GPS Underwater: पानी के अंदर GPS नहीं करता काम, फिर रास्ता कैसे ढूंढती हैं पनडुब्बियां? जानिए पूरा विज्ञान

GPS Underwater: पानी के अंदर GPS नहीं करता काम, फिर रास्ता कैसे ढूंढती हैं पनडुब्बियां? जानिए पूरा विज्ञान

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GPS Underwater: आज के दौर में GPS हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। किसी अनजान जगह जाना हो, रास्ता खोजना हो, किसी वाहन की लोकेशन ट्रैक करनी हो या किसी स्थान की सटीक स्थिति पता करनी हो—GPS कुछ ही सेकंड में जानकारी उपलब्ध करा देता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि समुद्र की गहराई में चलने वाली पनडुब्बियां अपना रास्ता कैसे तय करती हैं?

दरअसल, समुद्र की गहराई में GPS उसी तरह काम नहीं करता, जैसे जमीन की सतह पर करता है। ऐसे में पनडुब्बियां कई अत्याधुनिक नेविगेशन तकनीकों का सहारा लेती हैं। इनमें इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) और समुद्र की तलहटी की बनावट से स्थिति का अनुमान लगाने वाली तकनीक प्रमुख हैं।

पानी के अंदर क्यों नहीं पहुंचता GPS सिग्नल? GPS Underwater

GPS प्रणाली पृथ्वी के चारों ओर मौजूद सैटेलाइट्स से आने वाले रेडियो सिग्नल पर काम करती है। GPS में इस्तेमाल होने वाली प्रमुख सिग्नल फ्रीक्वेंसी लगभग 1.2 से 1.6 GHz के आसपास होती है।

समस्या यह है कि समुद्री पानी इन रेडियो तरंगों को बहुत तेजी से कमजोर कर देता है। जैसे-जैसे सिग्नल पानी के अंदर जाता है, उसकी ताकत घटती जाती है। कुछ विशेष परिस्थितियों में बहुत कम गहराई पर GPS रिसेप्शन संभव हो सकता है, लेकिन गहराई में डूबी पनडुब्बी तक सामान्य GPS सिग्नल प्रभावी रूप से नहीं पहुंच पाते। यही कारण है कि जब पनडुब्बी समुद्र की गहराई में होती है तो वह सीधे GPS पर निर्भर होकर अपना रास्ता तय नहीं कर सकती।

पनडुब्बियों का सबसे बड़ा सहारा है INS

GPS की अनुपस्थिति में पनडुब्बियों के लिए इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) बेहद महत्वपूर्ण होता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे काम करने के लिए किसी बाहरी सैटेलाइट सिग्नल की आवश्यकता नहीं होती। INS में अत्यंत संवेदनशील जायरोस्कोप और एक्सीलरोमीटर लगे होते हैं। ये लगातार पनडुब्बी की दिशा, गति और उसकी गति में होने वाले बदलावों को मापते रहते हैं।

मान लीजिए पनडुब्बी किसी ज्ञात स्थान से अपनी यात्रा शुरू करती है। सिस्टम वहां से उसके हर मूवमेंट का हिसाब रखता जाता है। पनडुब्बी कितनी दूर गई, किस दिशा में मुड़ी और उसकी गति में कितना बदलाव आया—इन सभी आंकड़ों के आधार पर कंप्यूटर उसकी अनुमानित स्थिति निकालता रहता है। इसे डेड रेकनिंग की प्रक्रिया से समझा जा सकता है।

लेकिन INS में भी है एक बड़ी कमी

INS पनडुब्बी को लंबे समय तक बिना GPS के नेविगेट करने की सुविधा देता है, लेकिन यह पूरी तरह त्रुटिहीन नहीं है। सेंसर द्वारा की गई बेहद छोटी-छोटी गलतियां समय के साथ जमा होती रहती हैं। इसे ड्रिफ्ट कहा जाता है। शुरुआत में यह गलती बहुत कम हो सकती है, लेकिन पनडुब्बी अगर लंबे समय तक किसी बाहरी लोकेशन रेफरेंस के बिना यात्रा करती रहे तो अनुमानित स्थिति और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर बढ़ सकता है।

इसलिए पनडुब्बियों को समय-समय पर अपनी स्थिति को किसी दूसरे विश्वसनीय तरीके से जांचना और INS की गलती को सुधारना जरूरी होता है।

समुद्र की तलहटी भी बन सकती है 'मैप'

पानी के अंदर नेविगेशन को और बेहतर बनाने के लिए पनडुब्बियां समुद्र की तलहटी की भौगोलिक बनावट का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। समुद्र के नीचे की जमीन हर जगह एक जैसी नहीं होती। कहीं पहाड़ हैं, कहीं गहरी खाइयां, कहीं कटक हैं तो कहीं अपेक्षाकृत समतल मैदान। इन भौगोलिक संरचनाओं का डिजिटल मैप तैयार किया जा सकता है।

पनडुब्बी सोनार की मदद से अपने आसपास या नीचे समुद्र की तलहटी की गहराई और बनावट से संबंधित जानकारी हासिल कर सकती है। इसके बाद कंप्यूटर इस जानकारी की तुलना पहले से मौजूद डिजिटल मैप से करता है।

अगर सोनार से मिली समुद्र तल की बनावट मैप के किसी खास हिस्से से मेल खाती है, तो सिस्टम यह अनुमान लगा सकता है कि पनडुब्बी उस क्षेत्र के किस हिस्से में मौजूद है।

यानी जिस तरह जमीन पर कोई व्यक्ति आसपास के पहाड़, सड़क या इमारत देखकर अपनी जगह का अंदाजा लगा सकता है, उसी तरह पनडुब्बी समुद्र की तलहटी की बनावट को एक भौगोलिक रेफरेंस के रूप में इस्तेमाल कर सकती है।

जब GPS नहीं तो पनडुब्बी रास्ता कैसे तय करती है?

पानी के अंदर पनडुब्बी की नेविगेशन व्यवस्था किसी एक तकनीक पर निर्भर नहीं होती। INS लगातार उसकी गतिविधियों का हिसाब रखता है, जबकि अन्य सेंसर और उपलब्ध नेविगेशन रेफरेंस समय-समय पर स्थिति को और सटीक बनाने में मदद कर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर पनडुब्बी अपेक्षाकृत कम गहराई तक आकर या सतह के करीब पहुंचकर GPS से अपनी स्थिति को अपडेट कर सकती है। इसके बाद वह दोबारा गहराई में जाकर INS के आधार पर यात्रा जारी रख सकती है। इस तरह पनडुब्बी के पास एक ऐसा नेविगेशन सिस्टम तैयार रहता है, जो बाहरी सैटेलाइट सिग्नल के बिना भी लंबे समय तक काम कर सकता है।

समुद्र की गहराई में नेविगेशन है बेहद हाई-टेक

पनडुब्बी के लिए समुद्र के अंदर रास्ता ढूंढना केवल दिशा पहचानने का काम नहीं है। उसे अपनी स्थिति, गहराई, गति और आसपास के वातावरण का लगातार आकलन करना होता है। GPS जहां खुले आसमान में शानदार तरीके से काम करता है, वहीं समुद्र की गहराई में उसकी जगह अत्याधुनिक इनर्शियल नेविगेशन, सोनार और अन्य नेविगेशन तकनीकें ले लेती हैं।

यही तकनीकें पनडुब्बियों को बिना GPS सिग्नल के भी समुद्र की गहराई में सुरक्षित और सटीक तरीके से अपना रास्ता तय करने में सक्षम बनाती हैं।

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