BRICS Summit 2026: BRICS में एंट्री के लिए पाकिस्तान क्यों बेताब? भारत की सहमति बनी सबसे बड़ी चुनौती
BRICS में एंट्री के लिए पाकिस्तान क्यों बेताब? भारत की सहमति बनी सबसे बड़ी चुनौती
नई दिल्ली। BRICS Summit 2026: पाकिस्तान लंबे समय से दुनिया के प्रभावशाली आर्थिक समूह BRICS का हिस्सा बनने की कोशिश कर रहा है, लेकिन उसकी राह अब तक आसान नहीं हुई है। इस्लामाबाद ने वर्ष 2023 में BRICS की सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन किया था। इसके बाद से पाकिस्तान लगातार समूह के सदस्य देशों से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहा है। हालांकि, उसकी सदस्यता के रास्ते में सबसे बड़ी चुनौती भारत की सहमति को माना जा रहा है।
BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे प्रमुख देशों के साथ हुई थी। बाद में समूह का विस्तार किया गया और मिस्र, इथियोपिया, ईरान तथा संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी इसमें शामिल हुए। विस्तार के बाद BRICS का आर्थिक और रणनीतिक महत्व पहले के मुकाबले और बढ़ गया है। यही वजह है कि पाकिस्तान भी इस समूह का हिस्सा बनने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।
पाकिस्तान क्यों चाहता है BRICS की सदस्यता?
पाकिस्तान की BRICS में शामिल होने की कोशिश को केवल कूटनीतिक कदम के तौर पर नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे उसकी आर्थिक जरूरतें भी बड़ी वजह हैं। पाकिस्तान लंबे समय से आर्थिक संकट, विदेशी मुद्रा की कमी, कर्ज और धीमी आर्थिक वृद्धि जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है। पाकिस्तान के आर्थिक सर्वे के मुताबिक उसकी GDP ग्रोथ करीब 3.70 फीसदी रही है। ऐसे में इस्लामाबाद BRICS के जरिए उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार और आर्थिक सहयोग बढ़ाना चाहता है।
BRICS की सदस्यता मिलने से पाकिस्तान को नए बाजारों तक पहुंच, निवेश के अवसर और आर्थिक सहयोग के नए रास्ते मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा पाकिस्तान की नजर BRICS से जुड़े वित्तीय संस्थानों पर भी है, ताकि अंतरराष्ट्रीय वित्त जुटाने के उसके विकल्प बढ़ सकें।
न्यू डेवलपमेंट बैंक पर भी पाकिस्तान की नजर
पाकिस्तान के लिए BRICS से जुड़ा न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) भी काफी महत्वपूर्ण है। निक्केई एशिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने NDB में करीब 580 मिलियन डॉलर का निवेश किया है।
इस कदम के पीछे पाकिस्तान का उद्देश्य अपने वित्तीय विकल्पों का विस्तार करना और विश्व बैंक तथा IMF जैसी पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर निर्भरता को कुछ हद तक कम करना बताया जाता है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए विकास परियोजनाओं और बुनियादी ढांचे में निवेश जुटाना बड़ी चुनौती है। ऐसे में BRICS के आर्थिक नेटवर्क से जुड़ना उसके लिए अतिरिक्त वित्तीय और निवेश के अवसर पैदा कर सकता है।
तेजी से बढ़ता BRICS का प्रभाव
BRICS के विस्तार के बाद इसका वैश्विक प्रभाव भी काफी बढ़ा है। विस्तारित समूह में दुनिया की करीब आधी आबादी रहती है और खरीद शक्ति समानता यानी PPP के आधार पर वैश्विक GDP में इसकी हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी बताई जाती है।
भारत के लिए भी BRICS केवल कूटनीतिक मंच नहीं है, बल्कि व्यापार के लिहाज से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार BRICS देशों को भारत का निर्यात 48.8 फीसदी बढ़कर 64.3 अरब डॉलर से 95.7 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यही बढ़ता आर्थिक प्रभाव पाकिस्तान को इस समूह की ओर आकर्षित कर रहा है। इस्लामाबाद चाहता है कि उसे भी BRICS के बढ़ते व्यापार और निवेश नेटवर्क का फायदा मिले।
2023 में पाकिस्तान ने किया था औपचारिक आवेदन
पाकिस्तान ने नवंबर 2023 में BRICS की सदस्यता के लिए अपनी इच्छा सार्वजनिक रूप से जाहिर की थी। तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश कार्यालय की प्रवक्ता मुमताज जहरा बलूच ने कहा था कि पाकिस्तान BRICS को विकासशील देशों के बीच सहयोग का महत्वपूर्ण मंच मानता है। पाकिस्तान का तर्क रहा है कि उसके BRICS के अधिकांश सदस्य देशों के साथ अच्छे द्विपक्षीय संबंध हैं। इसी आधार पर इस्लामाबाद ने उम्मीद जताई थी कि उसकी सदस्यता के आवेदन पर सकारात्मक तरीके से विचार किया जाएगा।
रूस और चीन का समर्थन, फिर भी राह मुश्किल
पाकिस्तान ने BRICS में एंट्री के लिए रूस समेत प्रमुख सदस्य देशों से समर्थन हासिल करने की कोशिश की है। इस्लामाबाद लगातार सदस्य देशों के साथ कूटनीतिक संपर्क बढ़ाने में जुटा है। लेकिन केवल कुछ देशों का समर्थन पाकिस्तान की सदस्यता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। BRICS में नए सदस्य को शामिल करने के लिए मौजूदा सदस्यों की सहमति महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में पाकिस्तान के लिए भारत की भूमिका बेहद अहम हो जाती है।
भारत की सहमति क्यों बनी सबसे बड़ी चुनौती?
भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से राजनीतिक, सुरक्षा और सीमा संबंधी तनाव रहा है। ऐसे में पाकिस्तान की BRICS सदस्यता को केवल आर्थिक मुद्दे के रूप में देखना आसान नहीं है। BRICS में नए सदस्य को शामिल करने के लिए सहमति का सिद्धांत महत्वपूर्ण है। ऐसे में अगर किसी मौजूदा सदस्य की आपत्ति रहती है, तो नए देश की सदस्यता मुश्किल में पड़ सकती है। यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए रूस और चीन जैसे देशों से समर्थन हासिल करने की कोशिशों के बावजूद BRICS में एंट्री आसान नहीं मानी जा रही। भारत की सहमति इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ी चुनौती
पाकिस्तान BRICS को अपने लिए नए आर्थिक और कूटनीतिक अवसर के तौर पर देख रहा है। आर्थिक संकट के बीच उसे नए निवेश, व्यापारिक साझेदार और वित्तीय विकल्पों की जरूरत है। BRICS का बढ़ता प्रभाव इस लिहाज से इस्लामाबाद को काफी आकर्षित कर रहा है। हालांकि, BRICS की सदस्यता के लिए पाकिस्तान की सबसे बड़ी चुनौती भारत के साथ उसके संबंध हैं। जब तक इस मुद्दे पर सदस्य देशों के बीच व्यापक सहमति नहीं बनती, तब तक पाकिस्तान की BRICS में एंट्री का रास्ता मुश्किल बना रहेगा।
फिलहाल इस्लामाबाद की रणनीति साफ है—वह BRICS के सदस्य देशों के बीच अपने लिए समर्थन मजबूत करना चाहता है। लेकिन अंतिम फैसला समूह की सामूहिक सहमति पर निर्भर करेगा और यही पाकिस्तान की सबसे बड़ी परीक्षा है।