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ज्ञान गंगा में गोते लगाना है तो पुस्तक से कीजिये दोस्ती

समय परिवर्तनशील है। पुस्तकें कल की बात होगई है। आज इंटरनेट का भूत युवा पीढ़ी पर सवार है। आज का युवा प्रेमचंद को नहीं जानता। महादेवी वर्मा, दिनकर , विमल चटर्जी , मन्मथनाथ गुप्त, शरत चंद्र को नहीं पहचानता। इसका एकमात्र कारण हमारी शिक्षा प्रणाली है। स्कूल में पुस्तकालय है मगर वहां किशोर नहीं जाता। […]
लेख 

पुस्तकें : बदलावों के प्रामाणिक दस्तावेज

संसार का स्वरूप भले ही जनमानस की आंखों से उतरकर उसके अन्त:करण तक अपनी उपस्थिति का भान कराने में समर्थ हो, मगर इस स्वरूप का विश्लेषणात्मक एवं व्यापक विवेचन विचारों के माध्यम से ही संभव है। विचार सदैव स्मरण के आधार पर स्थायी बने रहे, ऐसा कदाचित संभव नहीं है। विचारों को स्थायित्व प्रदान करने के […]
सम्पादकीय