Supreme Court, Section: भ्रष्टाचार के आरोपों में अधिकारियों को कब नहीं मिलेगी जांच से छूट? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट की धारा 17A की सीमा

भ्रष्टाचार के आरोपों में अधिकारियों को कब नहीं मिलेगी जांच से छूट? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट की धारा 17A की सीमा

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अभिषेक शुक्ल
सरकारी अधिकारियों को स्वतंत्र होकर निर्णय लेने का अवसर मिलना चाहिए। यदि प्रत्येक प्रशासनिक फैसले के बाद उन पर आपराधिक जांच का भय बना रहे तो वे कठिन निर्णय लेने से बच सकते हैं। इससे सरकारी कामकाज और जनहित की योजनाएं प्रभावित होती हैं। दूसरी ओर, भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच से पहले अनुमति लेने की अनिवार्यता अधिकारियों के लिए बचाव का माध्यम बन सकती है। ऐसे में ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण देने और भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए इसी उद्देश्य से जुड़ी है। वर्ष 2018 में जोड़े गए इस प्रावधान के अनुसार, किसी लोकसेवक के आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई संस्तुति या निर्णय से संबंधित कथित अपराध की जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति जरूरी है। इसका उद्देश्य दुर्भावनापूर्ण शिकायतों और अनावश्यक जांच से अधिकारियों को बचाना है।

इस विषय की पृष्ठभूमि में वर्ष 1997 का विनीत नारायण बनाम भारत संघ मामला महत्वपूर्ण है। इसमें सर्वोच्च न्यायालय ने भ्रष्टाचार की जांच में केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की स्वतंत्रता पर जोर दिया था। वर्ष 2003 में वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध जांच से पहले अनुमति लेने की व्यवस्था फिर लागू की गई। हालांकि, वर्ष 2014 में सुब्रमण्यम स्वामी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक घोषित कर दिया था। जनवरी 2026 में धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर भी सर्वोच्च न्यायालय में मतभेद सामने आया। न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने इसे असंवैधानिक मानते हुए निरस्त करने की राय दी, जबकि न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन ने स्वतंत्र संस्था की जांच के बाद अनुमति देने जैसी सुरक्षा व्यवस्था के साथ इसे बनाए रखने का पक्ष लिया। इस विभाजित निर्णय के कारण मामले को आगे विचार के लिए बड़ी पीठ के समक्ष रखने का निर्देश दिया गया। इस प्रश्न पर अंतिम निर्णय अभी बाकी है। इसी पृष्ठभूमि में 16 अक्टूबर 2026 को आए तेजाराम बनाम राजस्थान राज्य के फैसले का विशेष महत्व है। मामले में एक पुलिस कांस्टेबल पर पुलिस अधीक्षक की ओर से 1.5 लाख रुपये की रिश्वत मांगने का आरोप था। आरोपी ने दलील दी कि पूर्व अनुमति के बिना जांच शुरू नहीं की जा सकती।

सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि रिश्वत की कथित मांग किसी प्रशासनिक निर्णय या आधिकारिक संस्तुति से जुड़ी नहीं थी। इसलिए इस मामले में धारा 17ए के तहत पूर्व अनुमति आवश्यक नहीं थी। इस फैसले का महत्व इसलिए है कि सरकारी पद अपने आप में जांच से छूट नहीं देता। धारा 17ए का संरक्षण उन्हीं मामलों में लागू होता है, जहां आरोप का संबंध आधिकारिक निर्णय या संस्तुति से हो। रिश्वत की स्वतंत्र मांग को प्रशासनिक कार्य का हिस्सा बताकर जांच से बचा नहीं जा सकता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अभियोजन की स्वीकृति मिलने में देरी मात्र से आपराधिक कार्यवाही स्वत: समाप्त नहीं होती। लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रशासनिक स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों जरूरी हैं। अधिकारियों को ईमानदार फैसलों के लिए अनावश्यक उत्पीड़न से बचाना चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में जांच की राह भी खुली रहनी चाहिए। तेजाराम निर्णय इसी संतुलन को मजबूत करता है। धारा 17ए की संवैधानिक वैधता पर बड़ी पीठ का निर्णय आगे की दिशा तय करेगा। (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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