संस्कृति: बचपन का ये खेल अब बना ‘गुलस्टिक’, जानें कैसे बना?
‘गुल्ली-डंडा’ खेलने के शौकीन अब बने ‘गुलस्टिक’ के खिलाड़ी
'Gulli-Danda’ Now ‘Gulstick’: सरसा, (सच कहूँँ/सुखजीत मान)। पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने पुरातन खेल गुल्ली-डंडा को आधुनिकता के रंग में रंगते हुए नये नियमों के साथ नया खेल ‘गुलस्टिक’ इजाद किया। यह नया खेल बेसबॉल, क्रिकेट और गुल्ली डंडा के मिश्रण का रूप है। खेल को रोमांचक बनाने के लिए इसमें ऐसे नियम बनाए गए जिस को दर्शकों ने भी खूब पसंद किया। जैसे क्रिकेट में गेंद फेंकने वाले को बॉलर बोला जाता है और उसी तर्ज पर इस खेल में गुल फेंकने वाले को गुल्लर कहा जाता है।
गुल्लर का सामने करने वाले विपक्षी टीम के खिलाड़ी को योद्ध कहा जाता है। गुल्लर योद्धा को आऊट करने के लिए लेपोल को निशाना बनाकर गुल्ली को फेंकता है और योद्धा गुल्ली को हिट करता है और जीएस ऐरिया में दौड़ कर अंक बटोरता है जिसे रश कहते हैं। मैदान में तैनात 9 खिलाड़ी जिन्हें रश सेवर कहा जाता है, गुल को रोकते हैं। इसमें गुल्ली को हिट कर चौका, छक्का, अठ्ठा व दस्सा (दस रश) भी प्राप्त किये जा सकते हैं।
योद्धा के पास दो स्टिक होती हैं क्रिकेट के ओवर के स्थान पर इसमें पैक होते हैं। इस खेल में योद्धा गुल्लर द्वारा फेंकी गुल को हिट करता है और भाग कर रश बनाता है। जहां पर गुल सेवर गुल को रोकता है वहां पर फिर से गुल रखी जाती है और इस बार योद्धा एस स्टिक से गुल को हिट करके रश बटोरता है।
खेल में अम्पायर की भूमिका निभाने वाले को डिसाइडर कहा जाता है जिसमें दो डिसाइडर मैदान में व तीसरा थर्ड डिसाइडर की भूमिका निभाता है। बता दें कि नई और पुरानी पीढ़ी दोनों को पुरातन और आधुनिकता के मिश्रण वाला खेल खूब पसंद आ रहा है। इसी तरह पुरातन खेल अंधा-झोटा को भी नया रूप दिया गया है। पूज्य गुरु जी ने कबड्डी, दौड़, कुश्ती और जिम्नास्टिक के मिश्रण का नया रुमाल छू खेल भी बनाया है, जो बहुत लोकप्रिय हो रहा है।
‘गुल्ली-डंडा’ खेलने के शौकीन अब बने ‘गुलस्टिक’ के खिलाड़ी
शाह सतनाम जी ग्रीन एस वैल्फेयर कमेटी के ‘गर्व दिवस’ के अवसर पर आयोजित खेल प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों और दर्शकों को अपना बचपन याद आ गया। जो खेल कभी गाँवों की गलियों में खेले जाते थे, वे आज नए नियमों में बंधकर स्टेडियम की शोभा बढ़ा रहे हैं। मैदान में खिलाड़ी पूरे जोश के साथ खेल रहे थे, वहीं दर्शक भी उत्साह से उनका हौसला बढ़ा रहे थे। विशेषकर जब पंजाब और यूपी के बीच गुलस्टिक का फाइनल मुकाबला खेला जा रहा था, तब खिलाड़ियों के साथ-साथ दर्शक भी ‘दस्सा मार दस्सा’ बोलते हुए नजर आए।

एम.एस.जी. भारतीय खेल गाँव में चल रही प्रतियोगिताओं के दौरान फाइनल में पहुंची पंजाब की टीम के कप्तान पुष्पिन्द्र सिंह रोमी इन्सां भले ही अब मानसा शहर में रहते हैं, लेकिन गुलस्टिक खेलते समय उन्हें अपने ननिहाल गाँव रंघड़ियाल की वे गलियां याद आ जाती हैं, जहाँ वह अपने दोस्तों के साथ गुल्ली-डंडा खेला करते थे। ‘सच कहूँ’ से बातचीत करते हुए रोमी ने बताया कि बचपन में खेला गया गुल्ली-डंडा अब गुलस्टिक में उनके काम आ रहा है।
गाँव धिंगड़ के संदीप सिंह इन्सां और गुरमीत सिंह इन्सां भी उस समय गर्व महसूस कर रहे थे, जब उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाओं से लैस खेल मैदान में खेल रही पंजाब की टीम का हिस्सा बनने का अवसर मिला। मानसा के साथ लगते गाँव जवाहरके में जन्मे और पले-बढ़े बलजिन्द्र सिंह बंटी इन्सां ने भी कभी नहीं सोचा था कि बचपन में जिस खेल को वे केवल समय बिताने के लिए खेलते थे, उसी के विकसित रूप गुलस्टिक में जीत हासिल करने पर ट्रॉफियाँ मिलेंगी।
यूपी की टीम के कप्तान अनुज इन्सां ने बताया कि वह शामली की गलियों में गुल्ली-डंडा और क्रिकेट खेला करते थे। अब बचपन का वही खेल खेलते हुए उन्हें न केवल अपना बचपन याद आ रहा है, बल्कि इस बात का गर्व भी महसूस हो रहा है कि आज उन्हें अपने राज्य की टीम का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है। इसके अलावा यूपी की टीम के राजन इन्सां, रवि इन्सां और सुमित इन्सां ने भी गुलस्टिक को अपना लोकप्रिय खेल बताते हुए कहा कि पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने गुल्ली-डंडा के खेल में क्रिकेट और बेसबॉल का मिश्रण करके गुलस्टिक का आविष्कार किया, जो अब लोकप्रिय खेल बन गया है।