10 साल में बंद हो गए 94 हजार सरकारी स्कूल, 2.26 करोड़ छात्रों ने छोड़ा सरकारी स्कूलों का दामन; नीति आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

10 साल में बंद हो गए 94 हजार सरकारी स्कूल, 2.26 करोड़ छात्रों ने छोड़ा सरकारी स्कूलों का दामन; नीति आयोग की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

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भारत की सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि पिछले करीब एक दशक में देशभर में लगभग 94 हजार सरकारी स्कूलों की संख्या कम हुई है। यानी औसतन हर दिन करीब 25 सरकारी स्कूल कम हुए। इसी अवधि में सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या में भी करीब 2.26 करोड़ की गिरावट दर्ज की गई है।

हालांकि, इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं है कि देश के हर हिस्से में स्कूलों पर ताला लग गया। कई राज्यों में कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को पास के दूसरे विद्यालयों में मर्ज या समायोजित किया गया है। फिर भी सरकारी स्कूलों की घटती संख्या और विद्यार्थियों का निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान शिक्षा व्यवस्था में हो रहे बड़े बदलाव की ओर जरूर इशारा करता है।

एक दशक में 94 हजार सरकारी स्कूल हुए कम

नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में सरकारी स्कूलों की संख्या करीब 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई। इस तरह लगभग 10 वर्षों के दौरान करीब 94 हजार सरकारी स्कूलों की संख्या कम हुई।

अगर इस गिरावट को औसत के तौर पर देखें तो करीब एक दशक में हर दिन लगभग 25 सरकारी स्कूलों की संख्या कम हुई। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी स्कूल देश के उन लाखों बच्चों के लिए शिक्षा का प्रमुख माध्यम हैं, जिनके परिवार निजी स्कूलों की फीस वहन करने की स्थिति में नहीं होते।

सरकारी स्कूलों में 2.26 करोड़ छात्रों की कमी

सिर्फ स्कूलों की संख्या ही नहीं घटी, बल्कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की संख्या में भी बड़ी गिरावट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार इस अवधि में सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की संख्या में करीब 2.26 करोड़ की कमी आई।

छात्र संख्या में इतनी बड़ी गिरावट के पीछे कई सामाजिक, आर्थिक और जनसांख्यिकीय कारण हो सकते हैं। कई क्षेत्रों में बच्चों की संख्या कम होने के कारण छोटे स्कूलों को दूसरे विद्यालयों के साथ मिला दिया गया। ऐसे मामलों में स्कूल की संख्या घटती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होता कि वहां के बच्चों को शिक्षा मिलना पूरी तरह बंद हो गई।

आखिर क्यों घट रही है सरकारी स्कूलों की संख्या?

सरकारी स्कूलों की संख्या में गिरावट को किसी एक कारण से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। इसके पीछे अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में अलग-अलग वजहें हो सकती हैं।

1. कम छात्र संख्या

कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या लगातार कम हुई है। ऐसे में प्रशासन की ओर से छोटे स्कूलों को पास के बड़े विद्यालयों के साथ मर्ज करने का फैसला लिया गया।

2. जन्म दर में गिरावट

देश के कई हिस्सों में पिछले वर्षों के दौरान जन्म दर में कमी आई है। इसका सीधा असर स्कूल जाने वाली उम्र के बच्चों की संख्या पर भी पड़ा है। जब किसी इलाके में बच्चों की संख्या घटती है तो वहां स्कूलों में दाखिले भी कम हो सकते हैं।

3. गांवों से शहरों की ओर पलायन

रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में ग्रामीण परिवारों का शहरों की ओर पलायन भी सरकारी स्कूलों में कम दाखिले की एक वजह हो सकता है। परिवारों के स्थान बदलने के साथ बच्चों का स्कूल भी बदल जाता है।

4. निजी स्कूलों की ओर बढ़ता रुझान

पिछले कुछ वर्षों में कई अभिभावकों का रुझान निजी स्कूलों की ओर बढ़ा है। अंग्रेजी माध्यम, स्कूल की सुविधाएं, परिवहन और अभिभावकों की बदलती प्राथमिकताएं इसके पीछे प्रमुख कारणों में शामिल हो सकती हैं। इसी दौरान निजी स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी भी देखने को मिली है।

स्कूल बंद होना और स्कूल मर्ज होना एक बात नहीं

सरकारी स्कूलों की संख्या घटने के आंकड़े को समझते समय एक महत्वपूर्ण अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है। स्कूल का बंद होना और स्कूल का दूसरे स्कूल में विलय होना हमेशा एक ही बात नहीं होती।

कम छात्र संख्या वाले किसी विद्यालय को प्रशासन पास के दूसरे सरकारी स्कूल में मर्ज कर सकता है। ऐसे में पुराने स्कूल भवन में कक्षाएं बंद हो सकती हैं, लेकिन वहां पढ़ने वाले विद्यार्थियों को दूसरे विद्यालय में स्थानांतरित कर दिया जाता है। इसलिए 94 हजार स्कूलों की संख्या में कमी को सीधे-सीधे इतने स्कूलों में शिक्षा पूरी तरह बंद होने के रूप में देखना सही नहीं होगा।

निजी स्कूल बढ़े, सरकारी स्कूल घटे

रिपोर्ट के आंकड़े शिक्षा के क्षेत्र में एक और महत्वपूर्ण बदलाव की ओर इशारा करते हैं। जिस अवधि में सरकारी स्कूलों की संख्या और उनमें दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या कम हुई, उसी दौरान निजी स्कूलों की संख्या में बढ़ोतरी देखने को मिली। यह बदलाव अभिभावकों की पसंद, जनसंख्या में बदलाव, ग्रामीण-शहरी पलायन और सरकारी स्कूलों की स्थानीय स्थिति जैसे कई कारकों से प्रभावित हो सकता है।

उत्तर भारत के लिए क्या कहते हैं आंकड़े?

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि 94 हजार स्कूलों की कमी का आंकड़ा पूरे भारत से जुड़ा है। इसे केवल उत्तर भारत के स्कूलों से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा।

अगर यह जानना हो कि उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश या किसी अन्य राज्य में कितने सरकारी स्कूल बंद या मर्ज हुए हैं, तो इसके लिए संबंधित राज्य सरकारों और शिक्षा विभागों के अलग-अलग आंकड़ों का अध्ययन करना होगा।

सरकारी शिक्षा व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती

सरकारी स्कूलों की संख्या और दाखिले में गिरावट शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। एक तरफ कम छात्र संख्या वाले स्कूलों को मर्ज करना प्रशासनिक और संसाधन के लिहाज से उचित कदम हो सकता है, वहीं दूसरी तरफ यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि बच्चों को उनके घर के नजदीक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध रहे।

सरकारी स्कूलों में बेहतर बुनियादी सुविधाएं, प्रशिक्षित शिक्षक, डिजिटल शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई उपलब्ध कराना इस चुनौती से निपटने में अहम भूमिका निभा सकता है।

नीति आयोग के आंकड़े सरकारी शिक्षा व्यवस्था में आए बड़े बदलाव की तस्वीर सामने रखते हैं। करीब 94 हजार सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी और 2.26 करोड़ विद्यार्थियों की गिरती संख्या निश्चित तौर पर चिंता का विषय है, लेकिन इन आंकड़ों को समझते समय स्कूलों के विलय, कम छात्र संख्या, जन्म दर में बदलाव और ग्रामीण से शहरी पलायन जैसे कारणों को भी ध्यान में रखना होगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि आने वाले वर्षों में सरकारी स्कूलों को किस तरह मजबूत किया जाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे गुणवत्तापूर्ण और सुलभ शिक्षा हासिल कर सकें।

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