विकास के लिए सार्थक बहस जरूरी

Deputy Chief Minister Manish Sisodia sachkahoon

दिल्ली में उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया व पंजाब के शिक्षा मंत्री प्रगट सिंह के बीच दो दिन पहले चल रही ट्वीट की लड़ाई एक अच्छा संदेश दे गई है। भले ही इस दौरान आरोप-प्रत्यारोप भी हुए, फिर भी इस ट्वीट जंग का मकसद केवल विकास ही था। जैसे-तैसे भी अगर ये विकास की जंग कामयाब हो जाती तो दोनों पक्षों को फायदा होना था व और सुधार की भी उम्मीद बंध जाती। लेकिन राजनैतिक बाधाओं के चलते यह बहस शुरू न हो सकी। मनीष सिसोदिया ने पंजाब के शिक्षा मंत्री को चुनौती दी थी कि दिल्ली व पंजाब के 250 स्कूलों की तुलना करें कि कौन सी सरकार आगे जा रही है।  राजनीति में ऐसी बहस पहली बार देखने को मिलनी थी। मनीष सिसोदिया ने तो 250 स्कूलों की लिस्ट भी जारी कर दी, लेकिन प्रगट सिंह ने अपना तर्कों द्वारा इस बहस को नकार दिया। वास्तव में तथ्यों व आंकड़े ही विकास की तस्वीर पेश करते है।

पिछले दशकों में पंजाब सहित देश के बहुत से राज्यों के सरकारी स्कूलों का हाल बेहद खस्ता हुआ पड़ा है। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा राज्यों अनुसार स्कूली शिक्षा की दर्जाबंदी की रिपोर्ट भी तैयार की जाती है जिसमें कोई प्रदेश किसी बिंदू पर पीछे होता है किसी में आगे। समूचे विश्लेषण के नतीजे सामने आते है। दिल्ली में केजरीवाल सरकार का यह भारी दावा रहा कि उन्होंने सरकारी स्कूलों में सुधार करके व स्वास्थ्य क्षेत्र में ‘मौहल्ला क्लीनिक’ लाकर अपनी शानदार सेवाएं दी है। इधर पंजाब के भी कुछेक क्षेत्रों में स्कूलों का सुधार हुआ है। पजाब के सैकड़ों सरकारी स्कूलों की हालत सुधरी है। बहस केवल स्कूलों तक ही नहीं बल्कि विकास के हर कार्य में ही होनी चाहिए।

सुधार के लिए अगर तथ्य व आंकड़ें आधारित हो तो यह देश के लिए अच्छी शुरूआत मानी जाएगी। बजाय निजी आरोपों व विरोध के लिए विरोध की बजाय सार्वजनिक मुद्दों पर बहस हो। जुबानी बहस के परिणाम हम पहले ही देख चुके है। धड़ाधड़ ब्यान दागे जाते हैं व अपशब्दों का प्रयोग धड़ल्ले से होता है। फिर शब्द वापिस ही लिए जाते है व कई बार मामला मानहानी तक भी पहुंच जाता है। राजनीति में आ चुकी नकारात्मकता ने विचार व तर्क की अहमियत ही खत्म कर दी है। दूसरी ओर युरोपीय व विकसित देशों में चुनाव के दौरान सार्वजनिक मुद्दों पर बहस ज्यादा होती है। अगर हमारे देश के राजनीतिज्ञ मुद्दों पर सार्थक बहस शुरू करदें तो शायद ही पार्टियों को रैलियां व सभाएं करने की जरूरत पड़े। हमें भी अमेरिका जैसे देशों की राजनीतिक संस्कृति अपनाने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए।

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