Mother's Day 2026: सरसा के कंगनपुर की सतवीर कौर की कहानी हर किसी की आंखें नम कर देती है!

औलाद बिछड़ी, रिश्ते टूटे, फिर भी मां की आंखों में अपनों का इंतजार बाकी

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Mother's Day: 2026: रानियां (सच कहूँ/राजेंद्र गाबा)। मां अपने बच्चों के लिए पूरी जिंदगी संघर्ष करती है। उनके सुख-दुख में खुद को भूल जाती है। लेकिन जब वही मां जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर अकेली रह जाए, तो उसका दर्द शब्दों में बयां करना आसान नहीं होता। सिरसा के निकटवर्ती गांव कंगनपुर की 68 वर्षीय सतवीर कौर की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जो मदर्स डे पर हर किसी की आंखें नम कर देती है। कभी हंसते-खेलते परिवार की मुखिया रही सतवीर कौर आज अपने 70 वर्षीय पति सुखदेव सिंह के साथ रानियां स्थित मानव सेवा अनाथ व वृद्धा आश्रम में जीवन गुजार रही हैं। Sirsa News

चेहरे पर झुर्रियां हैं, आंखों में अपनों के बिछड़ने का दर्द और दिल में अब भी परिवार लौट आने की एक छोटी सी उम्मीद बाकी है। आश्रम के एक कमरे में बैठी सतवीर कौर जब अपने अतीत को याद करती हैं तो उनकी आंखें भर आती हैं। कांपती आवाज में उन्होंने बताया कि उनके परिवार में एक बेटा और एक बेटी थी। दोनों शादीशुदा थे। घर में बहू, एक पौत्र और दो पौत्रियां थीं। परिवार खुशहाल था, लेकिन वक्त ने ऐसा करवट बदला कि सब कुछ बिखर गया। उन्होंने बताया कि बेटा नशे की गिरफ्त में आ गया।

लाख समझाने और संभालने की कोशिशों के बावजूद वह इस लत से बाहर नहीं निकल पाया और एक दिन उसकी मौत हो गई। बेटे की मौत का दुख परिवार अभी सह भी नहीं पाया था कि कुछ समय बाद उनकी इकलौती बेटी भी बीमारी के कारण दुनिया छोड़ गई। दोनों बच्चों की मौत के बाद पति-पत्नी पूरी तरह टूट गए। दुखों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। सतवीर कौर का आरोप है कि उनकी ननंद ने मकान और जायदाद पर कब्जा कर लिया। इसके बाद वे अपनी विधवा बहू, एक पौत्र और दो पौत्रियों के साथ बेघर हो गए। हालात ऐसे बने कि उन्हें आश्रम का सहारा लेना पड़ा। Sirsa News

करीब एक साल से सुखदेव सिंह और सतवीर कौर मानव सेवा अनाथ व वृद्धा आश्रम रानियां में रह रहे हैं। आश्रम ही अब उनका घर है। यहीं रहने-खाने से लेकर दवाइयों तक की व्यवस्था हो रही है। आश्रम संचालक बबलू प्रजापत बताते हैं कि बुजुर्ग दंपती बेहद शांत स्वभाव के हैं, लेकिन अपने परिवार को याद कर अक्सर भावुक हो जाते हैं। सतवीर कौर कहती हैं कि बीते एक साल में परिवार या रिश्तेदारी से कोई भी सदस्य उनसे मिलने नहीं आया। उन्हें अपने बहू, पौत्र और पौत्रियों की कोई खबर नहीं है।

यह दर्द उन्हें हर दिन अंदर से तोड़ता है। अपनी भीगी आंखों को पोंछते हुए सतवीर कौर ने कहा जब भगवान ही नाराज हो गया, तो अब अपनों से क्या गिला-शिकवा करें। मदर्स डे पर जहां दुनिया मां के त्याग और ममता को सलाम कर रही है, वहीं सतवीर कौर जैसी कई मांएं ऐसी भी हैं, जो जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर सिर्फ अपनापन और दो मीठे बोल सुनने की आस में दिन काट रही हैं। उनकी कहानी समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिन हाथों ने बच्चों को संभाला, क्या बुढ़ापे में उन हाथों को सहारे की जरूरत नहीं होती? Sirsa News

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