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Monsoon 2026: बदलती जलवायु और पर्यावरणीय असंतुलन का गंभीर संकेत है लापता होता मानसून
Monsoon 2026: भारत में मानसून महज एक मौसम नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, कृषि व्यवस्था और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। हर वर्ष इसकी दस्तक का इंतजार खेतों से लेकर बाजारों तक किया जाता है। इस बार भी मानसून को लेकर उम्मीदें थीं, लेकिन शुरूआती प्रगति के बाद इसकी रफ्तार अचानक धीमी पड़ गई। कई क्षेत्रों में बारिश की कमी दर्ज की गई, जिससे मौसम वैज्ञानिकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। ऐसी स्थिति ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि आखिर हमारे मौसम चक्र में क्या बदलाव आ रहे हैं और उनका भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। Indian Monsoon
मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशांत महासागर में विकसित हो रही अल नीनो की स्थिति इस वर्ष मानसून को प्रभावित कर सकती है। अल नीनो एक ऐसी प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसके दौरान प्रशांत महासागर के कुछ हिस्सों का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। इसका असर विश्वभर के मौसम चक्र पर पड़ता है। भारत में प्राय: इसके कारण वर्षा में कमी देखने को मिलती है। यही कारण है कि कृषि प्रधान देश होने के नाते भारत में अल नीनो की गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जाती है।
देश के अनेक हिस्सों में वर्षा सामान्य से कम रहने की आशंका पहले ही व्यक्त की जा चुकी है। यदि मानसून कमजोर रहता है तो इसका सीधा प्रभाव खेती पर पड़ता है। धान, मक्का, दलहन और तिलहन जैसी फसलें वर्षा पर काफी निर्भर हैं। वर्षा की कमी उत्पादन घटा सकती है, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव और अधिक गहरा होता है, क्योंकि देश की बड़ी आबादी आज भी कृषि और उससे जुड़े व्यवसायों पर निर्भर है। Indian Monsoon
मौसम विभाग पिछले कई दशकों से मानसून का पूवार्नुमान जारी करता रहा है। आधुनिक तकनीकों, उपग्रहों और संगणकीय प्रणालियों की सहायता से मौसम संबंधी आंकड़ों का विश्लेषण किया जाता है। इसके बावजूद मानसून की सटीक भविष्यवाणी करना आज भी चुनौती बना हुआ है। भारतीय मानसून दुनिया की सबसे जटिल मौसम प्रणालियों में से एक माना जाता है। इसमें समुद्रों, पर्वतों, हवाओं, तापमान और वैश्विक जलवायु घटनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इनमें किसी भी स्तर पर होने वाला परिवर्तन मानसून की दिशा और तीव्रता को प्रभावित कर सकता है।
जलवायु परिवर्तन ने इस चुनौती को और बढ़ा दिया है। पिछले कुछ वर्षों में मौसम का स्वरूप तेजी से बदला है। कहीं अत्यधिक वर्षा हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है। गर्मी के मौसम में तापमान नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि पृथ्वी के बढ़ते तापमान का असर बादलों की संरचना, वर्षा के वितरण और मौसम की स्थिरता पर पड़ रहा है। विशेषज्ञों द्वारा किए गए अनेक अध्ययनों से यह भी संकेत मिला है कि प्राकृतिक वनों के घटने का प्रभाव वर्षा चक्र पर पड़ता है। जंगल वातावरण में नमी बनाए रखने और बादलों के निर्माण में सहायक भूमिका निभाते हैं। जब बड़े पैमाने पर वन क्षेत्र कम होते हैं तो स्थानीय जलवायु प्रभावित होती है। यही कारण है कि पर्यावरण संरक्षण और जलवायु संतुलन को एक-दूसरे से अलग करके नहीं देखा जा सकता। Indian Monsoon
भारत की भौगोलिक स्थिति मानसून को विशिष्ट बनाती है। एक ओर अरब सागर है, दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी और उत्तर में हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखला। समुद्रों से आने वाली नमी युक्त हवाएं हिमालय से टकराकर पूरे देश में वर्षा का वितरण करती हैं। यही व्यवस्था भारतीय कृषि और जल संसाधनों की आधारशिला है। यदि इस प्राकृतिक प्रणाली में असंतुलन आता है तो उसका प्रभाव देश के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ता है।
मौसम विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। देश में आधुनिक वेधशालाओं, रडार प्रणालियों, उपग्रहों और उच्च क्षमता वाले संगणकों का जाल बिछाया गया है। इन माध्यमों से लगातार आंकड़े एकत्र किए जाते हैं और मौसम संबंधी आकलन तैयार किए जाते हैं। फिर भी भारतीय मानसून की जटिलता ऐसी है कि कई बार अनुमान अपेक्षा के अनुरूप सिद्ध नहीं होते। इसका अर्थ यह नहीं कि वैज्ञानिक प्रयास कमजोर हैं, बल्कि यह दशार्ता है कि प्रकृति की जटिलताओं को समझने के लिए अभी और गहन अध्ययन की आवश्यकता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मौसम और जलवायु संबंधी चुनौतियों को गंभीरता से समझा जाए। जल संरक्षण, भूजल संवर्धन, वन विस्तार और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना समय की मांग है। साथ ही मौसम संबंधी अनुसंधान और पूवार्नुमान प्रणालियों को और अधिक सशक्त बनाने की जरूरत है, ताकि किसानों और आम नागरिकों को समय रहते सही जानकारी उपलब्ध कराई जा सके।
लापता होता मानसून सिर्फ एक मौसमी घटना नहीं है। यह बदलती जलवायु, कमजोर पड़ते पर्यावरणीय संतुलन और भविष्य की चुनौतियों का संकेत भी है। यदि आज हमने प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी नहीं निभाई तो आने वाले वर्षों में जल, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण से जुड़ी समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं। इसलिए विकास और प्रकृति के बीच संतुलन स्थापित करना आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुका है।
प्रमोद भार्गव (यह लेखक के अपने विचार हैं) Indian Monsoon