Anmol Vachan: इस 'नाम' के अभ्यास से जो परमानन्द की प्राप्ति होती है, उसके बिना जीव कहीं भी नहीं रह पाता

‘गृहस्थ या त्यागी, सभी के लिए जीवन में सुमिरन बहुत जरूरी’

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Anmol Vachan: सच्चे रूहानी रहबर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (Saint Dr. Gurmeet Ram Rahim Singh Ji Insan) फरमाते हैं कि जो जीव एक बार प्रभु का नाम ले लेता है, उसका अभ्यास करता है तो फिर जो परमानन्द की प्राप्ति होती है, उसके बिना जीव कहीं भी नहीं रह पाता। वो यही कहता है कि हे मेरे मौला! हे मेरे राम! जो तेरे प्यार-मोहब्बत से मुझे रोशनी मिली है और उस मोहब्बत तक जाने का रास्ता, तेरा सुमिरन, तेरा नाम है, उससे कभी भी मेरी प्रीत ना छूटे। मैं तेरा नाम सुमिरन करने में लगा रहूं, मैं लगा रहूं इन्सानियत की भलाई में। कोई रोके-टोके, उसकी परवाह मुझे न हो। तेरे सुमिरन के द्वारा मैं तेरे नूरी स्वरूप के दर्शन करूं। 

पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि इन्सान को कभी भी नाम का सुमिरन करना नहीं छोड़ना चाहिए। आप जिंदगी में क्या बन गए हैं, क्या बनना चाहते हैं, यह आपकी एक सोच है। आपने जो भी जीवन चुना है, गृहस्थ या त्यागी, हर जीवन में सुमिरन अति जरूरी है। तभी आप तालमेल बैठा पाएंगे, तमाम खुशियां हासिल कर पाएंगे। घर-गृहस्थ में रहते सुमिरन करेंगे, तो जिस तरह कमल कीचड़ में खिलता है, उसी तरह आपके चेहरे पर आभा रहेगी। त्यागी-तपस्वी हैं, तो अगर आप सुमिरन करेंगे, तभी मन काबू में रहेगा।

आप जी फरमाते हैं कि इन्सान की मनोदशा होती है कि जो इन्सान के पास होता है, वह उससे संतुष्ट नहीं होता, बल्कि जो पास नहीं है, उसको पाने की ललक लगी रहती है। हमने हजारों, लाखों लोगों से सुना कि शादी नहीं होती,  और कुछ समय बाद शादी हो जाती है, तो कहते हैं कि शादी क्यों हो गई। मतलब, इन्सान की मनोदशा है कि किसी भी चीज से संतुष्टि नहीं है। इसलिए सुमिरन करना होगा, ताकि आपने जैसा भी जीवन चुना है, उसमें रहते हुए आप अपने कर्त्तव्यों का निर्वाह करें और प्रभु की प्राप्ति के नजदीक पहुंचते जाएं।

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