Atma Nirbhar Bharat: पीएम मोदी का खादी, हैंडलूम और हस्तशिल्प अपनाने का आह्वान
आत्मनिर्भर भारत को मिलेगी नई गति
Atma Nirbhar Bharat: नई दिल्ली (डॉ. मयंक चतुर्वेदी) “मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा, वह है ‘खादी’। हम सभी जानते हैं कि ‘खादी’ महात्मा गांधी को बहुत प्रिय थी। बीते कुछ वर्षों में ‘खादी’ काफी लोकप्रिय हुई है। पिछले 12 वर्षों में इसकी बिक्री 6 गुना बढ़ी है। बिक्री का यह आंकड़ा अब 8,000 करोड़ रुपये के करीब पहुंच चुका है। मेरा आप सभी से आग्रह है कि आने वाले त्योहार में ‘खादी’ का कोई-न-कोई, हैंडलूम का कोई-न-कोई, हैंडीक्राफ्ट का कोई-न-कोई प्रोडक्ट जरूर खरीदें।” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मन की बात (136वां एपिसोड)।
वस्तुत: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का खादी, हैंडलूम और हस्तशिल्प उत्पादों को खरीदने का आज का आह्वान यहां सिर्फ खादी पहनने का संदेश होने तक सीमित न होकर गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने, पारंपरिक भारतीय कौशल को वैश्विक पहचान दिलाने और "आत्मनिर्भर भारत" के संकल्प को जन-आंदोलन में बदलने का प्रयास है। यदि देश के 140 करोड़ से अधिक नागरिक वर्ष में एक बार भी खादी अथवा किसी स्थानीय कारीगर का उत्पाद खरीदें, तो यह करोड़ों ग्रामीण परिवारों के जीवन में स्थायी आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है। निश्चित ही आज प्रधानमंत्री के इस आह्वान को हर घर समझना होगा।
खादी राष्ट्र निर्माण का विचार है
भारत में खादी का इतिहास स्वतंत्रता, स्वाभिमान और आर्थिक आत्मनिर्भरता की कहानी कहता है। जब अंग्रेजी मिलों के कपड़ों ने भारतीय बुनकरों की आजीविका छीन ली थी, तब महात्मा गांधी ने चरखे को स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बनाया। उनके लिए खादी स्वदेशी, श्रम, समानता और आत्मनिर्भरता का दर्शन थी। चरखे की आवाज ने गांव-गांव में आत्मविश्वास जगाया और विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार को जनआंदोलन बना दिया, इसलिए जब भारत पूर्ण स्वतंत्र हुआ, तब इस परंपरा को संगठित स्वरूप देने के लिए वर्ष 1956 में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (केवीआईसी) की स्थापना की गई।
यदि हम दूर नहीं जाएं , मोदी कार्यकाल को ही देखें तो प्रधानमंत्री मोदी ने "खादी फॉर नेशन, खादी फॉर फैशन" का मंत्र देकर इसे नई पीढ़ी से जोड़ा है। जिसके परिणामस्वरूप खादी, कुर्तों एवं अन्य सीमित दायरों से निकलकर डिजाइनर परिधान, जैकेट, साड़ियां, शर्ट, बैग, फुटवियर और अनेक आधुनिक उत्पादों के रूप में वैश्विक बाजार तक पहुंची है। इसका सबसे बड़ा प्रभाव भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। खेती के बाद गांवों में रोजगार के अवसर सीमित होते हैं, ऐसे में खादी और ग्रामोद्योग करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार बने हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले दशक में इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की संख्या लगभग 1.30 करोड़ से बढ़कर 2.04 करोड़ से अधिक हो चुकी है।
खादी और वस्त्र उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार ने अनेक महत्वाकांक्षी योजनाएं भी शुरू की हैं। ‘पीएम मित्र’ के तहत विश्वस्तरीय एकीकृत टेक्सटाइल पार्क विकसित किए जा रहे हैं, जिनसे लाखों रोजगार सृजित होने की संभावना है। समर्थ योजना युवाओं और महिलाओं को आधुनिक कौशल प्रशिक्षण देकर उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार कर रही है।
इसी प्रकार प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी) के माध्यम से ग्रामीण युवाओं और उद्यमियों को उद्योग स्थापित करने के लिए बैंक ऋण और सरकारी सब्सिडी उपलब्ध कराई जा रही है। वहीं ‘स्फूर्ति) योजना पारंपरिक उद्योगों के क्लस्टर विकसित कर उन्हें आधुनिक तकनीक, बेहतर पैकेजिंग और वैश्विक बाजार से जोड़ रही है। इन पहलों ने खादी को आज विरासत से आगे भविष्य की अर्थव्यवस्था का सशक्त माध्यम बना दिया है। जिसमें कि कहना होगा, इस क्षेत्र की सबसे बड़ी शक्ति महिलाएं हैं।
वस्तुत: कताई कार्य में 80 प्रतिशत से अधिक भागीदारी महिलाओं की है। सौर चरखे, स्वयं सहायता समूहों और आधुनिक प्रशिक्षण ने ग्रामीण महिलाओं को उद्यमी बनाया है। आज हजारों महिलाएं अपने गांव में ही सम्मानजनक आय अर्जित कर रही हैं, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ उनका सामाजिक सम्मान भी बढ़ा है। आज प्रधानमंत्री का त्योहारों के अवसर पर खादी खरीदने का आग्रह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी शहर में खरीदा गया एक खादी का कुर्ता या हस्तशिल्प का उत्पाद सीधे किसी ग्रामीण कारीगर के घर तक आय पहुंचाता है। यह आर्थिक विकास का ऐसा मॉडल है, जो लाखों भारतवासियों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाता है।
यहां सभी को यह भी समझना चाहिए कि प्रधानमंत्री मोदी का उक्त संदेश, सिर्फ आर्थिक दृष्टि से ही महत्व नहीं रखता है, इसके साथ ही यह सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब कोई नागरिक विदेशी ब्रांड के बजाय किसी स्थानीय बुनकर का बुना कपड़ा, किसी हस्तशिल्पी का बनाया उत्पाद या किसी ग्रामीण महिला द्वारा तैयार सामग्री खरीदता है, तब वह किसी परिवार की आजीविका, किसी गांव की अर्थव्यवस्था और भारत की सांस्कृतिक विरासत को सशक्त करता है।
अंत में यही कहना होगा कि आज जब दुनिया पर्यावरण-अनुकूल और स्थानीय उत्पादों की ओर लौट रही है, तब भारत के पास खादी के रूप में ऐसा मॉडल मौजूद है, जिसमें रोजगार, पर्यावरण संरक्षण, महिला सशक्तीकरण, ग्रामीण विकास और सांस्कृतिक गौरव, सभी एक साथ जुड़े हुए हैं, इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 'मन की बात'में किया गया यह आह्वान वास्तव में एक ऐसा राष्ट्रीय अभियान है, जिसे हर घर अनुसरण करना चाहिए। यदि प्रत्येक भारतीय त्योहारों और विशेष अवसरों पर खादी, हैंडलूम और हस्तशिल्प उत्पादों को प्राथमिकता देने का संकल्प ले, तो यह निश्चित ही देश के लाखों कारीगरों के जीवन में नई आशा, नई समृद्धि और नए आत्मविश्वास का संचार करेगा।