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ज्योतिबा फुले ने दिखाई सामाजिक बदलाव की राह

Sach Kahoon Desk Picture
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महात्मा ज्योतिबा फुले भारत में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई के अगुवा हैं। अपने विचारों और कार्यों की बदौलत उन्होंने दलित-वंचित समाज को वर्ण-व्यवस्था के भेदभावकारी व शोषणकारी चंगुल से आजादी के लिए निर्णायक संघर्ष का नेतृत्व किया। इसके साथ ही उन्होंने देश की पहली महिला शिक्षिका व अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले के साथ मिलकर महिलाओं की मुक्ति के लिए भी अथक आंदोलन चलाया। देश के समाज सुधार आंदोलन पर उनके प्रभाव को इस बात से समझा जा सकता है कि संविधान-निमार्ता डॉ. भीमराव अंबेडकर महात्मा फुले को अपना प्रेरणास्रोत मानते थे।

ज्योतिबा फुले का जन्म 11 अप्रैल 1827 को महाराष्ट्र के पुणे में हुआ। एक वर्ष की अवस्था में ही उनकी माता का देहांत हो गया। जाति व्यवस्था द्वारा खड़ी की गई बाधाएं कदम-कदम पर उनके रास्ते में आई। 13 साल की उम्र में सावित्री बाई से उनका विवाह हुआ। अपनी पढ़ाई के साथ-साथ पत्नी की पढ़ाई का ध्यान रखा। थॉमस पेन की पुस्तक मनुष्य के अधिकार से प्रभावित होकर फुले सामाजिक न्याय की गहरी समझ विकसित करते हैं और भारतीय जाति व्यवस्था के कटु आलोचक बन जाते हैं। उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं और निचली जातियों की सामाजिक असमानताओं को संबोधित करने में शिक्षा एक महत्वपूर्ण कारक है।

उन्होंने अपनी पत्नी को शिक्षित करने के बाद देश में पहला लड़कियों का स्कूल अगस्त 1848 में खोला। यह काम उस समय के सवर्ण समाज को इतना नागवार गुजरा कि पति-पत्नी को अपना घर छोड़ना पड़ गया। लेकिन इससे वे जरा भी निरुत्साहित नहीं हुए। उनका संघर्ष और तीखा हो गया। अनपढ़ महिलाओं को पढ़ाने के लिए उन्होंने साक्षरता की कक्षाएं शुरू की। रात्रि स्कूल की शुरूआत की। विचार और आचरण के क्षेत्र में बुनियादी परिवर्तन लाने के लिए महात्मा ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की।

फुले स्वयं इसके अध्यक्ष बने। सावित्रीबाई ने उसकी महिला शाखा की अध्यक्षता संभाली। दोनों ने विधवा पुनर्विवाह का अभियान छेड़ा। पति के गुजर जाने पर विधवा हुई महिलाओं का मुंडन कर दिया जाता था। इस अपमानजनक प्रथा के खिलाफ उन्होंने नाईयों को प्रेरित किया। एक ऐसे आश्रम की स्थापना की, जिसमें सभी जातियों की तिरस्कृत विधवाएं सम्मान के साथ रह सकें। उन नवजात शिशु कन्याओं के लिए भी एक घर बनाया, जो अवैध संबंधों से पैदा हुई थीं और जिनका सड़क या घूरे पर फेंक दिया जाना निश्चित था।

उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया और जाति व्यवस्था की निंदा की। सत्य शोधक समाज ने तर्कसंगत सोच पर बल देते हुए शैक्षिक और धार्मिक नेताओं के रूप में ब्राह्मणों एवं पुरोहितों की जरूरत को खारिज कर दिया। उनका दृढ़ विश्वास था कि अगर आप स्वतंत्रता, समानता, भाईचारे, मानवीय गरिमा, आर्थिक न्याय जैसे मूल्यों पर आधारित नई सामाजिक व्यवस्था की स्थापना करना चाहते हैं तो सड़ी-गली, पुरानी, असमान व शोषणकारी सामाजिक व्यवस्था और मूल्यों को उखाड़ फेंकना होगा।

यह अच्छी तरह से जानने के बाद उन्होंने धार्मिक पुस्तकों और भगवान के नाम पर परोसे जाने वाले अंधविश्वास पर हमला किया। उन्होंने महिलाओं और शूद्रों के मन में बैठी मिथ्या धारणाओं की चीर-फाड़ की। फुले ने महिलाओं, शूद्रों व समाज के अगड़े तबकों में अंधविश्वास को जन्म देने वाली आर्थिक और सामाजिक बाधाओं को हटाने के लिए अभियान चलाए। उन्होंने कथित धार्मिक लोगों के व्यवहार का विशख्ेषण करते हुए पाया कि वह राजनीति से प्रेरित था।

फुले ही अपने समय के ऐसे समाजशास्त्री और मानवतावादी थे जिन्होंने ऐसे साहसिक विचार प्रस्तुत किए। फुले ऐसी सामाजिक व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन के पक्षधर थे, जिसमें शोषण करने के लिए कुछ लोगों को जानबूझकर दूसरों पर निर्भर, अनपढ़, अज्ञानी और गरीब बना दिया जाता है। उनके अनुसार व्यापक सामाजिक -आर्थिक परिवर्तन के लिए अंधविश्वास उन्मूलन एक हिस्सा है। परामर्श, शिक्षा और रहने के वैकल्पिक तरीकों के साथ-साथ शोषण के आर्थिक ढांचे को समाप्त करना भी बेहद जरूरी है। 28नवंबर, 1890 को उनका देहांत हो गया तो सावित्रीबाई फुले ने सत्यशोधक समाज की बागडोर संभाली।

अरुण कुमार कैहरबा

 

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