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    चीन की चालाकी पर ताला

    Lock on china's tricks
    कोरोना संकट के इस कठिन दौर में भारतीय कंपनियों को चीन की कुत्सित मंशा से बचाने के लिए भारत सरकार ने प्रत्यक्ष पूंजी निवेश (एफडीआई) के प्रावधानों में जो संशोधन किए हैं, उसकी सराहना ही की जानी चाहिए। कोरोना महामारी के चलते जिस तरह से भारतीय कंपनियों के सामने वित्तीय संकट उपस्थिति हुआ है, उसमें उनका लंबे समय तक टिक पाना मुश्किल था। ऐसी स्थिति में टेकओवर की मंशा रखने वाले चीन और दूसरे देशों की गिद्ध दृष्टि भारतीय कंपनियों पर लगी हुई थी। सरकार ने समय रहते इन देशों की मंशा को पहचान लिया और एफडीआई नियमों में संशोधन करके चीन सहित दूसरे वर्चस्ववादी देशों के मनसूबों पर पानी फेर दिया ।
    सरकार द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि अब भारत की जमीनी सीमा से लगने वाला कोई भी पड़ोसी देश सरकार की अनुमति के बिना किसी भी भारतीय कंपनी को सीधे निवेश के जरिये अधिग्रहण नहीं कर सकेगा। संशोधित नियमों के अनुसार अब भारत की सीमा से लगते देशों की कंपनियों द्वारा किसी भारतीय कंपनी में 10 फीसदी या उससे ज्यादा के निवेश के लिए सरकार की मंजूरी लेनी होगी। हालांकि पाकिस्तान व बांग्लादेश की कंपनियों द्वारा भारत में निवेश के लिए सरकार की मंजूरी का प्रावधान पहले से ही था। अब भारत की सीमा से लगने वाले भूटान, म्यामांर, अफगानिस्तान व नेपाल सहित चीन भी नये संशोधन के दायरे में आ जायेगा। भारत सरकार के इस कदम से चीन का बौखलाना स्वाभाविक था। उसने सरकार के इस फैसले की न केवल आलोचना की है, बल्कि सरकार को नसीहत भी दी है। चीन के अनुसार एफडीआई के लिए भारत के नए नियम डब्ल्यूटीओ के गैर भेदभाव के सिद्धांतों का उल्लंघन करते हैं, यह मुक्त और निष्पक्ष व्यापार के खिलाफ है।
    दरअसल, दुनियाभर में लॉकडाउन की स्थिति के चलते वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप हो चुकी है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कीमत आधे से कम रह गई है। हालांकि, शेयर बाजार में कंपनियों की परिसंपत्तियों की जो कीमतें अभी लगाई जा रही हैं , वह उन कंपनियों का वास्तविक मूल्य नहीं है, केवल एक सतही अनुमान है। लेकिन अवसरवादी ताकतों द्वारा खरीद-फरोख्त के समय इन कम होती कीमतों को हथियार बनाकर कंपनी के प्रबंधन का अधिकार हासिल कर लिया जाता है। लॉकडाउन के चलते भारत में भी कंपनियों के शेयरों की कीमतें काफी हद तक घट गई हैं। चीन इस अंतरराष्ट्रीय मंदी का फायदा उठाकर भारत समेत दुनिया के कई देशों में निवेश करना चाहता है, ताकि वह अपने व्यापार का विस्तार कर सके। बाजार के जानकार आशंका जता रहे हैं कि चीन स्वयं अथवा किसी अन्य पड़ोसी देश के माध्यम से भारतीय कंपनियों को खरीदने की कोशिश कर सकता है। सरकार को चिंता है कि अगर चीन अपने इन कुत्सित प्रयासों में सफल हो गया तो भारत के आर्थिक ढांचे में चीनी हस्तक्षेप की गुंजायश बढ़ जाएगी। अंत: ऐसी आशंकाओं को देखते हुए सरकार को एफडीआई कानून में संशोधन का सहारा लेना पड़ा।
    दरअसल, सरकार की चिंता उस वक्त और अधिक बढ़ गयी जब अवसरवादी चीन ने अपने बैंक (पीपल्स बैंक ऑफ़ चाईना) के जरिये हाउसिंग लोन देने वाली भारत की सबसे बड़ी कंपनी एचडीएफसी लिमिटेड के 1.75 करोड़ शेयर खरीद लिये। इससे पहले आर्थिक मंदी के चलते कंपनी के शेयरों में 32.29 प्रतिशत की भारी गिरावट देखी गयी। जनवरी में यह शेयर करीब 2500 रुपए का था जो अब 1600 रुपए का हो गया है। मौके का फायदा उठाते हुए चीन ने एचडीएफसी के शेयर खरीद कर अपनी हिस्सेदारी 0.8 फीसद से बढ़ाकर एक प्रतिशत से ज्यादा कर ली है। इससे सरकार के कान खड़े हो गए और वह चौकन्नी हो गयी।
    अर्थव्यवस्था के उथल-पुथल के बीच शातिर चीन एकबारगी तो़ किसी भारतीय कंपनी में हिस्सेदारी बढ़ाने में कामयाब हो चुका है, लेकिन अब एफडीआई नियमों में संशोधन के बाद चीन सहित अन्य पड़ोसी देशों को भारत में निवेश करने से पहले सरकार की अनुमति लेनी पडेगी। कोई दोराय नहीं कि चीन निवेश के मामले में काफी सक्रिय है। पिछले एक साल में उसने भारत में अपना निवेश कई गुना बढ़ा लिया है। अब कोरोना संकट के दौरान भी चीन ने बड़ी संख्या में एचडीएफसी के शेयर खरीद कर कंपनी में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई तो भारत को सतर्क होना ही था। यद्वपि अधिसूचना में प्रत्यक्ष रूप से चीन का नाम नहीं लिया गया है, लेकिन चीन के भारत के साथ जमीनी सीमा साझा करने के कारण चीन पर भी संशोधित नियम लागू होंगे। जाहिर सी बात है, भारत के इस कदम से चीन की बौखलाहट बढ़नी ही थी।
    किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में किया गया निवेश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है, जिसमें उसका पैसा लगता है। भारत में विदेशी निवेश करने के दो रास्ते हैं, एफपीआई (फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टमेंट) और दूसरा, एफडीआई (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) । एफपीआई के तहत होने वाला इन्वेस्टमेंट सिर्फ 10 प्रतिशत तक का होता है। वहीं एफडीआई के अंतर्गत 10 प्रतिशत से ज्यादा का निवेश आता है। नये नियमों के अनुसार भारत के सीमा से लगने वाले देशों के नागरिक या उनकी कंपनी भारत में 10 प्रतिशत से अधिक का निवेश करती है, तो उसे सरकार से इजाजत लेनी होगी। 10 प्रतिशत से कम वाला निवेश सेबी की निगरानी में होगा।
    स्वचालित रूट में सरकार की तरफ से नियम तय है, जिसको ध्यान में रखते हुए निवेश किया जाता है। इसके लिए विभिन्न सरकारी एजेसियों से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं होती है। भारत में कुछ एक प्रतिबंधित क्षेत्रों ( रक्षा, अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा, ऊर्जा और कुछ अन्य क्षेत्र) में विदेशी निवेश को छोड़कर बाकी उद्योगों में स्वचालित रूट खुला हुआ है। इस मार्ग से विदेशी निवेश को सरकार के किसी विभाग से अनुमति लेने के बजाय केवल भारतीय रिजर्व बैंक को सूचित करने की आवश्यकता होती हैं। हाल के वर्षों में ऑटोमेटिक रूट से चीनी निवेश में न केवल तेजी आई है, बल्कि भारतीय स्टार्ट-अप के क्षेत्र में चीन अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी बन गया है।
    प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मामले में भारत दुनिया का आठंवा बड़ा देश है। जबकि विकासशील देशों में भारत का पांचवा स्थान है। चीन, सिंगापुर, ब्राजील और हांगकांग पहले चार स्थानों पर आते हैं। ग्लोबल इन्वेस्टमेंट ट्रेड्स मॉनीटर रिर्पोट के अनुसार भारत ने साल 2019 में 49 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश हासिल किया है, जोकि 2018 में हासिल 42 अरब डॉलर के मुकाबले 16 फीसद ज्यादा है। साल 2019 में 251 अरब डॉलर का एफडीआई हासिल कर अमेरिका पहले स्थान पर है। लेकिन अब नए नियमों के बाद निवेशकों पर भारतीय कंपनियों के शेयर खरीदने में रूकावट आ सकती है। जाहीर है, इससे आने वाले समय में भारत का विदेश निवेश तो प्रभावित होगा, लेकिन बड़े देशों द्वारा भारतीय कंपनीयों के अवसरवादी अधिग्रहण की आशंका से तो मुक्ति मिलेगी ही।
    एन.के.सोमानी

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