बच्चे को बोरी में बांध रहा था बदमाश, परम पिता जी ने खुद प्रकट होकर छुड़ाया

सरसा। मकान नं. 926 मोहल्ला धोबियों वाला बंद गेट सरसा शहर से बीबी ईश्वर देवी परम पूजनीय सतगुरु जी की अपार बख्शिश का एक अद्भुत करिश्मा (Ruhani Karishma) इस प्रकार वर्णन करती है : सन् 1975 की बात है। उस दिन भी दरबार में प्रतिदिन की तरह सुबह की मजलिस लगी हुई थी। उस दिन रक्षा बन्धन के कारण काफी गिनती में संगत दरबार में आई हुई थी। मजलिस के बाद मेहरबान दातार जी ने अपने प्यारे सत्ब्रहमचारियों को तेरा वास में बुलाकर उन्हें अपने पवित्र कर-कमलों के द्वारा रखड़िया (राखियां) तथा कृपा दृष्टि का प्रसाद बख्शकर बेशुभार प्रेम प्रदान किया। कुल मालिक की मौज थी एक बहुत ही सुन्दर छोटी सी राखी सच्चे पातशाह जी ने अपने पवित्र कर-कमलों के द्वारा प्रेमी दीवान चन्द सरसा को देते हुए वचन फरमाया, भाई ! शाम होण तो पहला-पहला इह राखी प्रेमी राम चन्द्र पटवारी दे घर पहुंचा देवीं।

प्यारे परम पिताजी के हुक्म द्वारा जब प्रेमी दिवान चन्द राखी लेकर हमारे घर पहुंचा तब मेरा सारा परिवार अपने परम दयालु दातार जी की पवित्र सौगात प्राप्त करके बहुत खुश हुआ। कुल मालिक की अपार रहमत को राखी रूप में प्राप्त करके मेरे परिवार को विश्वास हो गया कि हमारे घर पर आज ही लड़के का जन्म होगा और वैसा ही हुआ। वाली दो जहान शहनशाह जी ने हमारे विश्वास को बरकरार रखा। उसी दिन मेरे घर सच्चे पातशाह जी ने अत्यन्त खुशी बख्शी। हमारे यहां पौत्र पैदा हुआ। उसका नाम बेपरवाह जी ने कृष्ण रखा। कुल मालिक की उस प्यारी दात (बच्चा प्राप्त करके सारा परिवार फूले नहीं समाया बड़े यत्न तथा लाड-प्यार से कृष्ण का लालन-पा किया।

करीब सात वर्ष की आयु में शहनशाह जी उसे नाम की दात प्रदान की। उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन कृष्ण अपने मोहल्ले में अकेला ही रहा था। उस समय दिन छिप गया था तथा अंधेरा हो गया था। इस प्रकार बच्चे को देखकर किसी अज्ञात व्यक्ति ने उसे पकड़ लिया, वह आदमी शायद बच्चे उठाने वाले किसी गिरोह का ही सदस्य था। अपनी निश्चित योजना के अधीन ही कृष्ण को बोरी में बंद करके अपने निश्चित स्थान पर ले जाना चाहता था, परन्तु वह तो सर्व-सामर्थ्य सतगुरु का जीव था। उसने तुरंत अपने सतगुरु को याद किया और ‘धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ का नारा लगाया। तत्काल ही उसे शहनशाह जी के दर्शन हुए। बेपरवाह जी के हाथ में वही लाठी थी। वाली दो जहान दातार जी ने कड़कती हुई आवाज में उस आदमी को पूछा, ‘ओह बच्चे नूं कित्थे लिजा रिहा है? इह हुण साडा बच्चा है इसनूं इत्थे ही छड़ दे।’ खुद-खुदा की उस प्रभावशाली आवाज को सुनकर तथा लाठी को देखकर वह बदमाश व्यक्ति डर के मारे थर-थर कांपने लगा। उसे अपनी जान की बन गई। वह कृष्ण को वहीं पर छोड़कर ऐसे भागा कि पीछे मुंह करके देखा तक नहीं।

उसके बाद सच्चे पातशाह जी ने कृष्ण से पूछा, ‘बेटा! तूं पटवारी दा पोता हैं?’ बच्चा भी कुछ घबरा सा गया था। उसने हां में सिर हिलाया। इस पर मेहरबान दाता जी ने कृष्ण को अपने घर जाने के लिए कहते हुए फरमाया, ‘जा बेटा ! तू आपणे घर चला जा। असी इत्ये साहमणे ही खड़े हां।’ कृष्ण उसी वक्त दौड़कर अपने घर चला गया और जाते ही उसने मुझे सब कुछ बता दिया और यह भी कहा कि परम पिताजी ने स्वयं मुझे उस बदमाश से छुड़ाया है और आपजी ही मुझे घर तक छोड़ने आए हैं। अपने नन्हें से भतीजे के मुंह से यह बात सुनते ही मैं (ईश्वर देवी) तुरन्त दौड़कर बाहर आई परन्तु तब तक तो मेहरबान सतगुरु जी वहां से अलोप हो चुके। यह बात तत्काल सारे मोहल्ले में फैल गई कि पूज्य परम पिताजी रामचन्द पटवारी के पोते कृष्ण को बदमाश से छुड़ाकर स्वयं घर छोड़कर गए हैं।

सतगुरु जी की इस रहमत को लेकर सारे परिवार तथा सारे मोहल्ले में कई दिन तक चर्चा होती रही। सभी परिवार जनों ने वाली दो जहान दयालु दाता जी का लाख-लाख शुक्राना किया कि बेपरवाह जी ने अपने मासूम बच्चे की रक्षा करके प्रेमी परिवार की लाज रखी है। कुल मालिक की रहमत के इस प्रत्यक्ष प्रमाण (Ruhani Karishma) से स्पष्ट है कि सतगुरु जी शब्द रूप में अपने हर जीव के सदा अंग-संग हैं और जहां कहीं भी उस पर कोई भीड़ बनती है तो तत्काल ही उसकी सहायता करते हैं। काल को भी अधिकार नहीं कि वह पूरे सतगुरु के जीव के तरफ आंख उठाकर देख सके, क्योंकि मेहरबान सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज हर समय अपने जीवों की स्वयं रक्षा करते हैं तथा हमेशा उनके अंग-संग रहते हैं।

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