नियमों से बड़ा कोई नहीं

नियमों से बड़ा कोई नहीं

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सन् 1922 में काकीनाडा में अखिल भारतीय कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था। इसी अवसर पर खादी की एक सुंदर प्रदर्शनी लगाई गई थी। चरखे से बुने वस्त्रों और खादी से बने अनेक सामान देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ रही थी। प्रदर्शनी में प्रवेश के लिए दो आने का टिकट निर्धारित था। द्वार पर एक युवा स्वयंसेविका हर व्यक्ति का टिकट ध्यान से देख रही थी। तभी एक सज्जन बिना टिकट दिखाए अंदर जाने लगे। स्वयंसेविका ने विनम्रता से उन्हें रोक दिया और टिकट मांगा। सज्जन ने जेब टटोली।

उनके पास पैसे नहीं थे। वे लौटने लगे और बोले कि आज नहीं, फिर कभी प्रदर्शनी देख लूंगा। पास खड़े एक बुजुर्ग कांग्रेसी ने स्वयंसेविका से कहा कि क्या वह जानती है, ये कौन हैं? उसने सहजता से उत्तर दिया, ‘हां, ये पंडित जवाहरलाल नेहरू हैं। लेकिन मुझे आदेश है कि बिना टिकट किसी को अंदर न जाने दूं। मैं तो केवल अपना कर्तव्य निभा रही हूं।’ यह बात नेहरू जी ने सुन ली। वे मुस्कराते हुए उसके पास पहुंचे, उसकी पीठ थपथपाई और उसकी कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा की। फिर उन्होंने बुजुर्ग नेता से कहा, ‘यह बिल्कुल ठीक कह रही है। यदि आपके पास दो आने हों, तो दीजिए, मैं भी टिकट लेकर प्रदर्शनी देख लेता हूं।’ टिकट लेकर नेहरू जी प्रदर्शनी में गए। वह निष्ठावान स्वयंसेविका थीं दुगार्बाई देशमुख, जिन्होंने आगे चलकर देशसेवा में महत्वपूर्ण स्थान बनाया। उनका यह प्रसंग बताता है कि सच्चे नेतृत्व की पहचान नियमों से ऊपर उठने में नहीं, बल्कि स्वयं भी उनका सम्मान करने में है।

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