TECH NEWS HINDI: हेडफोन को लेकर बढ़ी चिंता! Bose, Samsung और Sennheiser समेत 81 मॉडल्स में मिले रसायन, जानें कितना है खतरा

हेडफोन को लेकर बढ़ी चिंता! Bose, Samsung और Sennheiser समेत 81 मॉडल्स में मिले रसायन, जानें कितना है खतरा

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नई दिल्ली। TECH NEWS HINDI: आज के दौर में हेडफोन हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। ऑफिस में काम करने से लेकर सफर, पढ़ाई और जिम तक लोग घंटों हेडफोन या ईयरफोन का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन एक हालिया लैब जांच ने इन डिवाइस की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के मुताबिक, Bose, Samsung और Sennheiser जैसे लोकप्रिय ब्रांड्स के कुछ हेडफोन मॉडल्स में ऐसे रसायन पाए गए हैं, जिन्हें स्वास्थ्य के लिए संभावित रूप से चिंता का विषय माना जाता है।

जांच में कुल 81 अलग-अलग हेडफोन मॉडल्स को शामिल किया गया और रिपोर्ट के अनुसार हर सैंपल में किसी न किसी तरह के जोखिम से जुड़े रसायन पाए गए।

किन हेडफोन मॉडल्स की हुई जांच?

यह जांच ToxFREE LIFE for All नाम की पहल के तहत की गई, जिसमें मध्य यूरोप की कई नागरिक संस्थाएं शामिल थीं। शोधकर्ताओं ने ओवर-ईयर और इन-ईयर दोनों तरह के हेडफोन खरीदे और उनके उन प्लास्टिक व सिंथेटिक हिस्सों का परीक्षण किया, जो लंबे समय तक त्वचा और कान के संपर्क में रहते हैं।

जांच में खासतौर पर प्लास्टिक में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स पर ध्यान दिया गया। चिंता की मुख्य वजह यह है कि हेडफोन के कुछ हिस्से लंबे समय तक त्वचा से सीधे संपर्क में रहते हैं।

BPA समेत कई रसायन पाए गए

रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में सैंपल में बिस्फेनॉल समूह के रसायन मिले। इनमें BPA (Bisphenol A) सबसे प्रमुख था, जो रिपोर्ट के मुताबिक करीब 98 प्रतिशत सैंपल में पाया गया। इसके अलावा Bisphenol S (BPS) की मौजूदगी भी कई नमूनों में दर्ज की गई।

BPA और BPS जैसे रसायनों को वैज्ञानिक साहित्य में एंडोक्राइन डिसरप्टर्स के रूप में अध्ययन किया गया है। ये ऐसे रसायन होते हैं जो शरीर के हार्मोन सिस्टम के सामान्य कामकाज में हस्तक्षेप कर सकते हैं। रिपोर्ट में इसके अलावा फ्थैलेट्स, क्लोरीनेटेड पैराफिन और कुछ फ्लेम रिटार्डेंट्स की मौजूदगी का भी उल्लेख किया गया है। इन रसायनों को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिक अध्ययनों में प्रजनन स्वास्थ्य, मेटाबॉलिक सिस्टम और कुछ अंगों पर संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई गई है।

घंटों हेडफोन पहनने वालों के लिए क्यों चिंता?

हेडफोन और ईयरफोन का इस्तेमाल अब सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। बहुत से लोग इन्हें रोजाना कई घंटे पहनते हैं। ऐसे में किसी रसायन का त्वचा के सीधे संपर्क में लंबे समय तक रहना संभावित एक्सपोजर को बढ़ा सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक गर्मी, पसीना और लगातार त्वचा के संपर्क जैसी परिस्थितियां भी इस तरह के एक्सपोजर को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हेडफोन पहनने से तुरंत कोई बीमारी हो जाएगी।

महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी उत्पाद में किसी रसायन की मौजूदगी और उससे वास्तविक स्वास्थ्य नुकसान होने के बीच अंतर होता है। जोखिम इस बात पर भी निर्भर करता है कि रसायन कितनी मात्रा में मौजूद है, शरीर तक कितना पहुंचता है और कितने समय तक संपर्क रहता है।

क्या है ‘कॉकटेल इफेक्ट’?

रिपोर्ट में लंबे समय तक अलग-अलग स्रोतों से होने वाले रासायनिक संपर्क को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसे आम तौर पर ‘कॉकटेल इफेक्ट’ कहा जाता है।

इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति का संपर्क सिर्फ एक उत्पाद के रसायनों से नहीं होता। रोजमर्रा की जिंदगी में प्लास्टिक, कॉस्मेटिक्स, पैकेजिंग और दूसरे उपभोक्ता उत्पादों के जरिए कई तरह के रसायनों के संपर्क में आने की संभावना रहती है। ऐसे में वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश करते हैं कि अलग-अलग रसायनों का संयुक्त प्रभाव कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।

बच्चों और किशोरों को लेकर ज्यादा सतर्कता की मांग

इस रिपोर्ट के बाद स्वास्थ्य और पर्यावरण से जुड़े कार्यकर्ताओं ने उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनियों से अधिक पारदर्शिता की मांग की है। उनका कहना है कि जो उत्पाद लंबे समय तक शरीर के सीधे संपर्क में रहते हैं, उनमें इस्तेमाल होने वाले रसायनों की जानकारी उपभोक्ताओं को स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए।
खास तौर पर बच्चों और किशोरों को लेकर अधिक सावधानी बरतने की मांग की जा रही है, क्योंकि उनके विकास के दौरान हार्मोन सिस्टम पर असर डालने वाले रसायनों को लेकर वैज्ञानिक चिंता अधिक रहती है।

कंपनियों से पारदर्शिता की मांग

इस जांच ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है—क्या उपभोक्ताओं को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि रोजाना शरीर के संपर्क में रहने वाले इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों में किस तरह के रसायनों का इस्तेमाल किया गया है?

फिलहाल रिपोर्ट में जिन कंपनियों के उत्पादों का उल्लेख किया गया है, उनकी ओर से इस जांच को लेकर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ऐसे में रिपोर्ट में सामने आए निष्कर्षों को स्वतंत्र वैज्ञानिक और नियामकीय जांच के संदर्भ में देखना जरूरी है। कुल मिलाकर, यह रिपोर्ट हेडफोन इस्तेमाल करने वालों के लिए घबराने की वजह से ज्यादा उत्पादों में इस्तेमाल होने वाली सामग्रियों और रासायनिक सुरक्षा को लेकर जागरूक होने का संकेत देती है।

 

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