Water Conservation: नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों की बहाली क्यों है जरूरी? जल सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण पर बड़ा सवाल
प्रदूषण, अतिकेयानी उपयोग और जलवायु संकट की चपेट में नदियाँ, झीलें और आर्द्रभूमियाँ
Freshwater Ecosystem Restoration: नदियाँ, झीलें और आर्द्रभूमियाँ केवल पानी के भंडार नहीं हैं, ये हमारी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा, जैवविविधता और सांस्कृतिक पहचान का आधार हैं। वे जल चक्र को संतुलित करतीं हैं, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखतीं हैं, सूखा और बाढ़ दोनों के प्रभाव को कम करती हैं और करोड़ों लोगों को निवाला, रोजगार और आवास उपलब्ध कराती हैं। फिर भी आज हमारे देश की कई नदियाँ, झीलें और आर्द्रभूमियाँ प्रदूषण, अतिकेयानी उपयोग और जलवायु संकट की चपेट में हैं। Water Conservation
अगर हमने अब न देखा न संभाला, तो इन पारिस्थितिक तंत्रों के टूटने का मूल्य हम सबको चुकाना होगा आर्थिक रूप से, पर्यावरणीय रूप से और सामाजिक रूप से। औद्योगिक और घरेलू सीवेज का अपव्यवस्थित निर्वहन, असंयमित कृषि रसायनों और पोषक तत्वों का बहाव, खनन-प्रवृत्तियाँ, और बांधों तथा जलविभाजन के कारण नदियों की प्राकृतिक धारा और तल बदल रहे हैं। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन से चरम घटनाओं की आवृत्ति बढ़ने पर सूखे और अचानक बाढ़ का चक्र अधिक तीव्र हुआ है।
परिणामस्वरूप जलग्रहण-क्षमता घट रही है, जलीय जैव विविधता खतरे में है और तटीय-आधारित आजीविकाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। शहरीकरण के साथ कई प्राकृतिक आर्द्रभूमियाँ भर दी जाती हैं या उनके किनारे निर्माण हो जाता है, जिससे वे बहुत कम हो कर बचाव के कमजोर ढांचे बनकर रह जाती हैं। मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्रों की बहाली केवल संरक्षण तक सीमित नहीं हो सकती; यह बहुआयामी रणनीति मांगती है, जिसमें नीति, वित्त, स्थानीय भागीदारी और वैज्ञानिक निगरानी एक साथ हों। स्रोत-से-समुद्र तक दृष्टिकोण अपनाएँ। नदी बेसिनों की बहाली के लिए समग्र जल प्रबंधन लेना होगा धाराएँ, उपवाहक, तटवर्ती आर्द्रभूमियाँ और जलाधार सभी का एकीकृत प्रबंधन करना आवश्यक है। प्रदूषण पर जीरो टॉलरेंस पर लाने के लिए काम करना होगा।
शहरी क्षेत्रों में सीवेज का उपचार और री-यूज औद्योगिक और कृषि प्रयोजनों के लिए अनिवार्य करें। जल निकासी प्रणालियों के साथ सुदृढ़ निगरानी और नियमन रखें। कृषि-पद्धतियों में बदलाव प्रोत्साहित करें। नियंत्रित उर्वरक और कीटनाशक उपयोग, नाइट्रोजन-फिक्सिंग फसलें, रैर-फार्मिंग और जैविक खेती से पोषक तत्वों का जल में बहाव कम होगा। काश्त के पानी के कुशल उपयोग के लिए ड्रिप/स्प्रिंकलर जैसी प्रणालियाँ सब्सिडी पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। आक्रामक विदेशी प्रजातियों का हटाना और स्थानीय प्रजातियों का पुनरोपण। क्षतिग्रस्त तटों और आर्द्रभूमियों से आक्रामक उपद्रवियों को हटाकर प्राकृतिक वनस्पति की बहाली से पारिस्थितिक समतुल्य और भोजन-श्रृंखला बहाल हो सकती है। Water Conservation
शहरी नियोजन में 'नीला-हरा' इंटिग्रेशन। शहरों में प्राकृतिक जलाशयों, एसाइटेज बेसिनों और हरे-भरे गलियारों को संरक्षित करके बाढ़ नियंत्रण और शहरी ताप को कम किया जा सकता है। बारिश के पानी का स्थानीय संचयन और स्वच्छ वाटर रीचार्ज जरूरी है। समुदाय-आधारित निगरानी और स्वामित्व। स्थानीय किसान, जल उपयोगकर्ता समूह और नागरिक समाज को निगरानी और निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने पर बहाली अधिक टिकाऊ होती है। पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय उत्साह का सशक्त उपयोग परियोजनाओं की सफलता के लिए निर्णायक है। विज्ञान-आधारित लक्ष्य और नियमित निगरानी। जल गुणवत्ता, जल प्रवाह, जैव विविधता सूचकांक और अर्थतंत्रिक लाभों का मानकीकृत मापन होना चाहिए, ताकि निर्गम लक्ष्यों की प्रगति मापी जा सके।
डिजिटल सेंसर, सैटेलाइट निगरानी और नागरिक विज्ञान के संयोजन से लागत प्रभावी निगरानी संभव है। वित्तपोषण के नवीन मॉडल अपनाने पर जोर देना होगा। सार्वजनिक-निजी भागीदारी, हरित बॉन्ड, और प्रदूषणकर्ता-भुगतान सिद्धांत पर आधारित कर या शुल्क से बहाली के लिए लगातार वित्त सुनिश्चित करें। छोटे किसानों और स्थानीय उद्यमों को लक्षित अनुदान और तकनीकी सहायता दें। 2030 तक क्षतिग्रस्त जल तंत्रों की बहाली को तेज करने के लिए देशों का फ्रेशवॉटर चैलेंज एक उपयुक्त और समयबद्ध पहल हो सकती है। भारत के लिए यह एक अवसर है कि वह अपने जल-आधारों की बहाली में वैश्विक सहयोग और निजी निवेश को आकर्षित करे। पर यह केवल बाहरी सहायता पर निर्भर नहीं होना चाहिए। घरेलू नीति सुधार, सख्त अनुवर्तन और स्थानीय भागीदारी ही निर्णायक होंगे। चैलेंज के तहत लक्ष्य निर्धारण पारदर्शी, स्थानीय-प्रासंगिक और विज्ञान-आधारित होने चाहिए, ताकि हर नदी, झील और आर्द्रभूमि की विशिष्ट जरूरतों के अनुरूप योजनाएँ बन सकें।
बहाली की नीतियाँ तब ही कामयाब होंगी जब स्थानिक स्तर पर व्यवहारिक समाधान लागू हों। उदाहरण के तौर पर छोटे-बड़े जलाशयों और तालाबों का नवीनीकरण, किनारे पर स्थानीय प्रजातियों की पुनर्स्थापना, सीवेज उपचार प्लांट का संचालन और समुदाय-आधारित पालन-पोषण मॉनिटरिंग- ये सभी परियोजनाएँ त्वरित, सस्ती और प्रभावी साबित हुई हैं। हर सफल स्थानीय परियोजना अन्य क्षेत्रों के लिए एक प्रयोगशाला बन सकती है, जहां से सीख और मॉडल आसानी से प्रतिलिपि किए जा सकें। समस्या की गहराई इतनी है कि सिर्फ नीति बहस या रिपोर्टों से काम नहीं चलेगा। सरकारों, नगर निगमों, उद्योगों और नागरिक समाज को मिल कर तात्कालिक, मध्यकालीन और दीर्घकालिक कार्रवाई की रूपरेखा बनानी होगी। Water Conservation