शिक्षा और रोजगार
अहिंसा के प्रहरी ‘सीमांत गांधी’ अब्दुल गफ्फार खान
शिक्षा, सेवा और अहिंसक आंदोलन के जरिए अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ खड़ी की मजबूत आवाज
खान अब्दुल गफ्फार खान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान नेताओं में शामिल रहे, जिन्होंने हिंसा का रास्ता अपनाए बिना अंग्रेजी शासन का विरोध किया। उन्हें प्रेम और सम्मान से ‘सीमांत गांधी’ के नाम से जाना जाता है। अहिंसा, सामाजिक सुधार और मानव सेवा के प्रति उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने 12 अगस्त 1987 को उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित करने की घोषणा की। वे भारत रत्न पाने वाले पहले गैर-भारतीय नागरिक थे।
शिक्षा से शुरू किया सामाजिक सुधार का अभियान
खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म 6 फरवरी 1890 को तत्कालीन भारत के सीमांत प्रांत के उत्मानजई में हुआ था। उनके पिता ने उन्हें मिशनरी विद्यालय में शिक्षा दिलाई। शिक्षा के महत्व को समझते हुए उन्होंने युवावस्था में ही समाज सुधार का बीड़ा उठा लिया।
लगभग 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपने गांव उत्मानजई में एक विद्यालय की शुरुआत की। उनका उद्देश्य लोगों, विशेषकर युवाओं को शिक्षा से जोड़ना और समाज में जागरूकता पैदा करना था। उनके इस प्रयास से अंग्रेजी शासन नाराज हो गया और वर्ष 1915 में विद्यालय बंद कर दिया गया।
‘खुदाई खिदमतगार’ आंदोलन की स्थापना
खान अब्दुल गफ्फार खान ने वर्ष 1929 में ‘खुदाई खिदमतगार’ आंदोलन की स्थापना की। इसका उद्देश्य लोगों को सेवा, अनुशासन और अहिंसा के रास्ते पर संगठित करना था। यह संगठन अंग्रेजी शासन के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध के लिए जाना गया।
उनका मानना था कि सामाजिक बदलाव और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए हिंसा जरूरी नहीं है। उन्होंने अपने अनुयायियों को कठिन परिस्थितियों में भी संयम और अहिंसा बनाए रखने की प्रेरणा दी।
किस्सा ख्वानी बाजार की घटना
वर्ष 1930 में पेशावर के किस्सा ख्वानी बाजार में अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रदर्शन हुआ। इस दौरान निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर अंग्रेजी सैनिकों ने गोली चला दी। बड़ी संख्या में लोग मारे गए, लेकिन खुदाई खिदमतगारों ने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया।
इस घटना ने खान अब्दुल गफ्फार खान और उनके आंदोलन की अहिंसक प्रतिबद्धता को और मजबूत पहचान दी। उन्होंने अत्याचार के बावजूद अपने अनुयायियों को शांति और संयम बनाए रखने का संदेश दिया।
भारत विभाजन का किया विरोध
खान अब्दुल गफ्फार खान ने 1947 में भारत के विभाजन का विरोध किया। उन्होंने पश्तूनों के लिए एक अलग राजनीतिक विकल्प की मांग की, लेकिन उनकी मांग स्वीकार नहीं की गई।
पाकिस्तान बनने के बाद भी उन्होंने अपने विचारों और अधिकारों की आवाज उठाना जारी रखा। इसके चलते उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और नजरबंदी का सामना भी करना पड़ा।
अहिंसा की विरासत आज भी कायम
खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन शिक्षा, सामाजिक सुधार, मानव सेवा और अहिंसा के प्रति समर्पित रहा। उन्होंने यह साबित किया कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी बिना हिंसा के अपने विचारों और अधिकारों के लिए संघर्ष किया जा सकता है।
20 जनवरी 1988 को उनका निधन हुआ। उनका अंतिम संस्कार अफगानिस्तान के जलालाबाद में हुआ। उनके अंतिम संस्कार के दौरान हुए विस्फोटों में कई लोगों की जान चली गई।
खान अब्दुल गफ्फार खान का जीवन आज भी अहिंसा और मानवता के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता है। ‘सीमांत गांधी’ के रूप में उनकी पहचान इतिहास में हमेशा उन नेताओं में रहेगी, जिन्होंने हथियारों के बजाय शांति, सेवा और सत्याग्रह को अपना संघर्ष बनाया।