बच्चे की जिद से जन्मी ‘मंगलुशाला’, 30 साल पुराने विजन ने खोली स्वरोजगार की राह
बच्चे की जिद से जन्मी ‘मंगलुशाला’, 30 साल पुराने विजन ने खोली स्वरोजगार की राह
बड़ौत, डॉ संदीप दहिया । पूर्वी यमुना नहर के किनारे मिरापुर झाल के पास स्थित मंगलुशाला आज देशी गोपालन, जैविक खेती और स्वरोजगार का प्रेरणादायी मॉडल बन रही है। करीब 30 वर्ष पहले तत्कालीन शिक्षा अधिकारी दीपक राणा ने गुजरात की श्वेत क्रांति से प्रेरित होकर क्षेत्र में दुग्ध उत्पादन को रोजगार का माध्यम बनाने का सपना देखा था। दिल्ली के नजदीक होने और खेती की जमीन लगातार कम होने के कारण उन्होंने पशुपालन को बेहतर विकल्प माना। इसी विजन को उनके पुत्र भानु प्रताप सिंह और भतीजे मन्नू सिंह आगे बढ़ा रहे हैं। दोनों पेशे से एडवोकेट हैं।
मंगलुशाला की कहानी भी दिलचस्प है। कक्षा 12 की पढ़ाई के बाद भानु प्रताप ने देशी गाय पालने की जिद की। परिवार रेड सिंधी नस्ल की गाय लेकर आया, जिसका नाम राधा रखा गया। राधा ने मंगलु नाम के बछड़े को जन्म दिया। उसी के नाम पर गोशाला का नाम मंगलुशाला रखा गया। आज मंगलु बड़ा हो चुका है और राधा भी बुजुर्ग हो गई है, लेकिन दोनों इस पहल की पहचान हैं।
यहां विदेशी हाइब्रिड नस्लों के बजाय देशी गायों के पालन को प्राथमिकता दी जा रही है। गोशाला में जन्म लेने वाले बछड़ों को मां से अलग नहीं किया जाता। वर्तमान में करीब 10 बछड़े और दूध देना बंद कर चुकी तीन गायें भी यहां रखी गई हैं। उनकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी उठाई जा रही है। भानु प्रताप का मानना है कि जिस पशु का दूध हम पीते हैं, उसके पूरे जीवन की जिम्मेदारी भी हमारी होनी चाहिए। यही नैतिक डेयरी फार्मिंग और वास्तविक पशु प्रेम है।
वैदिक पद्धति से तैयार होता है देशी गाय का घी
मंगलुशाला में घी तैयार करने के लिए पारंपरिक विधि अपनाई जाती है। देशी गाय के दूध को मिट्टी की हांडी में धीमी आंच पर रातभर पकाया जाता है। इसके बाद दही जमाकर लकड़ी की मथानी से मक्खन निकाला जाता है और उससे घी तैयार किया जाता है। यहां दूध, दही, मक्खन, मट्ठा और पनीर सहित अन्य दुग्ध उत्पाद भी बनाए जाते हैं। इनकी बड़ौत के साथ दिल्ली में भी आपूर्ति हो रही है।
फार्म पर जैविक खेती को भी बढ़ावा दिया जा रहा है। पशुओं के लिए जैविक चारा तैयार किया जाता है और भारतीय अनाज से दलिया बनाकर खिलाया जाता है। इसके अलावा राजस्थान और अन्य राज्यों के जैविक किसानों से बाजरा, रागी और ज्वार जैसे मोटे अनाज लेकर मल्टीग्रेन ऑर्गेनिक आटा तैयार किया जा रहा है। पुंगनूर नस्ल की गाय भी फार्म पर आकर्षण का केंद्र है।
कम जमीन में स्वरोजगार की राह दिखा रहे भानु प्रताप
भानु प्रताप सिंह का उद्देश्य मंगलुशाला को स्वरोजगार का ऐसा मॉडल बनाना है, जिसे अपनाकर क्षेत्र के अन्य युवा और किसान भी अपनी आजीविका चला सकें। उनका कहना है कि नौकरी करने से एक व्यक्ति को रोजगार मिलता है, जबकि स्वरोजगार अपनाने से कई परिवारों की आजीविका का रास्ता खुलता है। इसी सोच के तहत करीब 10 लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जोड़ा गया है। फार्म पर युवाओं को पशुपालन और जैविक खेती का प्रशिक्षण दिया जाता है। स्कूली बच्चे और स्वयंसेवी संस्थाओं के लोग भी यहां प्रशिक्षण लेने पहुंच चुके हैं। उनका मानना है कि कम जमीन वाले किसान भी जैविक सब्जियों और पशुपालन को अपनाकर अच्छी आय प्राप्त कर सकते हैं।
सरकार के नंद बाबा मिशन के तहत देशी गाय पालन और डेयरी संचालन को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसमें पात्र लाभार्थियों को अनुदान और सब्सिडी का लाभ मिलता है। भानु प्रताप किसानों का समूह बनाकर उनके उत्पाद सीधे दिल्ली जैसे बड़े बाजारों तक पहुंचाने के पक्षधर हैं। इससे किसानों को बिचौलियों से मुक्ति और अपने उत्पाद का बेहतर मूल्य मिल सकता है।
मंगलुशाला की यह पहल करीब तीन दशक पुराने उस विजन को आगे बढ़ा रही है, जिसमें पशुपालन को केवल दूध उत्पादन नहीं, बल्कि रोजगार, पशु संरक्षण और आत्मनिर्भरता का माध्यम माना गया। भानु प्रताप और मन्नू सिंह का प्रयास है कि क्षेत्र के युवा नौकरी तलाशने के बजाय रोजगार देने वाले बनें और किसान कम जमीन में भी अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकें।
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