गुरु पूर्णिमा पर सोहने सतगुरु की बरसी रहमत, रूहानी वचनों से साध-संगत हुई निहाल

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जिसे खुद रास्ता नहीं पता वो दूसरों को क्या बताएगा?

बरनावा (सच कहूँ न्यूज)। पूज्य गुरु जी ने गुरु पूर्णिमा पर रूहानी मजलिस में फरमाया कि कई लोग कह देते हैं कि जी, गुरू ये क्यों कहता है कि गुरूमंत्र आगे नहीं बताना चाहिए। क्या इसलिए नहीं बताने देता कि लोग उसके पास आना ना बंद कर दें? क्या इसलिए नहीं बताने देता कि कहीं सारे गुरू ना बन जाएं? उसकी इज्जत नहीं रहेगी, जी नहीं, सवाल ही पैदा नहीं होता। गुरू क्यों कहता है आगे गुरूमंत्र आप नहीं बताएंगे? उसकी बहुत-बहुत बड़ी वजह है। गुरू, भगवान के रास्तों पर आता-जाता है। हमने अभी-अभी जिक्र किया यानि वो भगवान के उन रास्तों का जानकार है। तो एक जानकार ही दूसरों को रास्ता बता सकता है। शिष्य तो अभी जानकार तो क्या, उसने तो अभी गुरूमंत्र लिया होता है, अभ्यास नहीं किया, तपस्या नहीं की, उन रास्तों पर गया नहीं, मंजिल तो बहुत दूर की बात है। अभी उन रास्तों पर भी चढ़ना नहीं सीखा। तो आगे जाकर किसी को बताएगा, जिसको खुद रास्ते मालूम नहीं, वो दूसरों को रास्ता क्या दिखा देगा?

गुरू जी की कृपा से कभी नहीं थके

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि स्कूल-कॉलेज में क्या आपने किसी स्टूडेंट को आगे किसी बड़ी क्लास के स्टूडेंट को पढ़ाते देखा है, नहीं देखा। कौन पढ़ाता है? टीचर, मास्टर, लैक्चरार। आजकल तो वो भी तैयारी करके आते हैं, वो भी भूले बैठे होते हैं। पहले खुद तैयारी करेंगे लैक्चर की, फिर जाकर लैक्चर देते हैं। सारे नहीं, पर ज्यादातर हमने तो सुना है, देखा नहीं, झूठ क्यों कहें? तो कहने का मतलब वहां भी टीचर, मास्टर, लैक्चरार ही पढ़ाता है। क्यों? क्योंकि पहले वो उन किताबों को पढ़ चुका है, उस दौर में से गुजर चुका है, उसे मालूम है। जैसे अभी एक हमारा बच्चा कोच बातें कर रहा था। तो ये बेपरवाह जी की रहमत है कि उन्होंने हमें ये फील करवाया, क्योंकि हम भी बहुत सारे गेम खेले हैं। तो हर गेम का मसल अलग-अलग होता है। आप एक गेम के लिए एक मसल को तैयार करते हैं, हो सकता है दूसरे गेम में वो मसल बाधा पैदा कर दे। ये पॉसिबिलिटी होती है। ये हकीकत होती है। तो ये हमारे गुरू का कमाल नहीं तो क्या है? कि हम 32 नेशनल खेले हैं। बहुत छोटे थे, 1978 या 80 के दरम्यिान की बात रही होगी। स्टेट लेवल के गेम थे तो वहां, क्योंकि राम जी की, गुरू जी शाह सतनाम जी दाता रहबर की ऐसी कृपा थी कि किसी गेम में थकते ही नहीं थे। हमारे पीटीआई साहब थे, और कोई प्लेयर तो था नहीं, हमें हर गेम में घुसा देते थे, चल तू चल, चल तू चल तो इस तरह से, तो वो तब प्लेटे मिला करती थी स्टील की जीतने के बाद। गिलास और प्लेट स्टील की, वो हमने काफी ढेर लगाया हुआ था घर में तब। कहने का मतलब ये गुरू का कमाल है, हमारा नहीं है।

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