अमेरिका-ईरान जंग के 6 महीने: किसका कितना नुकसान? तेल से लेकर LPG तक बढ़ी कीमतें, अरबों डॉलर का पड़ा बोझ

अमेरिका-ईरान जंग के 6 महीने: किसका कितना नुकसान? तेल से लेकर LPG तक बढ़ी कीमतें, अरबों डॉलर का पड़ा बोझ

Published On

28 फरवरी 2026... अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की तो पूरी दुनिया की नजर पश्चिम एशिया पर टिक गई। आशंका थी कि यह संघर्ष अगर लंबा चला तो इसका असर सिर्फ अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था इसकी चपेट में आ सकती है।

तेल की कीमतें आसमान छूने, महंगाई बढ़ने, सप्लाई चेन टूटने और दुनिया में आर्थिक मंदी आने की आशंकाएं जताई गईं। अब इस संघर्ष को करीब छह महीने हो चुके हैं और तस्वीर कुछ अलग नजर आ रही है।

तेल, गैस और रोजमर्रा की कई चीजों की कीमतों पर दबाव जरूर बढ़ा है, लेकिन शुरुआती दौर में लगाए गए हर अनुमान सही साबित नहीं हुए। सबसे बड़ी बात यह है कि इस जंग की आर्थिक कीमत सभी देशों और लोगों ने बराबर नहीं चुकाई है।

तो आखिर छह महीने से जारी अमेरिका-ईरान संघर्ष में किसका कितना नुकसान हुआ और किन लोगों या कंपनियों को इसका फायदा मिला?

पहले समझिए, छह महीने बाद युद्ध की स्थिति क्या है?

अमेरिका और इजरायल ने ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ शुरू किया था। इसके पीछे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को कमजोर करना और रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सुरक्षित रखना प्रमुख उद्देश्य बताया गया।

लेकिन छह महीने बाद भी संघर्ष का कोई निर्णायक अंत नजर नहीं आ रहा। ईरान का परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर भी खतरा बरकरार है।

यानी स्थिति किसी निर्णायक जीत या हार के बजाय लंबे गतिरोध और महंगे सैन्य संघर्ष में बदलती दिखाई दे रही है।

अमेरिका पर पड़ा अरबों डॉलर का बोझ

इस युद्ध की सबसे बड़ी कीमत अमेरिका को अपनी सैन्य कार्रवाई और मध्य पूर्व में बढ़ी सैन्य मौजूदगी के रूप में चुकानी पड़ रही है। अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ के हवाले से करीब 38 अरब डॉलर, यानी लगभग 3.62 लाख करोड़ रुपये, खर्च होने का आंकड़ा सामने आया है। हालांकि, युद्ध की कुल लागत को लेकर अलग-अलग अनुमान हैं। डेमोक्रेटिक नेशनल कमेटी ने दावा किया है कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स पर युद्ध का बोझ 100 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। यह शुरुआती 25 अरब डॉलर के अनुमान से करीब चार गुना ज्यादा है। यानी युद्ध की वास्तविक लागत को लेकर आंकड़ों में बड़ा अंतर है, लेकिन इतना साफ है कि अमेरिकी सरकार के लिए यह अभियान बेहद महंगा साबित हुआ है।

हर अमेरिकी परिवार की जेब पर असर

युद्ध का असर सिर्फ सरकारी बजट तक सीमित नहीं रहा। ईंधन, किराना और ब्याज दरों में बढ़ोतरी ने आम अमेरिकी परिवारों पर भी दबाव डाला है। मूडीज एनालिटिक्स के मुख्य अर्थशास्त्री मार्क जांडी के अनुमान के मुताबिक, एक अमेरिकी परिवार पर करीब 1,000 डॉलर का अतिरिक्त आर्थिक बोझ आया है। इसमें लगभग 300 डॉलर ज्यादा गैसोलीन, 200 डॉलर ज्यादा किराने के सामान और करीब 150 डॉलर अधिक ब्याज लागत का अनुमान शामिल है। एक अन्य अनुमान के मुताबिक, युद्ध के बाद अमेरिकी लोगों ने गैसोलीन और डीजल पर करीब 87 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च किए हैं।

अमेरिकी सेना को भी भारी नुकसान

मध्य पूर्व में अमेरिका की बड़ी सैन्य तैनाती जारी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 50 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक क्षेत्र में तैनात हैं। युद्ध से जुड़ी सैन्य गतिविधियों में अमेरिकी सैनिकों के मारे जाने और घायल होने की भी खबरें सामने आई हैं। दिए गए आंकड़ों के अनुसार करीब 18 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है, जबकि 759 सैनिक घायल हुए हैं। इनमें ऑपरेशन एपिक फ्यूरी और बाद के सैन्य अभियानों में हुए नुकसान को शामिल किया गया है। यानी आर्थिक कीमत के साथ-साथ अमेरिका को मानवीय कीमत भी चुकानी पड़ी है।

होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा आर्थिक मोर्चा

अगर इस युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक प्रभाव की बात करें तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज सबसे ऊपर आता है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल और ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद अहम है। युद्ध के दौरान यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में तेल की सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ी। युद्ध से पहले ब्रेंट क्रूड करीब 72 डॉलर प्रति बैरल के आसपास था। संघर्ष के दौरान कीमत करीब 120 डॉलर तक पहुंच गई और अप्रैल में यह लगभग 126.41 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक भी गई। बाद में कीमतों में गिरावट आई और यह करीब 88 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गई। यानी अपने शिखर से काफी नीचे आने के बावजूद कीमत युद्ध-पूर्व स्तर से करीब 21 फीसदी ज्यादा बताई जा रही है। गोल्डमैन सैक्स के अनुमान के मुताबिक होर्मुज क्षेत्र से कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात घटकर करीब 15-16 मिलियन बैरल प्रतिदिन रह गया है।

अमेरिका में पेट्रोल हुआ महंगा

तेल की कीमतों का सीधा असर पेट्रोल पर पड़ा। 27 फरवरी 2026 को अमेरिका में गैसोलीन का राष्ट्रीय औसत करीब 2.98 डॉलर प्रति गैलन था। अब यह करीब 4.09 डॉलर प्रति गैलन बताया जा रहा है। यानी करीब 37 फीसदी की बढ़ोतरी

यह बढ़ोतरी अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पेट्रोल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ गाड़ी चलाने के खर्च पर नहीं पड़ता। ट्रांसपोर्टेशन महंगा होने से खाद्य पदार्थों और दूसरे रोजमर्रा के सामान की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

खाद्य संकट का खतरा क्यों बढ़ा?

  • युद्ध का असर ऊर्जा के साथ-साथ फर्टिलाइजर सप्लाई पर भी पड़ा है।
  • उर्वरक की उपलब्धता में कमी का सीधा असर खेती की लागत पर पड़ता है। अगर किसान को डीजल, गैस और खाद के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़े तो उसका असर अंततः खाद्य कीमतों पर आ सकता है।
  • दिए गए आंकड़ों के मुताबिक फर्टिलाइजर की आवाजाही करीब 6 लाख टन प्रति सप्ताह से घटकर 60 हजार टन रह गई।
  • संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी संघर्ष के वैश्विक खाद्य आपूर्ति पर गंभीर आर्थिक प्रभावों को लेकर चिंता जताई है।
  • अमेरिकी किसानों के लिए भी डीजल और उर्वरक महंगा होने से करीब 31 अरब डॉलर के नुकसान का अनुमान सामने आया है।
  • लेकिन युद्ध में कुछ लोगों को फायदा भी हुआ

हर युद्ध की तरह इस संघर्ष में भी जहां बड़ी संख्या में देश, कंपनियां और आम लोग आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं, वहीं कुछ क्षेत्रों को फायदा भी मिला है।

1. घबराकर शेयर नहीं बेचने वाले निवेशक

युद्ध शुरू होने के बाद वैश्विक शेयर बाजारों में शुरुआती गिरावट आई। लेकिन इसके बाद अमेरिकी बाजारों में जोरदार रिकवरी देखने को मिली।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक मार्च के निचले स्तर से:

  • डॉव जोन्स करीब 19 फीसदी चढ़ा।
  • S&P 500 में करीब 22 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
  • नैस्डैक करीब 27 फीसदी ऊपर गया।

इस रिकवरी के पीछे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI सेक्टर में तेजी को एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है।

यानी जिन निवेशकों ने घबराकर बाजार से पैसा नहीं निकाला, उन्हें बाद की रिकवरी से फायदा मिला।

2. क्लीन एनर्जी और इलेक्ट्रिक व्हीकल कंपनियां

महंगे तेल और ऊर्जा संकट ने दुनिया के सामने एक बार फिर सवाल खड़ा किया कि पेट्रोलियम पर निर्भरता कितनी सुरक्षित है।

इसका फायदा इलेक्ट्रिक व्हीकल और रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर को मिला।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक कुछ देशों में EV बिक्री में जबरदस्त सालाना वृद्धि दर्ज की गई:

  • सिंगापुर में करीब 110 फीसदी
  • न्यूजीलैंड में करीब 180 फीसदी
  • कोलंबिया में करीब 300 फीसदी

IEA के अनुमान के मुताबिक 2026 में वैश्विक वाहन बिक्री में इलेक्ट्रिक वाहनों की हिस्सेदारी करीब 29 फीसदी हो सकती है, जबकि 2025 में यह करीब 25 फीसदी थी।

ऊर्जा संकट ने कई देशों को सोलर, न्यूक्लियर एनर्जी, घरेलू रिफाइनिंग और दूसरी वैकल्पिक ऊर्जा योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए भी मजबूर किया है।

3. अमेरिकी डिफेंस कंपनियों की बल्ले-बल्ले

  • युद्ध का एक बड़ा आर्थिक लाभ रक्षा उद्योग को मिला है।
  • मिसाइल, इंटरसेप्टर, एयर डिफेंस सिस्टम, ड्रोन और दूसरी सैन्य तकनीकों की मांग बढ़ने से अमेरिकी रक्षा कंपनियों को बड़े कॉन्ट्रैक्ट मिले।
  • लॉकहीड मार्टिन, जनरल डायनेमिक्स और नॉर्थrop ग्रुम्मन जैसी कंपनियों को बढ़ी हुई सैन्य मांग का फायदा हुआ है।
  • सबसे बड़े सौदों में से एक अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा लॉकहीड मार्टिन को दिया गया करीब 58.6 अरब डॉलर का कॉन्ट्रैक्ट है, जिसका उद्देश्य पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाना है।
  • यह सात साल के लिए 2026 से 2032 तक का सौदा बताया गया है।
  • 4. ट्रंप परिवार के कारोबारी हित

युद्ध से जुड़े आर्थिक प्रभावों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के परिवार से जुड़े कारोबारी हितों को लेकर भी सवाल उठे हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ट्रंप परिवार के निवेश पोर्टफोलियो से जुड़ी कंपनियों को युद्ध के संभावित आर्थिक लाभार्थियों में शामिल किया गया है। हालांकि, इस तरह के दावों को अलग-अलग कंपनियों और निवेशों के स्तर पर स्वतंत्र रूप से जांचना जरूरी है।

युद्ध की राजनीतिक कीमत भी चुकानी पड़ रही है

छह महीने पहले जिस सैन्य कार्रवाई को लेकर अमेरिकी जनता में काफी समर्थन दिखाई दे रहा था, अब उसके प्रति समर्थन में गिरावट का दावा किया जा रहा है। दिए गए सर्वे आंकड़ों के मुताबिक अब सिर्फ 31 फीसदी अमेरिकी ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का समर्थन करते हैं, जबकि शुरुआती दिनों में यह आंकड़ा 83 फीसदी बताया गया था। वहीं करीब 83 फीसदी अमेरिकी नागरिकों को लगता है कि युद्ध लंबा खिंच सकता है। इसका मतलब साफ है—युद्ध जितना लंबा होता जाएगा, सरकार के सामने सैन्य जीत के साथ-साथ जनता का समर्थन बनाए रखने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी होती जाएगी।

अब बात भारत की—आम भारतीय की जेब पर कितना असर?

अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध से भारत भी अछूता नहीं रहा। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में तेजी का असर देश की अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता दोनों पर पड़ सकता है।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक युद्ध की वजह से भारत में महंगाई पर करीब 2.5 फीसदी तक अतिरिक्त दबाव आया है।

LPG की कीमतों में भी बढ़ोतरी बताई गई है। घरेलू गैस सिलेंडर करीब 853 रुपये से बढ़कर 913 रुपये और कमर्शियल सिलेंडर करीब 1,768 रुपये से बढ़कर 3,071.50 रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

खाने के तेल की कीमतों पर भी दबाव देखने को मिला। सूरजमुखी तेल करीब 15 रुपये प्रति लीटर और सरसों तेल करीब 10 रुपये प्रति लीटर तक महंगा होने का आंकड़ा दिया गया है।

हालांकि, इन कीमतों में बदलाव को केवल युद्ध का परिणाम मानना सही नहीं होगा, क्योंकि भारत में ईंधन और खाद्य कीमतों पर घरेलू टैक्स, वैश्विक कमोडिटी कीमतें, विनिमय दर और सरकारी मूल्य निर्धारण जैसे कई कारक भी असर डालते हैं।

छह महीने बाद सबसे बड़ा सवाल—जीता कौन, हारा कौन?

अमेरिका और ईरान की यह जंग सिर्फ मिसाइलों और बमों की लड़ाई नहीं है। इसकी असली कीमत तेल, गैस, खाद्य पदार्थ, शिपिंग, रक्षा बजट और आम लोगों की जेब में दिखाई दे रही है।

अमेरिका ने अरबों डॉलर खर्च किए हैं। ईरान की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे पर भारी दबाव पड़ा है। यूरोप और एशिया ऊर्जा कीमतों से प्रभावित हुए हैं। किसानों की लागत बढ़ी है और दुनिया के सामने खाद्य सुरक्षा का खतरा पैदा हुआ है।

दूसरी तरफ रक्षा कंपनियों, कुछ ऊर्जा और क्लीन-टेक कंपनियों तथा बाजार में टिके रहने वाले निवेशकों को फायदा भी मिला है।

यानी छह महीने बाद इस युद्ध का कोई साफ आर्थिक विजेता नहीं है। कुछ सेक्टर और कुछ निवेशक जरूर फायदे में रहे हैं, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ी ऊर्जा कीमतें, सप्लाई चेन का दबाव और अनिश्चितता इसकी सबसे बड़ी कीमत बनकर सामने आई हैं।

और अगर होर्मुज स्ट्रेट में संकट लंबा खिंचता है, तो आने वाले महीनों में असली आर्थिक नुकसान अभी और बड़ा हो सकता है।

About The Author

Related Posts