प्रदूषण सरकारों के लिए कोई मुद्दा नहीं रहा!

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इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि हमारे देश में सरकारों व जनता के लिए प्रदूषण का कोई मुद्दा ही नहीं रहा। सब सुनकर चुप्पी साधे बैठे हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने गत दिवस एक कांफ्रैस में यह खुलासा किया है कि देश में सीवरेज में जाने वाला घरों का 50 प्रतिशत गंदा पानी बिना शुद्धता के नदियों में बहाया जा रहा है। एनजीटी अधिकारियों ने प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड के अधिकारियों को इस दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहराया है। गंगा सहित देश की नदियों का हाल किसी से छिपा नहीं है। भारी खर्च करने के बावजूद नदियों में गंदगी ज्यों की त्यों दिख रही है।

सतलुज नदी को तो कई बुद्धिजीवी सीवरेज का नाम दे रहे हैं। उनकी दलील है कि वर्षा ॠतु को छोड़कर सतलुज का पानी रोपड़ के नजदीक ही खत्म हो जाता है फिर हरीके तक पहुंचने वाला गंदा पानी कहां से आता है। वास्तव में यह लुधियाना के सीवरेजों का पानी है जो सतलुज को प्रदूषित करता है। पानी दूषित करने वाली फैक्टरियां भी चर्चा में रह चुकी हैं लेकिन कार्रवाई क्या होती है? यह सब जानते हैं। कभी राजस्थान के लोग हरीके पत्तन पहुुंचने वाले दूषित पानी के खिलाफ आंदोलन करते थे लेकिन अब लगता है थककर वे लोग भी चुप हो रहे हैं।

लोग जागरूक होने के बावजूद दूषित पानी पीने के लिए मजबूर हैं। विकासशील देश होने के कारण नई पीढ़ी केवल रोजगार को ही अपना मुख्य उद्देश्य समझ रही है। वातावरण को लेकर हमारे पास यूरोपीय देशों जैसी जागरूकता व जज्बा नहीं है। हमारे पास स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग जैसी बहादुर युवती नहीं जो अपने देश के शासकों को भारतीय फिÞजां दूषित होने का ताना मार सके। लोग जहर जैसा पानी पीकर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। नदियां दूषित नाले बनती जा रही हैं। नदियों की संभाल केवल रैलियां व सार्वजनिक संभाओं तक सीमित है।

जिस प्रकार की सख्ती पराली जलाने के विरुद्ध किसानों पर हुई थी, बिल्कुल वैसी ही कार्रवाई नदियों में गंदा पानी बहाने वालों के खिलाफ होनी चाहिए। फिलहाल ऐसी कार्रवाई की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। नदी विकास का सबसे बड़ा स्त्रोत ही नहीं बल्कि जीवन का आधार भी है। सरकारों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और जनता को भी अपने स्तर पर वातावरण बचाने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता है।

 

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