Tibet History: तिब्बत पर चीन का कब्जा कैसे हुआ? जानिए आजादी से लेकर 1959 के विद्रोह तक की पूरी कहानी
Tibet History: तिब्बत पर चीन का कब्जा कैसे हुआ? जानिए आजादी से लेकर 1959 के विद्रोह तक की पूरी कहानी
Tibet History: तिब्बत को अक्सर ‘दुनिया की छत’ कहा जाता है। हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित यह क्षेत्र सिर्फ धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि अपनी भौगोलिक स्थिति और जल संसाधनों के कारण भी एशिया के लिए बेहद अहम माना जाता है। तिब्बत का इतिहास सदियों पुराना है और चीन के साथ इसके राजनीतिक संबंधों को लेकर आज भी विवाद बना हुआ है।
एक दौर में तिब्बत के पास अपनी सरकार, सेना, मुद्रा और पासपोर्ट जैसी व्यवस्थाएं थीं। लेकिन 20वीं सदी के मध्य में चीन में कम्युनिस्ट शासन के स्थापित होने के बाद तिब्बत की राजनीतिक स्थिति तेजी से बदल गई।
7वीं से 9वीं सदी में शक्तिशाली साम्राज्य | Tibet History
7वीं से 9वीं सदी के बीच तिब्बत एक शक्तिशाली साम्राज्य के रूप में उभरा। उस समय तिब्बती साम्राज्य का प्रभाव हिमालय से लेकर मध्य एशिया के कई क्षेत्रों तक फैला हुआ था। बाद की सदियों में तिब्बत पर मंगोलों तथा चीन के मिंग और किंग राजवंशों का अलग-अलग स्तर पर प्रभाव रहा। हालांकि इन संबंधों का स्वरूप समय के साथ बदलता रहा और तिब्बत ने लंबे समय तक अपनी आंतरिक प्रशासनिक एवं धार्मिक व्यवस्था को काफी हद तक बनाए रखा।
1911 के बाद बदली तिब्बत की स्थिति
1911 में चीन के किंग राजवंश के पतन के बाद तिब्बत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। 13वें दलाई लामा तिब्बत लौटे और 1912-13 के दौरान तिब्बत ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की।
इसके बाद करीब चार दशकों तक तिब्बत ने अपनी अलग सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था संचालित की। उसके पास अपनी मुद्रा और अन्य संस्थाएं भी थीं। यही दौर तिब्बत के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में उसके स्वतंत्र अस्तित्व के दावे का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
माओ के सत्ता में आने के बाद बढ़ा चीन का दबाव
1949 में माओ जेडोंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने मुख्य भूमि चीन में सत्ता हासिल की। इसके बाद नई चीनी सरकार ने तिब्बत को अपने क्षेत्र का हिस्सा बताया।
बीजिंग ने तिब्बत में अपनी कार्रवाई को साम्राज्यवादी प्रभाव से मुक्ति और चीन के एकीकरण के रूप में पेश किया। दूसरी ओर, तिब्बती पक्ष ने इसे अपनी राजनीतिक स्वायत्तता पर हस्तक्षेप के रूप में देखा।
1950 में तिब्बत में दाखिल हुई चीनी सेना
अक्टूबर 1950 में पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने तिब्बत में सैन्य कार्रवाई शुरू की। तिब्बती सेना संख्या और हथियारों के मामले में काफी कमजोर थी, जिसके कारण वह चीनी सेना का प्रभावी मुकाबला नहीं कर सकी।
सैन्य दबाव के बीच तिब्बती प्रतिनिधियों और चीन के बीच बातचीत हुई। मई 1951 में बीजिंग में तथाकथित 17 सूत्रीय समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते के जरिए तिब्बत को चीन की संप्रभुता के अधीन स्वीकार किया गया।
समझौते में तिब्बत की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं तथा मौजूदा व्यवस्था के कुछ हिस्सों को बनाए रखने का आश्वासन भी दिया गया था। हालांकि बाद में तिब्बती पक्ष ने कहा कि यह समझौता दबाव में कराया गया था और इसे स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता।
1959 में हुआ बड़ा विद्रोह, दलाई लामा पहुंचे भारत
समय के साथ तिब्बत में चीनी प्रशासन और कम्युनिस्ट राजनीतिक-आर्थिक नीतियों का प्रभाव बढ़ता गया। इससे स्थानीय स्तर पर असंतोष भी बढ़ने लगा।
मार्च 1959 में ल्हासा में बड़े पैमाने पर विद्रोह हुआ। चीनी सेना ने इस विद्रोह को दबा दिया। इसके बाद 14वें दलाई लामा तिब्बत छोड़कर भारत पहुंचे।
बाद में तिब्बती निर्वासित प्रशासन ने हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपना मुख्यालय बनाया। यह प्रशासन लगातार तिब्बत के राजनीतिक और सांस्कृतिक मुद्दों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाता रहा है। हालांकि चीन तिब्बत की स्वतंत्रता संबंधी राजनीतिक मांगों को स्वीकार नहीं करता।
चीन के लिए तिब्बत इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
तिब्बत का महत्व केवल उसके इतिहास और धर्म तक सीमित नहीं है। इसकी भौगोलिक स्थिति चीन के लिए बेहद रणनीतिक है।
तिब्बती पठार भारत समेत कई एशियाई देशों की सीमाओं के करीब स्थित है। चीन के नियंत्रण से पहले तिब्बत ब्रिटिश भारत और चीन के बीच एक तरह के भौगोलिक बफर के रूप में भी देखा जाता था। तिब्बत पर चीन का नियंत्रण मजबूत होने के बाद चीनी सैन्य और प्रशासनिक पहुंच सीधे हिमालयी क्षेत्र और भारत की सीमा तक हो गई।
एशिया का ‘वॉटर टावर’ है तिब्बत
तिब्बत की एक और बड़ी खासियत इसके जल संसाधन हैं। तिब्बती पठार से या उसके आसपास से एशिया की कई महत्वपूर्ण नदी प्रणालियां निकलती हैं। इनमें ब्रह्मपुत्र, सिंधु, सतलुज और मेकांग जैसी प्रमुख नदियां शामिल हैं। यही वजह है कि तिब्बती पठार को कई बार ‘एशिया का वॉटर टावर’ कहा जाता है। इस तरह तिब्बत का महत्व राजनीतिक इतिहास से कहीं आगे बढ़कर रणनीतिक, भौगोलिक और जल-संसाधनों से भी जुड़ जाता है। यही कारण है कि तिब्बत आज भी चीन, भारत और पूरे एशिया की भू-राजनीति में एक बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र बना हुआ है।