सरकार व नागरिक जल को बचाएं

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Crisis, Purity, Availability, Water

देश में गर्मी का मौसम अप्रैल के साथ ही शुरू हो जाता है, पानी की मांग बढ़ने लगती है। पानी जीवन है, ये सरकारें व नागरिक सब जानते हैं। पानी जैसी प्राकृति की बेशकीमती सम्पदा को आजकल न सरकारें संभााल रही हैं, न ही नागरिक। बल्कि निजी कम्पनियों के उत्पाद ऐसे हैं कि वह पानी की घोर बर्बादी कर रहे हैं। आर.ओ. वाटर फिल्टर उन क्षेत्रों में भी बिक रहा है, जहां का पानी साफ है और उसमें टीडीएस की दर सामान्य है। आर.ओ. वाटर फिल्टर घरों, आॅफिसों, बाजारों में प्रतिदिन करोड़ों लीटर पानी अपनी वेस्ट पाईप के जरिये सीवरेज में पहुंचा रहे हैं। इसके अलावा घरों में प्रयोग हो रहा टॉयलेट क्लीनर, नहाने के साबुन, बर्तनबार की टिकिया, ये ऐसे उत्पाद हैं जो पानी को एक रासायनिक घोल में बदल देते हैं। इनमें प्रयुक्त घातक तत्वों से युक्त पानी फसलों या पशुओं के पीने के काम नहीं आ सकता। बाथरूम एवं बर्तन क्लीनर का जरूरत से ज्यादा प्रयोग को रोका जाना चाहिए ताकि कम से कम पानी बर्बाद हो।

महज खाने की जूठन एवं मानव मल से पानी का प्राकृतिक गुण नष्ट नहीं होता, वह पुन: अपने आप साफ हो जाता है, जो फसलों के काम आ सकता है। परन्तु आज घरों में करोड़ों लीटर पानी बर्तन बार से, फिनाईल से पोछा लगाने में बर्बाद हो रहा है। भारत एक गर्म जलवायु का देश है, यहां पर पश्चिमी शैली का जल बर्बादी का क्लीनिंग सिस्टम उचित नहीं है। पश्चिम के देशों में साल के कई महीने बर्फ गिरती है, उनकी भूमि ज्यादा नम है, वहां पानी की जरूरत कम है। अत: वहां साफ-सफाई में जल का प्रयोग ज्यादा होता, तब भी यह उन देशों व उनकी कम आबादी को तकलीफदेह नहीं लगता। भारत में गर्मी का मौसम लम्बा है, फिर यहां पहाड़ी क्षेत्रों के अलावा मैदानी भागों में कोई बर्फ भी नहीं गिरती, जिस कारण सूखी जमीन पानी को भी सुखाती रहती है, ऐसे में झीलों, नदियों के स्वच्छ जल को जरूरत से ज्यादा साफ-सफाई में बर्बाद करना बुद्धिमानी नहीं है।

भारतीयों को स्वच्छता एवं जल संरक्षण के प्राचीन तौर-तरीकों को विकसित करने की ओर फिक्रमंद होना होगा। आज देश में भूजल भी खत्म होने की कगार पर है। उधर जमीनी सतह पर वर्षा जल संरक्षण की व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकी, अत: घरों, कार्यालयों एवं फैक्टरियों में साफ पानी को बचाने की दिशा में काम किया जाए। देश में बढ़ रहे जल संकट से सबसे ज्यादा खतरा वन्य जीवों एवं वनों को है, प्रतिवर्ष करोड़ों पक्षी एवं जीव-जन्तु, पेड़-पौधे जल के अभाव में खत्म हो रहे हैं, इन सबको बचाना भी मनुष्यों का दायित्व है। सरकार व नागरिकों, दोनों को समान रूप से जल बर्बादी या जल प्रदूषित करने वाली आदतों को त्याग वर्षा जल बचाने, नदी जल बचाने की ओर बढ़ना चाहिए।

 

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