा। इस पर उसकी पत्नी व्यंग्य से बोली, झ्अब सिर धुनने से क्या फायदा। तुम्हारे जैसे लालची और मूर्ख जानवर की मति बिगड़ती है तो वह ऐसे ही धन पानी में बहा देता है।’

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