दिल्ली में जर्जर इमारतों का कहर: कब तक जान गंवाते रहेंगे लोग? हर हादसे के बाद उठता है वही सवाल

दिल्ली में जर्जर इमारतों का कहर: कब तक जान गंवाते रहेंगे लोग? हर हादसे के बाद उठता है वही सवाल

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नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में देशभर से हजारों छात्र अपने सपनों को पूरा करने आते हैं। कोई इंजीनियर बनने का सपना लेकर घर से निकलता है तो कोई डॉक्टर, अधिकारी, शिक्षक या किसी बड़े संस्थान में नौकरी करने का। माता-पिता अपने बच्चों को घर से दूर भेजते वक्त सिर्फ एक उम्मीद रखते हैं कि उनका बच्चा सुरक्षित रहे और पढ़ाई पूरी करके एक दिन कामयाबी के साथ घर लौटे।

लेकिन जब घर से निकला बेटा या बेटी कभी वापस ही न लौटे, तो उस परिवार पर क्या गुजरती होगी, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। दिल्ली में सामने आ रहे इमारत गिरने के लगातार हादसे अब सिर्फ हादसे नहीं रह गए हैं। ये राजधानी की व्यवस्था, प्रशासनिक निगरानी और निर्माण नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।

सत्य निकेतन हादसे ने फिर डराया

दिल्ली के सत्य निकेतन इलाके में पीजी के लिए इस्तेमाल की जा रही एक इमारत के अचानक ढहने की घटना ने लोगों को झकझोर दिया। इस इलाके में दिल्ली विश्वविद्यालय के कई कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्र किराये के कमरे और पीजी में रहते हैं।

घटना के बाद मलबे में फंसे लोगों को निकालने के लिए लंबे समय तक राहत और बचाव अभियान चलाया गया। कई लोगों की मौत की खबर सामने आई, जबकि कुछ लोगों के मलबे में फंसे होने की आशंका बनी रही। यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि अगर इमारत पुरानी और जर्जर थी तो उसमें लोगों के रहने की अनुमति कैसे बनी रही? क्या समय-समय पर इसकी जांच की गई थी? और अगर इमारत में नियमों के खिलाफ निर्माण हुआ था तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

पुरानी इमारतें बनती जा रही हैं बड़ा खतरा

दिल्ली में जमीन की बढ़ती कीमत और लगातार बढ़ती आबादी के बीच पुरानी इमारतों पर अतिरिक्त निर्माण का चलन बढ़ा है। कई जगहों पर एक-दो मंजिल की इमारतें समय के साथ कई मंजिलों तक पहुंच जाती हैं।

ऐसे निर्माण में अगर संरचनात्मक सुरक्षा का ध्यान नहीं रखा जाए तो छोटी सी कमजोरी भी बड़े हादसे का कारण बन सकती है। समस्या सिर्फ एक इमारत तक सीमित नहीं है। कई पुराने इलाकों में एक-दूसरे से सटी इमारतें और बेहद संकरी गलियां राहत एवं बचाव कार्य को भी मुश्किल बना देती हैं।

रोहिणी में तीन मजदूरों की गई जान

जुलाई 2026 में रोहिणी इलाके में चार मंजिला निर्माणाधीन इमारत ढह गई थी। इस हादसे में तीन मजदूरों की मौत हो गई, जबकि एक व्यक्ति घायल हुआ था। हादसे की सूचना मिलने के बाद पुलिस और राहत-बचाव टीम मौके पर पहुंची। इमारत पूरी तरह मलबे में तब्दील हो चुकी थी। आशंका थी कि निर्माण कार्य में लगे मजदूर मलबे में दबे हो सकते हैं। काफी कोशिशों के बावजूद तीन मजदूरों की जान नहीं बचाई जा सकी। सवाल फिर वही था—निर्माण के दौरान सुरक्षा मानकों की निगरानी कौन कर रहा था?

सैदुलाजाब में 6 लोगों की मौत

30 मई को साकेत-महरौली के पास सैदुलाजाब इलाके में पांच मंजिला इमारत गिरने की घटना भी सामने आई थी। बताया गया कि यह इमारत अवैध थी और गिरने के बाद इसका मलबा बगल में स्थित कैंटीन पर जा गिरा। कैंटीन में उस समय कई लोग मौजूद थे। हादसे में छह लोगों की मौत की खबर सामने आई, जबकि कई लोगों को रेस्क्यू कर बाहर निकाला गया। यह घटना इस बात की गंभीर चेतावनी थी कि अवैध निर्माण केवल नियमों का उल्लंघन नहीं होता, बल्कि किसी दिन लोगों की जान पर भी भारी पड़ सकता है।

वेलकम में जर्जर इमारत बनी मौत का कारण

जुलाई 2025 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के वेलकम इलाके में चार मंजिला जर्जर इमारत ढह गई थी। इमारत पुरानी और कमजोर बताई गई थी और उसमें कई लोग रहते थे। इमारत के अचानक गिरने से कई परिवारों की जिंदगी बदल गई। घटना के बाद फिर सवाल उठा कि अगर किसी इमारत की हालत खतरनाक थी तो उसे पहले ही खाली क्यों नहीं कराया गया?

पहाड़गंज में तीन मजदूरों की मौत

17 मई 2025 को पहाड़गंज में निर्माणाधीन इमारत का बेसमेंट ढहने से तीन मजदूरों की मौत हो गई थी। तेज आंधी और बारिश के बाद निर्माण स्थल की दीवार कमजोर हुई और हादसा हो गया। इन मजदूरों के परिवारों के लिए यह सिर्फ एक खबर नहीं थी। किसी के बच्चे ने अपना पिता खोया, किसी पत्नी ने अपना जीवनसाथी और किसी परिवार ने अपने घर का कमाने वाला सदस्य।

मुस्तफाबाद हादसे में गई 11 लोगों की जान

18 अप्रैल 2025 को मुस्तफाबाद में चार मंजिला इमारत ढहने से 11 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे के बाद अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन को लेकर सवाल उठे और कार्रवाई का भरोसा दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि अगर किसी इलाके में अवैध निर्माण हो रहा था तो प्रशासन को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं हुई?

आखिर हादसे के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?

दिल्ली में इमारत गिरने की घटनाओं की यह लंबी सूची एक बेहद गंभीर सवाल खड़ा करती है। आखिर प्रशासन की नजर अवैध या जर्जर इमारतों पर तब क्यों जाती है, जब कोई हादसा हो जाता है? हर घटना के बाद जांच के आदेश, मुआवजे और कार्रवाई की बातें होती हैं। लेकिन किसी परिवार ने अगर अपना सदस्य खो दिया तो उसके लिए मुआवजा उस नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता।

जरूरत इस बात की है कि जर्जर और अवैध इमारतों की पहचान हादसे से पहले हो। नियमित निरीक्षण हो, खतरनाक इमारतों को समय रहते खाली कराया जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर निर्माण के शुरुआती चरण में ही कार्रवाई हो।

सवाल सिर्फ इमारतों का नहीं, लोगों की जिंदगी का है

दिल्ली देश की राजधानी है। यहां देशभर से छात्र पढ़ने आते हैं, मजदूर रोजी-रोटी कमाने आते हैं और लाखों परिवार बेहतर जिंदगी की तलाश में रहते हैं। इन लोगों की सुरक्षा किसी भी विकास परियोजना से कम महत्वपूर्ण नहीं हो सकती। इमारतें दोबारा बनाई जा सकती हैं, सड़कें फिर बन सकती हैं, कारोबार दोबारा खड़ा हो सकता है, लेकिन किसी इंसान की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती। इसलिए अब जरूरत हादसे के बाद मलबा हटाने की नहीं, बल्कि हादसा होने से पहले खतरा हटाने की है। यही प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी है और दिल्ली के लोगों का सबसे बड़ा सवाल भी।

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